Monday, September 17, 2012

कोयला घोटाले में मैच फिक्सिंग


विश्लेषण प्रफुल्ल बिदवई

कैग रिपोर्ट के विपरीत कोयला आवंटन घोटाले में सिर्फ यूपीए शामिल नहीं, बल्कि यह एक सामूहिक घोटाला है केंद्र की यूपीए सरकार और गैर कांग्रेसी राज्य सरकारों ने खूबसूरत मैच फिक्सिंगकर सार्वजनिक क्षेत्रों की इकाइयों को उचित अवसर से वंचित करके संदेहास्पद व्यावसायिक हितों को कोयले के पट्टे आवंटित कर दिए

भारतीय संसद का मानसून सत्र हंगामे में डूब गया। 19 में से महज 6 दिन ही काम हो पाया, वह भी बस आंशिक रूप से। लोकसभा ने कुल मिलाकर महज 20 फीसद काम किया और राज्यसभा ने 27 फीसद। 15 में से केवल 4 विधेयक ही पारित हो सके। इनमें जिन विधेयकों के साथ मुनासिब सलूक नहीं हुआ, वे हैं-दलितों के लिए सरकारी नौकरियों की प्रोन्नतियों में आरक्षण, काले धन को सफेद करने के खिलाफ उपाय और व्हिसिल ब्लोअर्स की सुरक्षा के लिए विधेयक। मंत्रियों को जिन 399 तारांकित प्रश्नों के मौखिक उत्तर देने थे, उनमें से केवल 11 के ही उत्तर मिल पाए। जिस कोयला आवंटन घोटाले में कोयला खनन ब्लॉकों को निजी कंपनियों के हाथों बेचने से कैग के अनुमान के अनुसार सरकारी खजाने को कथित रूप से जबरदस्त 1.86 लाख करोड़ रुपये का घाटा हुआ है, उसने संसद को नारेबाजी, घिनौने मुकाबलों, बेलगाम आरोपों और धक्मामुक्की के अखाड़े में तब्दील कर दिया था। हंगामे की अगुआई करने वाली भाजपा ने अपने व्यवहार को सही साबित करने के लिए इसे सफाईका एक रूप घोषित किया। राज्यसभा में भाजपा के नेता अरुण जेटली ने कहा,‘कभी-कभी हंगामों से वे नतीजे निकल सकते हैं, जो र्चचा से नहीं।साफ है कि भाजपा ने यह मान लिया है कि कोलगेटके बाद यूपीए के खिलाफ जनमत का उभार सुनामी बन चुका है, अर्थात पक्के तौर वह होने जा रहा है, जो 1987 में बोफोर्स कांड के बाद राजीव गांधी के हटने के रूप में हुआ था। लेकिन हमें दिख रहा है कि भाजपा अपने चूजों को गिनने में बहुत जल्दी कर रही है। उसके लिए फूलों की खशबू बहुत दूर है। खुद उसके पार्टी की राज्य सरकारें आलोचना से बाहर नहीं हैं। कोयला घोटाले में ये सरकारें गले तक फंसी हुई हैं। इसके अलावा भ्रष्टाचार के मामले में भाजपा का अपना रिकार्ड भी कांग्रेस से कोई बेहतर नहीं है। अन्ना हजारे आंदोलन के समापन के बाद अरविंद केजरीवाल जैसे उसके नेताओं द्वारा राजनीति की मुख्यधरा में प्रवेश करने के फैसले के बाद भाजपा के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की धार कुंद पड़ गई है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि 1991 से नव-उदारवादी नीतियों पर चलने वाली सभी सरकारों की तरह ही यूपीए सरकार भी मूल्यवान प्राकृतिक संसाधनों को जनता के स्वामित्व से निकाल कर निजी हाथों के हवाले करने की दोषी है। कैग ने इसके खास उदाहरणों में कोयले के उन 57 ब्लॉकों का अध्ययन किया है, जिनका आवंटन सस्ती दरों पर और नीलामी के बिना बिजली, इस्पात और सीमेंट उत्पादन के लिए एस्सार पावर, हिंडाल्को, टाटा स्टील और जिंदल स्टील जैसी कंपनियों को किया गया था। इसने देश के ज्ञात कोयला भंडारों -जो दुनिया के सबसे बड़े भंडारों में हैं- के लगभग 20 फीसद पर भारत के निजी कारपोरेशनों को कब्जा दे दिया। यह भी सही है कि इनमें से कुछ आवंटन संदेहास्पद कारणों से सांसदों और उनसे जुड़ी कंपनियों को किए गए थे। इसमें से दोस्तीबाजी की बू आती है। 57 ब्लॉकों में से केवल एक ही उत्पादन की अवस्था तक पहुंचा है। हालांकि लाइसेंस की शतरे के अनुसार लाइसेंसी को उत्पादन कार्य खुली खदानों के मामले में 36 और भूमिगत मामलों में 48 महीनों के भीतर शुरूकर देना चाहिए था। इससे संदेह यह पैदा होता है कि कंपनियों ने कोयले में यह निवेश सट्टेबाजी और इसलिए किया था कि अपनी इन परिसंपत्तियों का इस्तेमाल वे 2जी टेलीकॉम की तरह महामुनाफा कमाने के लिए कर सकें। कैग ने इन अनियमितताओं की ओर इशारा करके अच्छा काम किया है। परंतु 1.86 लाख करोड़ का आंकड़ा अनुमानित है, जिसमें अनेक मनोगत आकलन और बाहरी अनुमान भी शामिल हैं। इतना विस्मयकारी यह