सार्वजनिक जीवन में इन पांच अवस्थाओं के आधार पर फैसला किया जा सकता है-खरा आचरण और प्रदर्शन, अनुपयुक्त और नैतिक रूप से संदिग्ध व्यवहार, ऐसा निर्णय जो कानूनसम्मत न हो, एक ईमानदार गलती तथा भ्रष्टाचार व घूसखोरी। कोयला खदानों के आवंटन को लेकर हमारे निंदकों की रणनीतिक गलती यह रही कि वे इन पांच अवस्थाओं में भेद नहीं कर पाए। वे बेतरतीब ढंग से एक से दूसरे बिंदु पर जाते रहे और हल्ला मचाते रहे। कोयला नीति के कुछ ऐसे पहलू हैं जिन पर कुछ लोग असहमत हो सकते हैं, किंतु असहमति का यह मतलब नहीं है कि एक पक्ष गलत है और दूसरा सही। दरअसल, सही वह है जो नियम-कायदों से निर्देशित हो। भाजपा के संसद में सार्थक बहस से बचने का यह संकेत है कि वह सच्चाई को सामने नहीं आने देना चाहती और इसका कारण यह है कि इस असहज कहानी का वह भी एक हिस्सा है। भाजपाई इस उम्मीद में इकतरफा घोषणाओं में लगे रहे कि वे उपरोक्त पांचों पहलुओं में गड्डमड्ड करके कांग्रेस को कठघरे में खड़ा कर देंगे। विपक्ष का तो काम ही है विरोध करना और अगर संभव हो तो सरकार को अपदस्थ करना, किंतु बात जब संस्थानों और अर्थव्यवस्था के विनाश की हो तो उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि इस नुकसान की भरपाई नहीं की जा सकती। कोयला आवंटन के मुद्दे पर बहस की व्यापक गुंजाइश है, किंतु बहस से कन्नी काटने से बहुत से महत्वपूर्ण सवाल अनछुए रह गए हैं, जैसे कोयला आवंटन पर जो संदेह प्रकट किए जा रहे हैं वे विचारधारात्मक हैं या फिर प्रबंधन अवधारणाओं में भेद संबंधी। वाम मोर्चे का स्पष्ट मत है कि कोयला क्षेत्र में निजी उद्यम की भागीदारी चाहे वह नीलामी से हो या बगैर नीलामी, अस्वीकार्य है। दूसरी तरह कुछ लोगों का यह भी कहना है कि कोयला क्षेत्र का राष्ट्रीयकरण समाप्त कर दिया जाए। इन विविध मतों पर व्यापक बहस की जरूरत है ताकि आम लोगों के साथ-साथ संसद और सरकार के सामने सही तस्वीर उभर सके। कैग रिपोर्ट को शुरू से ही कांग्रेस पर हमले का औजार बनाया जा रहा है। इस संबंध में कुछ मुद्दों पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। कैग ने यह नहीं कहा कि सरकारी खजाने को 1.86 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है, बल्कि यह कहा है कि कंपनियों को 1.86 लाख करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ है। इन दोनों बातों में क्या अंतर है? लापरवाही से नुकसान एक बात है और लाभ पहुंचाने की मंशा के बगैर अगर किसी को फायदा हुआ है तो यह बिल्कुल अलग बात है। अगर लाभ हितों के टकराव की परिस्थितियों में प्रभाव के इस्तेमाल के कारण हुआ है तो यह बिल्कुल अलग बात है और इस अवस्था में गहन पड़ताल की आवश्यकता है। अगर 1.86 लाख करोड़ के इस आंकड़े से 20 ऊर्जा संबंधी ब्लॉकों को निकाल दें, 14 फीसदी रॉयल्टी और मुनाफे पर 33 फीसदी कॉर्पोरेट कर निकाल दें तो खदान लाभार्थियों के हाथ में बचेगा क्या? खुद कैग रिपोर्ट का कहना है कि नीलामी के कारण लाभ में से कुछ हिस्सा कम किया जा सकता था। हैरानी की बात है कि यहां किसी संख्या का उल्लेख नहीं किया गया है। संसद अवरुद्ध कर देने के विपक्ष के इस रवैये का परिणाम यह हुआ है कि न केवल जनता के पैसे का वास्तविक या अनुमानित नुकसान हुआ, बल्कि देश के विश्वास और प्रतिष्ठा को भी क्षति पहुंची। हमारे संसदीय तंत्र पर पड़े असर का तो आकलन ही नहीं किया जा सकता। हमें खनन, ऊर्जा, स्टील, सीमेंट