Thursday, September 6, 2012

बहस के भ्रामक होने का खतरा

कोयला ब्लॉक आवंटन प्रकरण में मूल बात यह है कि प्रधानमंत्री पर जो आरोप लगे हैं वे अतिशयोक्तिपूर्ण हैं व पूरी जांच- पड़ताल से पहले ही लगा दिए गए हैं। इस लिहाज से प्रधानमंत्री के त्यागपत्र की मांग अनुचित है। विपक्ष को संसद में तथ्य आधारित व तर्कपूर्ण बहस कर अपनी सही लोकतांत्रिक भूमिका निभानी चाहिए। साथ ही जोर देकर यह भी कहना चाहिए कि इतनी अधिक कैपटिव खदान आवंटन करने का निर्णय भी कतई उचित नहीं था। यदि सरकार विपक्ष की खदान आवंटन को निरस्त करने की मांग को स्वीकार कर ले तो इससे सरकार की गरिमा बढ़ेगी। पर इसके बाद का समाधान यह नहीं है कि नीलामी की जाए, अपितु दीर्घकालिक समाधान तो यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को सुधार कर देश की जरूरतों के अनुकूल कोयला-उत्पादन किया जाए। कुल मिलाकर यह अच्छा ही रहा है कि पिछले एक-दो वर्षो में भ्रष्टाचार का मुद्दा इतना उभर कर लोगों के सामने आया है और इस पर इतनी व्यापक र्चचा हुई है। भ्रष्टाचार की समस्या वास्तव में बहुत गंभीर है और विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार देश को बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर रहा है। इस बीच भारतीय लोकतंत्र का खुलापन और निर्भीकता इस रूप में और निखर कर सामने आए कि आंदोलनों ने खूब जमकर सरकारी भ्रष्टाचार की धज्जियां उड़ाई और सरकारी तंत्र के भीतर से भी भ्रष्टाचार की पोल खोली गई। पर साथ ही यह भी सच है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जरूरी संतुलन न रखा गया तो ऐसे अतिरंजित और एकपक्षीय दावे गंभीर गलतफहमियां भी पैदा कर सकते हैं और यह बहस समझ बढ़ाने के स्थान पर भ्रामक हो सकती है। आम तौर पर लोगों में भ्रष्टाचार की समझ यह है कि किसी अधिकारी या नेता ने कितना पैसा रिश्वत में लेकर कोई गलत काम किया। लेकिन अब कोयला घोटाले जैसे मामलों में सीएजी एक अलग तरह के भ्रष्टाचार का मामला उठा रहा है कि कोयला खदानों के आवंटन में सरकार को कितनी संभावित क्षति उठानी पड़ी। यह अलग बात है कि सीएजी के अनुमान कितने सही हैं, पर इतना स्पष्ट है कि यह दो तरह के नजरिए हैं भ्रष्टाचार को देखने के और दोनों में जो फर्क है वह लोगों के सामने स्पष्ट होना चाहिए। पर यदि ऐसा न हो और सीएजी के भ्रष्टाचार के बहुत मोटे अनुमान को ही लोग यह समझें कि इतना रुपया सरकार में कोई खा गया तो यह बेहद विसंगतिपूर्ण होगा। इस मामले में और भी गंभीर विसंगति हो जाती है क्योंकि जिस समय की बात हो रही है, उस समय कोयला मंत्रालय प्रधानमंत्री के पास था। इस तरह आम लोगों में एक भ्रांति फैलती है कि प्रधानमंत्री या उनके किसी नजदीकी ने इतना भ्रष्टाचार किया। तिस पर जब आंदोलनकारी प्रधानमंत्री पर अभद्र टिप्पणी करते हुए सड़क पर आ जाते हैं और देश भर के लोग इसे टीवी पर देखते हैं तो यह विसंगति और भी बढ़ जाती है। पूरे प्रकरण में संतुलित खबर कुछ इस तरह बनती है- सीएजी ने अपने अनुमान प्रस्तुत किए हैं जिनके अनुसार कोयला खदानों के आवंटन में सरकार को इतने रुपयों की हानि हुई, जबकि सरकारी पक्ष का कहना है कि यह आरोप भ्रांतिपूर्ण है व कुछ अन्य जानकार व्यक्तियों ने भी सीएजी के हिसाब-किताब पर सवाल उठाए हैं। इस संतुलित समझ पर आगे बहस हो सकती है जिससे पता चले कि कौन-सा पक्ष सचाई के अधिक नजदीक है। लेकिन इस समय ऐसा नहीं हो रहा है। एक तो पहले सीएजी की ओर से ही जो अनुमान आ रहे हैं, उनके बारे में लगता है कि जो ज्यादा से ज्यादा क्षति का आंकड़ा प्रस्तुत किया जा सकता है वही किया जाता है। कभी- कभी अनुमान संसद में चर्चित हों इससे पहले ही उन पर बड़ी सी हेडलाइन बन जाती हैं। तिस पर भ्रष्टाचार के विरुद्ध सक्रिय कुछ आंदोलनकारी मिर्च-मसाला लगाकर इस पर आक्रामक बयान दाग देते हैं, जिससे यह प्रतीत होने लगता है कि जो अधिकतम आंकड़ा प्रस्तुत किया गया था, वह प्रामाणिक सच है, उस पर आगे कुछ बहस करना तो महज लीपापोती होगा। यदि भ्रष्टाचार पर लीपापोती अनुचित है, तो यह उग्र तौर-तरीके भी अनुचित