कोयला ब्लाक आवंटन में हुई बंदरबांट की नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी कैग की रिपोर्ट के बाद 2जी की तर्ज पर ही मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है। कोर्ट ने नोटिस जारी कर केंद्र सरकार से कई चुभते हुए सवाल पूछे हैं। जाहिर है कि सरकार और खासतौर पर कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल के लिए आने वाले दिन और चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। विशेष संवाददाता जयप्रकाश रंजन ने इस पूरे प्रकरण पर जायसवाल से बातचीत की। सुप्रीम कोर्ट ने कोयला आवंटन विवाद में नोटिस जारी कर दिया है। क्या इससे सरकार की किरकिरी नहीं हुई है? बिल्कुल नहीं। उल्टा हमें भरोसा है कि अब सुप्रीम कोर्ट में ही दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। हम नोटिस का सम्मान करते हैं और इसका यथोचित जवाब देंगे। सुप्रीम कोर्ट ने जो भी सूचनाएं मांगी हैं उन्हें समय पर उपलब्ध कराया जाएगा। लेकिन इसके साथ ही सरकार के स्तर पर आवंटित कोयला ब्लॉकों के प्रदर्शन के आकलन की कोशिश भी जारी रहेगी। क्या अंतर-मंत्रालयी समूह पहले की तरफ काम करता रहेगा? पहले की तरह ही नहीं, बल्कि पहले से भी ज्यादा तेजी व पारदर्शिता से काम करेगा। मुझे पता चला है कि सुप्रीम कोर्ट ने आठ हफ्ते के भीतर जवाब मांगा है। आपको मालूम है कि कोयला मंत्रालय की तरफ से गठित अंतर-मंत्रालयी समूह कोयला ब्लाक लेकर उनका खनन नहीं करने वाली कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर चुका है। हमने फैसला किया है कि यह काम और तेजी से करेंगे। अभी तक सिर्फ 58 कोयला ब्लाकों की समीक्षा की जा रही थी। लेकिन अब हम कैग की रिपोर्ट में जितने कोयला ब्लाकों का नाम दिया गया है उन सबकी समीक्षा एक महीने के भीतर करेंगे। इससे क्या हासिल होगा? हम सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सारे तथ्यों के साथ जाना चाहते हैं। चूंकि मामला सुप्रीम कोर्ट में है लिहाजा हमें लगता है कि आगे चलकर सरकार की तरफ से अभी तक आवंटित सभी ब्लाकों के बारे में सूचना मांगी जाएगी। इसलिए हम पहले ही अपने स्तर पर इन ब्लाकों की विस्तृत समीक्षा कर लेना चाहते हैं। जिन ब्लाकों को वादे के मुताबिक कंपनियों ने विकसित नहीं किया है उनके खिलाफ कार्रवाई भी लगातार की जाती रहेगी। आपको नहीं लगता कि सरकार ने खुली निविदा के जरिये कोयला ब्लाकों का आवंटन न कर भूल की? देखिए, मैं स्वीकार करता हूं कि खुली निविदा के जरिये कोयला ब्लाक आवंटित करने में देरी हुई है, लेकिन यह भी ध्यान में रखना होगा कि सरकार को किन परिस्थितियों में कोयला ब्लाकों का आवंटन करने का फैसला करना पड़ा। यूपीए-1 ने सबसे पहले कोयला ब्लाक आवंटन में खुली निविदा अपनाने का फैसला किया था, लेकिन कोयला उत्पादक राज्यों ने इसका मुखर विरोध किया। अगर कोयला ब्लाक आवंटित नहीं किए जाते तो आने वाले दिनों में देश की आर्थिक विकास दर प्रभावित होती, क्योंकि बिजली, स्टील जैसे उद्योगों को कोयला नहीं मिलता। इसलिए यूपीए-1 ने स्क्रीनिंग कमेटी के जरिये कोयला ब्लाक आवंटन का फैसला किया और साथ ही राज्यों को मनाने की भी कोशिश जारी रखी, जो अंतत: सफल भी हुई। हमने यह व्यवस्था की है कि निजी कंपनियों के कुल मुनाफे का 26 फीसद स्थानीय विकास में खर्च किया जाएगा। कोयला ब्लाक पाई एक कंपनी का नाम आपके साथ जोड़ा गया है, इस मामले में आप क्या सफाई देंगे? यह बहुत बड़ा भ्रम फैलाया जा रहा है। जिस तथाकथित कंपनी के एक शेयरधारक मनोज जायसवाल के साथ मेरा नाम जोड़ा जा रहा है उनकी कंपनी को सबसे पहले राजग के कार्यकाल में कोयला ब्लाक दिया गया था। यह भी जान लीजिए कि इन महानुभाव की कंपनी को मेरे कार्यकाल में कोई कोयला ब्लाक नहीं दिया गया। लेकिन आप तो इनकी कंपनी के शेयरधारकों के बीच हुए एक विवाद में मध्यस्थ बने थे.. (बात काटते हुए) ..बिल्कुल नहीं। एक समाचार चैनल ने यह खबर फैलाई है और वह सरासर गलत है। चैनल ने दिखाया है कि इस कंपनी के शेयरधारकों के बीच हुए विवाद में मुझे मध्यस्थ बनाने का प्रस्ताव भेजा गया। लेकिन मेरा सवाल यह है कि क्या मैंने इस प्रस्ताव को स्वीकार किया था। जब मैं गृह राज्यमंत्री था तब ये लोग मुझसे मिलने आए थे कि मैं मध्यस्थता कर दूं। लेकिन मैंने साफ इन्कार कर दिया था। जिस प्रस्ताव का लोग जिक्र कर रहे हैं उसे कोई भी किसी के भी नाम पर बना सकता है। कोयला मंत्री का पद संभालने के बाद आपको ऐसा नहीं लगा कि आवंटन में गड़बड़ी हुई है और जांच करवानी चाहिए? देखिए कोयला मंत्री बनने के बाद मैंने सबसे पहला काम यह किया कि जिन कंपनियों को ब्लाक दिए गए थे उनकी समीक्षा शुरू करवाई। इस पूरे विवाद पर हल्ला मचाने वालों को मैं यह बताना चाहूंगा कि कैग की रिपोर्ट आने से कई वर्ष

No comments:
Post a Comment