गोवा और कर्नाटक में अवैध खनन में लिप्त एक दर्जन से अधिक कंपनियों के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो की छापेमारी एक अन्य बड़े घोटाले की ओर देश का ध्यान खींच रही है। खनन के काम में किस तरह हर संभव जगह घपलेबाजी हो रही है, इसका पता गत दिवस ही तमिलनाडु में सतर्कता विभाग की ओर से ग्रेनाइट पत्थर के खनन में अनियमितता के मामले में 34 स्थानों पर छापे की कार्रवाई से भी चलता है। केंद्रीय जांच ब्यूरो की मानें तो 2009-2010 के बीच कर्नाटक से अवैध रूप से 2500 करोड़ रुपये का लौह अयस्क निकालकर चीन और पाकिस्तान निर्यात कर दिया गया। यह काम जिन कंपनियों ने किया उनके स्वामी भाजपा के चर्चित बेल्लारी बंधु हैं। इन बंधुओं के बारे में यह जानना भी जरूरी है कि वे भले ही भाजपा के नेता हों, लेकिन उन्हें लौह अयस्क के खनन के अधिकार पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने दिए थे। इन बंधुओं को खनन का अधिकार आंध्र प्रदेश में मिला था, लेकिन वे कर्नाटक की सीमा से लगी लौह अयस्क खदानों तक फैल गए। एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सीबीआइ की यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद हो रही है। स्पष्ट है कि यदि शीर्ष अदालत दखल नहीं देती तो कोई ठोस कार्रवाई होने वाली नहीं थी। कर्नाटक की ही तरह का मामला गोवा का भी है। गोवा में अवैध खनन की जांच के लिए गठित एमवी शाह आयोग के मुताबिक इस राज्य में 35 हजार करोड़ रुपये से अधिक का अवैध खनन हुआ। आयोग की रपट यह भी कहती है कि नेताओं और नौकरशाहों ने आपराधिक साजिश रचकर खनन कंपनियों को खनन की अनुमति दी। गोवा में अवैध खनन के मामले की गूंज दूसरे देशों में भी सुनाई दी, क्योंकि यह माना जा रहा है कि इस अवैध खनन के चलते राज्य के पर्यावरण को अच्छी-खासी क्षति पहुंची। यहां पर भी हुए अवैध खनन का एक हिस्सा चोरी-छिपे चीन को निर्यात करने की बात सामने आई है। किसी को भी इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि अवैध खनन के ये मामले अपवाद स्वरूप हैं और इनका दायरा कर्नाटक, गोवा और तमिलनाडु तक सीमित है। सच्चाई यह है कि करीब-करीब प्रत्येक राज्य में प्राकृतिक संसाधनों को इसी तरह लूटा जा रहा है। अब इस पर यकीन न करने का कोई कारण नहीं कि यह लूट नेताओं और नौकरशाहों की मिलीभगत से ही हो रही है। हालांकि अवैध खनन के मामले एक लंबे अर्से से सामने आ रहे हैं, लेकिन कोई नहीं जानता कि ऐसी व्यवस्था कब बनेगी जब अवैध खनन को रोका जा सके? कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि अवैध खनन की निगरानी की कोई व्यवस्था ही नहीं है और यदि है भी तो वह पूरी तरह नाकाम हो चुकी है। यह समझना कठिन है कि नियामक संस्थाएं और अन्य जिम्मेदार एजेंसियां उस समय क्या कर रही होती हैं जब न केवल नियम-कानूनों से परे जाकर खनन हो रहा होता है, बल्कि उसे निस्तारित भी किया जा रहा होता है? क्या इससे अधिक आश्चर्यजनक और कुछ हो सकता है कि एक ओर अवैध खनन हो और दूसरे, उसे गुपचुप रूप से दूसरे देशों को भेज दिया जाए? जब ऐसे मामले सामने आते हैं तो इन आरोपों को बल मिलता है कि कुछ लोगों को जानबूझकर प्राकृतिक संसाधनों के लूट का अधिकार दे दिया गया है।
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