Tuesday, September 18, 2012

नाजुक मोड़ पर मनमोहन सिंह


उत्तर मध्ययुगीन काल के राजा-महाराजाओं की तरह मुगल शासकों को भी अपने नाम का महिमामंडन पसंद था। जहांगीर या शाहजहां के लिए भारी-भरकम बादशाहों के बादशाह जैसे संबोधनों के साथ दरबार में आने की परंपरा थी। मुगलों के प्रताप के वक्त जब दुनियाभर में तिमूर के दरबार की तूती बोलती थी तब महिमा का बखान करने वाले इस तरह के आडंबरों की विश्वसनीयता हुआ करती थी, लेकिन एक बात जो न केवल बेतुकी थी, बल्कि हास्यास्पद भी वह यह कि शाह आलम और बहादुर शाह जफर के शासनकाल में भी इस तरह के महिमामंडन की जिद पर अड़े रहा जाता था। उनके दरबारी 1857 तक अपनी इस जिद पर अड़े रहे। गौर करने वाली बात यह है कि ये तमाम हास्यास्पद आडंबर किस तरह एक साम्राज्य से गणतंत्र में आ गए। ठीक इसी तरह 1970 और 1980 के दशकों में इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नाम से पहले यदि कोई प्रभावशाली विशेषण नहीं जोड़ा जाता था तब तक मानो लोगों को पता ही नहीं चलता था कि प्रधानमंत्री इंदिरा और राजीव गांधी की बात हो रही है। आपातकाल के दौरान डीके बरुआ ने इंदिरा की तुलना इंडिया से करते हुए दोनों को एक समान बताया। एक दूसरे कांग्रेसी नेता कल्पनाथ राय ने राजीव गांधी को हीरा बताया था। पिछले आठ सालों से यानी जब से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री नियुक्त किया है, यह सभी के लिए जरूरी हो गया है कि उनका आकलन करने से पहले उनकी शिक्षा, विद्वता और स्वच्छ छवि का ध्यान जरूर रखा जाए। हालांकि यह बात मीडिया पर लागू नहीं होती। ऐसा नहीं है कि इस तरह की प्रशंसा हमेशा चाटुकारिता या मक्खन लगाने के लिए ही की जाती है। यह कहना गलत नहीं होगा कि ज्यादातर भारतीय खासतौर पर मध्यवर्गीय लोग प्रधानमंत्री को सम्मान और सशंकित, दोनों भावों से देखते हैं। 2009 में भाजपा ने जनता के तेवर को भांपने में गलती की और प्रधानमंत्री के कमजोर नेतृत्व पर जमकर हमला बोला, लेकिन जनता ने संप्रग सरकार को दोबारा चुनकर भाजपा को करारा जवाब दे डाला। अब पिछले तीन सालों के दौरान जनमानस में बड़ा बदलाव आया है। अकबर से लेकर औरंगजेब तक और बाद के मुगल शासकों को एक चश्मे से नहीं देखा जा सकता। ठीक इसी तरह आज उस प्रधानमंत्री में, जो उदारवाद का प्रणेता था और वह प्रधानमंत्री, जो उम्मीदों के भारत को निराशाओं से घिरे भारत में तब्दील होते देख असहाय व्यक्तित्व बनकर खड़ा है, में स्पष्ट तौर पर अंतर किया जा सकता है। हम चारों तरफ से घिरे प्रधानमंत्री के बारे में अब भी उन्हीं तमाम विशेषणों का इस्तेमाल देख सकते हैं, लेकिन आज इनका इस्तेमाल करना उतना ही अपराध बोध कराता है जितना बहादुर शाह जफर के दरबार में उन्हें विश्व को रास्ता दिखाने वाला कहते हुए सुना जाना। हाल ही में आई वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट वास्तव में सम्मानजनक तरीके से आग्रह कर रही थी कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इतिहास के पन्नों में हंसी के पात्र बनने के मुहाने पर खड़े हैं। अगस्त 2010 में राष्ट्रमंडल खेलों से प्रधानमंत्री की डगमगाई प्रतिष्ठा की एक पड़ताल