Tuesday, September 18, 2012

योजना आयोग ने दिया कोयला खदान राष्ट्रीयकरण अधिनियम में संशोधन का सुझाव


रोशन/एसएनबी नई दिल्ली (एजेंसी)। कोयला घोटाले की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई कि योजना आयोग ने इस क्षेत्र को भी पूरी तरह से निजी क्षेत्र के लिए खोलने की पुरजोर वकालत की है। आयोग का तर्क है कि पेट्रोलियम क्षेत्र को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया गया है तो कोयला खदानों को क्यों नहीं खोला जा सकता। आयोग ने कोयला खदान राष्ट्रीयकरण अधिनियम को बदलने की सिफारिश की है। खदानों का आवंटन केवल नीलामी से करने की भी सिफारिश की है। हालांकि खुली प्रतियोगिता होने से कोयला की दरें बढ़ेंगी जिससे बिजली से लेकर लोहा, स्टील महंगा हो जाएगा। अभी तक सरकार ने केवल कैप्टिव कोल माइनिंग यानी ऊर्जा और बिजली उद्योग से जुड़े निजी क्षेत्र को कोयला ब्लॉक आवंटित किए हैं। इनमें ही निजी क्षेत्र ने तिकड़म करके घोटाला किया जो आज देश में र्चचा का विषय बना हुआ है। इस घोटाले से बेपरवाह योजना आयोग ने दो मौकों पर अपनी मंशा जाहिर की है। प्रधानमंत्री ने कोयला क्षेत्र संबंधी एक स्वतंत्र प्राधिकरण के गठन के लिए एक मंत्रिसमूह बनाया है। समूह की बैठक 25 अगस्त को हुई थी जिसमें योजना आयोग ने अपनी तरफ से एक प्रस्ताव रखा था कि कोल माइनिंग नेशनलाइजेशन एक्ट को बदला जाए ताकि निजी क्षेत्र को पूरी तरह से कोयला खदान क्षेत्र में अनुमति मिल सके। इससे खुली प्रतियोगिता हो जाएगी और देश की जरूरत पूरी हो सकेगी। आयोग ने दूसरी बार अपना प्रस्ताव 15 सितम्बर को हुई योजना आयोग की पूर्ण बैठक में रखा। आयोग का तर्क है कि 12वीं योजना में देश की जरूरत के मुताबिक 795 मिलियन टन कोयला चाहिए जिसमें से कैप्टिव कैपेसिटी मात्र 64 मिलियन टन है। कोल इंडिया लिमिटेड की क्षमता सीमित है इसलिए 2017 तक देश में 185 मिलियन टन कोयला आयात करना होगा। आयोग का कहना कि यदि निजी क्षेत्र को प्रवेश दिया जाए तो कोयला उत्पादन में तेजी आएगी और देश की आर्थिक विकास का लक्ष्य 8.2 प्रतिशत किया जा सकेगा अन्यथा मुश्किल होगी। आयोग ने अपने तर्क को यह कहकर मजबूती दी है कि पेट्रोलियम क्षेत्र कोयला से ज्यादा मूल्यवान संसाधन है। सरकार ने इस क्षेत्र को निजी हाथों में सौंप दिया है तो कोयला क्षेत्र को न सौंपने का कोई कारण नजर नहीं आता। आयोग ने पर्यावरणीय मंजूरी में होने वाली देरी पर भी चिंता जताई और एक इंटर मिनिस्ट्रियल कोआर्डिनेशन कमेटी के गठन का सुझाव दिया। मालूम हो कि पहले कोयला खदान निजी क्षेत्र में थे लेकिन 1971-72 में केंद्र सरकार ने खदानों को राष्ट्रीयकरण कर कोयला खदानों का हक सरकारी कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड को दे दिया। बाद के सालों में सरकार ने निजी क्षेत्र को कैप्टिव माइनिंग की अनुमति दे दी। आयोग ने प्राकृतिक संसाधनों का आवंटन केवल नीलामी से करने की सिफारिश की है। जाहिर सी बात है कि नीलामी में ऊंची बोली लगेगी। इससे सरकार को मोटी आमदनी होगी लेकिन उसका असर बाजार पर पड़ेगा और चीजें महंगी होंगी।

दलील दी, ज्यादा मूल्यवान पेट्रोलियम क्षेत्र को निजी हाथों सौंपा तो कोयला क्यों नहीं खदानों का आवंटन केवल नीलामी से करने की भी सिफारिश की खुली प्रतियोगिता होने से कोयला की दरें बढ़ेंगी, बिजली, लोहा, स्टील होंगे महंगे


1 comment:

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    Coal Mines






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