हैं जिनमें चीख-चिल्ला कर लोगों के दिलो-दिमाग में भ्रष्टाचार के सबसे ऊंचे आंकड़ों को जबरदस्ती पहुंचा दिया जाता है, हालांकि हकीकत यह होती है कि यह एक पक्ष से आया अनुमान है जिसकी अभी जांच-पड़ताल करने के बाद ही सही समझ बनाई जा सकती है। जहां तक कोयले के खनन में भ्रष्टाचार व अनियमितताओं का सवाल है, तो इसकी लंबी कहानी है। औपनिवेशिक राज के दिनों व उसके बाद भी निजी खनन कंपनियों ने इस क्षेत्र का दोहन महज मुनाफे के दृष्टिकोण से किया जिससे मजदूरों, पर्यावरण, खेती-किसानी की बहुत क्षति हुई। इसीलिए कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण हुआ जिससे कुछ हालात सुधरे, पर राष्ट्रीयकरण के बावजूद अनेक प्रभावशाली लोग अपने स्वार्थ साधते रहे और सरकारी क्षेत्र की कंपनियों में भी भ्रष्टाचार पनपने लगा। एक ओर खनन के लक्ष्य प्राप्त नहीं हुए और दूसरी तरफ पर्यावरण सुधार के जरूरी कार्य उपेक्षित रह गए। राष्ट्रीयकरण की इन समस्याओं को सुलझाने के स्थान पर बिजली, स्टील व सीमेंट उत्पादन के लिए कोयले के कैपटिव उत्पादन की खदानें निजी क्षेत्र को देने के लिए कोयला राष्ट्रीयकरण कानून में तीन संशोधन किए गए। यह संशोधन व कैपटिव खदानों का प्रावधान ही मौजूदा भ्रष्टाचार की जड़ है। यह प्रावधान ही ऐसा है कि इससे भ्रष्टाचार की संभावना उत्पन्न होती है। इस तरह राष्ट्रीयकरण की नीति में कई छेद कर दिए गए। इस समय भ्रष्टाचार के जो बड़े मामले उठे हैं, वे कैपटिव खदानों से ही जुड़े हुए हैं। यदि खनन ठीक से चलता तो कैपटिव खदानों की नौबत ही न आती। एक बार कोयले के प्राथमिकता भरे उपयोगों के लिए कैपटिव खदान के चक्कर में पड़ जाने पर कोयला खनन का समग्र व संतुलित विकास नहीं हो सकेगा, इस बुनियादी बात की ओर तो ध्यान ही नहीं दिया गया। ऐसी स्थिति में सरकारी नीतियां जो कोयले क्षेत्र का संतुलित विकास कर सकती हैं, उनकी संभावना बहुत कम हो जाती है। विशेष ध्यान देने की बात यह है कि इस भ्रष्टाचार के आरोप का उपयोग अब राष्ट्रीयकरण कानून को ही रद्द करने के लिए किया जा रहा है। ऐसा ही पहले हुआ था जब कोयले की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ने कुछ समस्याएं आने पर उन्हें सुधारा नहीं, अपितु कैपटिव खदान के रूप में बड़ी कंपनियों को बहुत बड़ी खदानें देने की तैयारी कर ली थी। अब भ्रष्टाचार के आरोपों की आड़ में नई तोप दागी जा रही है कि केवल कैपटिव खदानों को ही क्यों, पूरे कोयला क्षेत्र को ही बड़ी खनन कंपनियों को सौंप देना चाहिए, जो अपनी विशेषज्ञता का उपयोग कर बेहतर खनन कर सकेंगी। इस तरह विश्व की सबसे बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए भारतीय कोयले के द्वार सदा के लिए खोलने की तैयारी भ्रष्टाचार के आरोपों की आड़ में शुरू हो गई है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह कहानी कहां से शुरू हुई थी और जब इन कंपनियों ने भारतीय कोयला खदानों से महज मुनाफे की दृष्टि से कोयले का खनन कर कोयला खदानों का सत्यानाश कर दिया था, तभी राष्ट्रीयकरण की जरूरत पड़ी थी। आज कोयला खनन क्षेत्र की अनेक बड़ी समस्याएं उन्हीं दिनों के विनाशकारी खनन की देन हैं। व्यापक स्तर पर भी यह उचित रहेगा कि भ्रष्टाचार के मुद्दे के विभिन्न पक्षों पर एक संतुलन बनाकर बहस आगे बढ़े। इसमें कोई संदेह नहीं कि कुछ क्षेत्रों में भ्रष्टाचार वास्तव में तेजी से बढ़ा है। विभिन्न आरोप-प्रत्यारोपों के बीच सचाई आम लोगों के सामने आ सके, इसमें मीडिया की बड़ी भूमिका है।

कोयला आवंटन मामले में प्रधानमंत्री पर जो आरोप लगे हैं वे अतिशयोक्तिपूर्ण हैं और पूरी जांच-पड़ताल से पहले ही लगा दिए गए हैं। विपक्ष को संसद में तथ्य आधारित व तर्कपूर्ण बहस में भागीदारी कर अपनी सही लोकतांत्रिक भूमिका निभानी चाहिए भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कुछ संतुलन न रखा गया तो ऐसे अतिरंजित और एकपक्षीय दावे गंभीर गलतफहमियां भी पैदा कर सकते हैं और यह बहस समझ बढ़ाने के स्थान पर भ्रामक हो सकती है


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