कीजिए। तब प्रधानमंत्री इस घोटाले की आग में झुलसने से बाल-बाल बचे थे और सारा कलंक एक पेशेवर राजनेता के हिस्से चला गया था, जो भारतीय ओलंपिक समिति को अपनी जागीर समझ बैठा था। तब प्रधानमंत्री पर सिर्फ इतना ही आरोप लगा था कि वह एक प्रभावी खेल मंत्री को नियुक्त करने में असफल रहे, जो सुरेश कलमाड़ी पर नजर रखता। राष्ट्रमंडल खेलों पर मचे हंगामे के बाद 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में हुए घोटाले का बम फूटा। इसमें प्रधानमंत्री पर भी आंच आई। हालांकि इसमें भी पहले आओ, पहले पाओ की नीति का सारा ठीकरा द्रमुक पर फोड़ दिया गया और कपिल सिब्बल ने यह सुनिश्चित किया कि इस विस्फोट का धुंआ भी कांग्रेस तक न पहुंचे। फिर यह भी कहा गया कि ए. राजा ने प्रधानमंत्री को भ्रम में रखा और प्रधानमंत्री ने गठबंधन धर्म की मजबूरियों के चलते दूसरा रास्ता अपनाया। संक्षेप में कहें तो यह स्थापित कर दिया गया कि प्रधानमंत्री को सही और गलत का अंदाजा था और वह इस नीति के खिलाफ नहीं थे कि योग्य को बेहतर मौका मिलना चाहिए। अब आया कोलगेट। इसमें वही मंत्रालय शामिल रहा जिसके मंत्री कभी खुद प्रधानमंत्री हुआ करते थे। भले ही सरकार ने संसद न चलने देने की बात रेखांकित कर भाजपा के खिलाफ अपने कुछ लक्ष्य हासिल कर लिए हों, लेकिन इससे सरकार के किए पर पर्दा नहीं डलने वाला। वह भी तब जब इस बात के प्रमाण हों कि सरकार ने मनमाने तरीके से कोयला खदानों का आवंटन किया, जबकि उसके पास नीलामी का बेहतर विकल्प था। हाल ही में हुए खुलासे कहते हैं कि कोयला मंत्रालय ने प्रधानमंत्री कार्यालय के दबाव में आकर ही कुछ बेहतर संबंध रखने वालों को विवेक आधारित आवंटन का रास्ता चुना। यानी मंत्रियों ने अपने नजदीकी मित्रों और रिश्तेदारों को उन खदानों का आवंटन कर दिया। इस बार प्रधानमंत्री कोयले में लगी आग में बुरी तरह झुलस गए। अब वह डर के मारे चुप्पी साधे हुए हैं। उनकी प्रतिष्ठा पर धब्बा लग गया है और फिलहाल वह राजनीतिक जीवन रक्षक प्रणाली पर चल रहे हैं। पिछले कुछ दिनों में प्रधानमंत्री ने आर्थिक मोर्चे पर कुछ सख्त कदम उठाकर अपनी उपस्थिति का संदेश दिया है, लेकिन इससे सवाल समाप्त होते नजर नहीं आ रहे हैं, खासकर वे सवाल जो उन्हें कमजोर और असहाय प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित कर रहे हैं। प्रधानमंत्री काबचाव करने वाले अब भी अपनी कोशिश में लगे हैं और कह रहे हैं कि इस पूरे मामले में प्रधानमंत्री को अंधेरे में रखा गया। हो सकता है कि अब यह तर्क भी दिया जाए कि बेचारे ईमानदार प्रधानमंत्री इस गंदी राजनीति में क्या करते, जब उन्हें किसी अदृश्य, लेकिन प्रभावशाली शक्ति के आदेशों का पालन करना ही पड़ता है। दुर्भाग्य से इस तरह की दलीलें और अधिक गंभीर सवालों को जन्म देती हैं, जिनके जवाब प्रधानमंत्री की छवि को और धूमिल करने वाले हैं। अब स्थिति यह है कि प्रधानमंत्री के राजनीतिक कॅरियर पर पर्दा गिर रहा है। भले ही इसका कोई अंत दिखाई न दे रहा हो, लेकिन जनता अब पूरी कहानी समझ चुकी है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)


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