क्षेत्रों में भारी निवेश करना है, जिससे बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर होंगे। ऐसे में कोयला खदानों के आवंटन में देरी करना समझदारी नहीं थी। विपक्ष की ओर से उठाए जा रहे दो और बिंदुओं को भी स्पष्ट कर देना जरूरी है। पहला यह कि यह संप्रग-2 सरकार थी जिसने 2005 में ही यह स्वीकार कर लिया था कि कोयला खदानों की नीलामी होनी चाहिए, लेकिन नीति में परिवर्तन को जानबूझकर लटकाया गया ताकि कुछ लोगों को अनुचित लाभ पहुंचाया जा सके। एक रूमानी सवाल पर ध्यान दें-प्रेम के बाद इसे खोना बेहतर है या फिर प्रेम न करना? हमने सोचा कि अब समय रफ्तार बढ़ाने का आ गया है। अर्थव्यवस्था 9 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही थी। साथ ही मांग भी तेजी से बढ़ रही थी, किंतु एक टिकाऊ कानूनी सत्ता को अनेक निर्णय लेने होते हैं। क्या केवल प्रशासकीय आदेशों के बल पर आगे बढ़ना संभव था? क्या कोल नेशनलाइजेशन एक्ट 1973 या फिर माइंस एंड मिनरल्स डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन एक्ट में वास्तव में संशोधन की आवश्यकता थी? क्या राज्य सरकारें नीति में परिवर्तन के लिए सहमत थीं? 2005 में यह विचार उपजा, 2008 में विधेयक पेश किया गया और स्टैंडिंग कमेटी में भेजा गया। 2010 में इसके नियम-कायदे तय किए गए और 2012 में इसे राज्यों के साथ गहन चर्चा के बाद पारित किया गया। जो भी विधायी प्रक्रिया के जानकार हैं उन्हें पता है कि इस पूरी प्रक्रिया में कुछ भी असामान्य नहीं था। दूसरा बिंदु यह है कि क्या इस प्रक्रिया के दौरान 57 कोयला खदानों (जिनमें 20 सार्वजनिक उपक्रमों को दिए गए ब्लॉक हैं) का आवंटन स्थगित रखा जा सकता था? विपक्ष पहले तो नीलामी के विरोध में उतरने और फिर स्क्रीनिंग कमेटी में कंपनी विशेष का समर्थन करने की अपने मुख्यमंत्रियों की सिफारिशों को जनता के सामने नहीं लाना चाहता। अगर आप नेताओं के चेहरों पर छलकपट के भाव देखना चाहते हैं तो भाजपा नेताओं को इन पत्रों का उल्लेख करते हुए देखें, जो उनके मुख्यमंत्रियों ने लिखे थे। हम स्पष्ट थे कि भारतीय अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा को कच्चे माल की आपूर्ति में अनिश्चितकाल के लिए बाधा नहीं आनी चाहिए थी। फिर भी स्क्रीनिंग कमेटी की प्रक्रियाओं को मजबूत किया गया। और किसी ने भी शिकायत नहीं की-न ही राज्यों ने और न ही असफल कंपनियों या सांसदों या न्यूज चैनलों ने। अब हमें बताया जा रहा है कि हमारे निर्णय अर्थव्यवस्था की जरूरतों का संरक्षण हासिल नहीं कर सकते, क्योंकि इन खदानों में अब तक काम शुरू नहीं हुआ है। इसमें निहित है कि वास्तविक लाभ हुआ ही नहीं है। फिर भी अगर हम कहें कि वास्तविक हानि के बारे में कुछ कहना जल्दबाजी होगी तो शून्य नुकसान के सिद्धांत पर हमारा मखौल उड़ाया जा रहा है। कोई सोचता है कि संप्रग की कोशिश करने के लिए निंदा की जानी चाहिए, उद्देश्य की पूर्ति न कर पाने के कारण निंदा की जानी चाहिए और आत्मसमर्पण न करने तथा सभी ब्लॉक रदद कर खुद को दोषी मान लेने से इन्कार करने के कारण निंदा की जानी चाहिए। दूसरी ओर हमारा विश्वास यह है कि जब हालात बहुत कठिन हों तभी मजबूत लोग आगे बढ़ते हैं। भाजपा को कोयले की खदानों से राजनीतिक सोना निकालने की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए।

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