आंकड़ा वास्तविक संख्या का आधा भी नहीं है और यह केवल एक संकेतक हो सकता है। लेकिन इस तरह के नाटकीय आंकड़े ने हमारी राजनीतिक बहस को हमलावर और सनसनीखेज बनाने का काम किया। कैग रिपोर्ट के मूल में अहम धारणा यह है कि 2005 में यूपीए सरकार ने कोयले के ब्लॉकों के लिए इस आधार पर बोली नहीं लगवाई कि नीलामी से 1957 के खदान और खनिज (विकास एवं नियमन) अधिनियम में संशोधन करने की आवश्यकता होगी। इस पर सर्वसम्मति बनाने में देर लगेगी और सकल घरेलू उत्पाद तथा राजस्व को नुकसान होगा। उपरिसंरचना विकास अत्यावश्यक है और यह इंतजार नहीं कर सकता है। इसलिए सरकार को आवंटन के अप्रिय तथा तैयार उपाय का सहारा लेना पड़ा था। कैग ने अत्यावश्यकता के तर्क पर सवाल नहीं किया लेकिन उसने आग्रह किया कि खनन लाइसेंस जारी करने के लिए प्रशासनिक आदेश जारी करके या केंद्र सरकार के लिए कार्यविधियां तैयार करके नीलामी का रास्ता लेना चाहिए था। उसका मानना है कि इस प्रकार के आदेश से खदान और खनिज (विकास एवं नियमन) अधिनियम में संशोधन का कानूनी रूप से समुचित विकल्प पैदा हो जाता। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह विचार गलत है- कानूनी तौर पर प्रशासनिक आदेश से किसी संविधि को नहीं बदला जा सकता है। यह मत मौजूदा मामले में मजबूती से सही बैठता है क्योंकि यह अधिनियम राज्य सरकारों को विशेष अधिकार प्रदान करता है। खनन पट्टों के लिए आवेदन स्वीकार करनें और पट्टे देने का कानूनी अधिकार केवल उनको है। केंद्र इसमें केवल स्क्रीनिंग कमेटी के माध्यम से जुड़ता है, जो पट्टा दिए जाने से पहले यह सुनिश्चित करती है कि लाइसेंस केंद्रीय कानूनों के अनुसार है या नहीं। स्क्रीनिंग राज्यों द्वारा लाइसेंस देने की कानूनी प्रक्रिया का स्थान नहीं लेती। इस प्रकार कोयला खदानों को पट्टे पर देने का वास्तविक अधिकार राज्यों के पास है और उन्होंने अपने इस अधिकार को कम करने के प्रत्येक प्रयास का कड़ाई से और बार-बार विरोध किया है। उन्होंने 25 जुलाई, 2005 को केंद्र के इस प्रस्ताव का साफ तौर पर विरोध किया था, जिसमें लाइसेंस देने के लिए बोली लगाने की शुरुआत करने की बात की गई थी। पीएमओ में हुई एक बैठक में आवंटन की पहले वाली प्रक्रिया को ही चालू रखने का फैसला किया गया था। इसकी सबसे जोरदार मांग भाजपा या राजग शासित राज्यों की सरकारों ने की थी। वास्तविकता तो यह है कि कांग्रेस की राज्य सरकारों को कोयले के 57 में से केवल 4 ब्लॉक ही मिले हैं । बाकी के सारे ब्लॉक विरोधी दलों द्वारा शासित राज्यों में हैं। लगभग आधे ब्लॉक झारखंड में हैं, जहां के मुख्यमंत्री कुख्यात मधु कोडा थे। 13 ब्लॉकों के साथ दूसरा राज्य छत्तीसगढ़ है। इसके बाद नंबर आता है 9 ब्लॉकों के साथ ओडिशा का। मध्य प्रदेश के दो ब्लॉकों के साथ भाजपा शासित राज्यों को कुल मिलाकर 42 ब्लॉक मिले हैं। इसके विपरीत कांग्रेस शासित महाराष्ट्र के पास चार ब्लॉकहैं। कोयला ब्लॉक आवंटन के रोग से पश्चिम बंगाल तक अछूता नहीं, जहां उस समय वाम मोर्चे की सरकार थी। वैसे उसके हिस्से में केवल दो ब्लॉक आए हैं। इसलिए कैग रिपोर्ट के विपरीत इस घोटाले में सिर्फ यूपीए शामिल नहीं है। यह एक सामूहिक घोटाला है, जिसमें केंद्र की यूपीए सरकार और गैर कांग्रेसी राज्य, मुख्यत: भाजपा शासित राज्यों ने खूबसूरत मैच फिक्सिंगजैसा खेल खेलकर सार्वजनिक क्षेत्रों की इकाइयों को उचित अवसर से वंचित करके संदेहास्पद व्यावसायिक हितों को कोयले के पट्टे आवंटित कर दिए। इसलिए संसद में बहस तो नव- उदारवादी नीति के ढांचे में व्यापक र्चचा के अंर्तगत इस असली मुद्दे पर होनी चाहिए थी। अच्छे या बुरे आर्थिक सिद्धांत और भारत तथा अन्य देशों के इस वास्तविक अनुभव के विपरीत यह ढांचा मान कर चलता है कि राजकीय स्वामित्व वाली कंपनियों की तुलना में निजी उपक्रम स्वाभाविक रूप से अधिक कार्य कुशल होते हैं और कि सामाजिक रूप से वांछनीय परिणामों के लिए उनको वरीयता दी जानी चाहिए। इससे निजीकरण और प्राकृतिक संसाधनों की लूट अपरिहार्य हो जाती है।


No comments:

Post a Comment