Tuesday, September 11, 2012

भूदान की जमीन भी निगल गए घोटालेबाज


ठ्ठ सुरेंद्र प्रसाद सिंह, नई दिल्ली घोटालेबाजों ने भूदान आंदोलन के प्रणेता आचार्य विनोबा भावे को भी नहीं बख्शा। डेढ़ दर्जन राज्यों में भूदान में बंटी 48 लाख एकड़ भूमि में 23 लाख एकड़ जमीन घोटालेबाज निगल गए। दशकों से चल रहे इस खेल में लाखों एकड़ जमीन कब और कहां गायब हो गई, केंद्र को इसकी भनक तक नहीं लगी। मामला सामने आते ही यह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक पहुंच गया है। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखने के साथ-साथ राजस्व मंत्रियों के सम्मेलन में भी इसे उठाने की बात कही है। विनोबा भावे के भूदान आंदोलन के दौरान 1952 से 1977 तक कुल 47.64 लाख एकड़ जमीन भूमिहीनों व आदिवासियों को बांटने के लिए लोगों ने दान दी थी। इस जमीन की निगरानी के लिए राज्य सरकारों ने बोर्ड का गठन किया और इसके चेयरमैन को मंत्री का दर्जा भी दे रखा है। जमीन की निगरानी के लिए लोग लालबत्ती लगाए घूमते ही रहे और 23 लाख एकड़ से ज्यादा जमीन लापता हो गई। वैसे तो इसकी गुनाहगार 19 राज्य सरकारें हैं, लेकिन झारखंड व बिहार सब पर भारी हैं। भूदान में झारखंड के हिस्से 15 लाख एकड़ जमीन मिली थी, लेकिन पांच लाख एकड़ जमीन ही भूमिहीनों में बांटी जा सकी। यहां 9.80 लाख एकड़ जमीन वितरित नहीं हुई। जबकि इस जमीन का प्रबंधन सरकार के हाथ में है और भूदान प्राधिकरण पर इसका जिम्मा है। बिहार में भूदान अधिनियम-1954 है। शुरुआत में भूदान बोर्ड के अध्यक्ष को विनोबा जी खुद नामित करते थे, लेकिन राज्य सरकार ने 1983 में संशोधन कर बोर्ड के सारे अधिकार खुद रख लिए। बिहार में कुल 6.48 लाख एकड़ में 3.94 एकड़ जमीन भूमिहीनों में नहीं बांटी जा सकी। राजस्थान में भी जमीन का प्रबंधन सरकार के हाथ है। राज्य सरकार ने भूदान अधिनियम 1954 को संशोधित कर 2003 में इसका प्रबंधन राज्य प्रशासन को सौंप दिया। आलम यह है कि 4 लाख एकड़ जमीन भूमिहीनों में नहीं बांटी जा सकी। भूमि सुधार का दम भरने वाले प. बंगाल में भूदान में मिली जमीन के तीन चौथाई हिस्से पर न जाने कौन काबिज है? भूदान में मिली 16 हजार एकड़ जमीन में 7 हजार एकड़ जमीन बिन बांटे ही कहां पड़ी है पता नहीं। भूदान की जमीन जरूरतमंदों में बांटने के लिए 1962 में विधानसभा ने कानून पारित कर दिया। लेकिन बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार ने 1977 में इस कानून को रोक दिया। भूदान में जमीन दान देने वाला पहला गांव उत्तर प्रदेश का मांगरोठ था। भूदान की जमीनों का प्रबंधन करने के लिए भूदान अधिनियम 1952 पारित किया गया था, लेकिन 1984 में भूदान बोर्ड को भंग कर दिया गया। यही वजह है कि राज्य में 17,404 एकड़ भूमि का अता-पता नहीं है। पंजाब में 5 हजार एकड़ जमीन में सिर्फ एक हजार एकड़ भूमि ही बांटी गई। राज्य में 1982 के बाद से ही भूदान बोर्ड भंग है। विनोबा जी के संगठन सर्व सेवा संघ ने ग्रामीण विकास मंत्री से इस घोटाले से परदा उठाने का आग्रह किया है। केंद्र ने राजस्व मंत्रियों का सम्मेलन बुलाया है, जिसमें इस मुद्दे पर राज्यों के साथ विचार-विमर्श किया जाएगा। रमेश ने प्रधानमंत्री को भी पत्र लिखकर इसकी जानकारी दे दी है।


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