Friday, September 30, 2011

मोदी के सुशासन में पलीता लगा रहे 2500 भ्रष्ट अधिकारी

गुजरात के 2500 भ्रष्ट अधिकारी मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के सुशासन के दावे में पलीता लगाने में जुटे हैं। सरकार भले राज्य प्रशासन के साफ सुथरे होने की वकालत करती हो लेकिन सतर्कता आयोग की रिपोर्ट इसकी पोल खोल देती है। बीते तीन सालों में प्रदेश के 21,300 से ज्यादा अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत हुई है। सतर्कता आयुक्त ने इनमें से 2500 के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की है। विधानसभा में पेश सतर्कता आयोग की वर्ष 2010 की रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2008 से 2010 के दौरान प्रदेश के 21,518 अधिकारियों व कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतें हुई हैं। मुख्य सतर्कता आयुक्त डॉ. मंजुला सुब्रमण्यम ने इन मामलों की जांच के बाद राज्य सरकार को 2,505 अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की है। दोषी पाए गए अधिकारियों में 13 भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं जबकि 1385 राजपत्रित व 1148 गैर राजपत्रित अधिकारी शामिल हैं। राज्य भर से सबसे अधिक शिकायतें राजस्व विभाग के अधिकारियों के खिलाफ हुई हैं जबकि पंचायत विभाग के अधिकारियों के खिलाफ 999 शिकायतें जबकि शिक्षा तथा गृह विभाग के खिलाफ करीब 750 जबकि स्वास्थ्य विभाग के खिलाफ सबसे कम 362 शिकायतें प्राप्त हुई हैं। गौरतलब है कि सतर्कता आयोग को वर्ष 2008 में 7186, वर्ष 2009 में 7093 जबकि वर्ष 2010 में सतर्कता आयोग को कुल 7339 शिकायतें प्राप्त हुई थीं। आयुक्त डॉ. मंजुला ने शिकायतों की जांच के बाद 2505 अधिकारियों के खिलाफ सरकार को कार्रवाई की सिफारिश की है। आयोग ने 26 राजपत्रित अधिकारियों के खिलाफ आइपीसी, 440 के खिलाफ अखिल भारतीय सेवा नियमों के मुताबिक, 14 के खिलाफ पेंशन नियमों के तहत करीब 500 अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की है।

वित्त मंत्रालय की फाइल से कुछ पन्ने गायब

2जी घोटाले में गृह मंत्री पी. चिदंबरम को मुश्किल में डालने वाले दस्तावेज दस्तावेज सुप्रीम कोर्ट पहंुच गए हैं। सीबीआइ ने गुरुवार को पूर्व वित्त सचिव डी सुब्बाराव के बयान के साथ वित्त मंत्रालय के अन्य दस्तावेजों की फाइल सुप्रीम कोर्ट को सौंपी। अदालत ने फाइल देखी और कुछ पृष्ठ गायब होने पर उसे ठीक करके दोबारा देने को कहा है। इन दस्तावेजों में सुब्बाराव का वह बयान शामिल है जिसमें उन्होंने नीलामी के जरिये स्पेक्ट्रम आवंटन की बात कही थी जबकि तत्कालीन संचार मंत्री ए. राजा ने कंपनियों को 2001 की कीमत पर 2008 में स्पेक्ट्रम आवंटित कर दिया। सुब्बाराव की यह सिफारिश प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजे गए वित्त मंत्रालय के चर्चित नोट का हिस्सा भी बनी है। सुब्बाराव इस समय रिजर्व बैंक के गवर्नर हैं। मामले की अगली सुनवाई 10 अक्टूबर को होगी। जिरह के दौरान सीबीआइ चिदंबरम के बचाव के अपने रुख पर कायम है। उसने कहा कि वित्तमंत्री को राजनीतिक कारणों से निशाना बनाया जा रहा है। वित्त मंत्रालय का नजरिया तो शुरू से ही नीलामी के जरिये स्पेक्ट्रम देने का था। लाइसेंस, शेयर सभी में यही नजरिया था। इस संबंध में वित्त मंत्रालय ने 7 जनवरी 2008 को एक नोट भी तैयार किया था। जिस पर 9 जनवरी को होने वाली टेलीकाम कमीशन की पूर्ण बैठक में चर्चा होनी थी लेकिन ये बैठक 15 जनवरी 2008 तक के लिए टाल दी गई और इस बीच राजा ने 10 जनवरी 2008 को लाइसेंस आवंटित कर दिए। एजेंसी ने कहा कि जब तक राजा को रोका जाता तब तक उन्होंने लाइसेंस आवंटित कर दिए थे। इस पर याचिकाकर्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि उस दिन सिर्फ आशय पत्र जारी हुए थे स्पेक्ट्रम तो बहुत बाद में दिया गया। अत: इसे रोकने के लिए काफी समय था। सीबीआइ ने दलील काटते हुए कहा कि वित्त मंत्री को अकेले लाइसेंस रद करने का अधिकार नहीं था। यह सरल निर्णय नहीं था यह तो पूरी सरकार को निर्णय लेना था उसके परिणाम देखने पड़ते। उसने एसआइटी गठन का भी विरोध किया और कि इस मामले की बिना प्रभावित हुए जांच की गई है।

Thursday, September 29, 2011

भ्रष्टाचार के मामलों की खुद जांच करना चाहता है सीवीसी

लोकपाल के अधीन लाए जाने की चर्चा के बीच केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) ने भ्रष्टाचार के मामलों की जांच की कमान स्वयं अपने हाथ में लेने की ख्वाहिश जाहिर की है। सीमित अधिकारों का हवाला देते हुए आयोग ने कहा है कि सरकारी दिशा-निर्देशों के कारण उसकी स्वतंत्रता एक दायरे में सिमट कर रह गई है। बुधवार को एक साक्षात्कार के दौरान केंद्रीय सतर्कता आयुक्त प्रदीप कुमार ने कहा कि आयोग के अधीन एक विशेष जांच ब्यूरो का गठन किया जाए जो भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की प्रभावी जांच करने के साथ ही मुकदमे की त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करे। अभी तक सीवीसी मामलों की विजिलेंस रिपोर्ट तैयार आपराधिक जांच के लिए उन्हें सीबीआइ या विभाग के मुख्य सतर्कता आयुक्तों को भेजती है। कुमार ने कहा कि एक ऐसी समर्पित जांच शाखा की जरूरत है क्योंकि कई ऐसे महत्वपूर्ण मामले पहले से ही आयोग के हाथों में हैं जिनकी वह सीधे तौर पर जांच कर रहा है। मालूम हो कि सीवीसी ने अपनी रिपोर्ट में राष्ट्रमंडंल खेलों के दौरान तमाम अनियमितताओं को उजागर किया था। कुमार ने कहा कि मौजूदा कानून के तहत सीवीसी को समूचे सतर्कता प्रशासन की देखरेख की जिम्मेदारी सौंपी गई है। लेकिन सरकार के दिशा-निर्देशों के मुताबिक ही सीवीसी को कार्य करना पड़ता है और इस तरह उसकी स्वतंत्रता सीमित हो जाती है। आयुक्त ने कहा कि कुछ विशेष दिशा-निर्देशों में सुधार लाकर जांच के मानकों को मजबूत बनाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करके ही अनैतिक व्यवहार पर रोक लगाई जा सकेगी। कुमार ने भ्रष्टाचार के मामलों में कठोरता के साथ कदम उठाने और ईमानदार लोगों के लिए बेहिचक काम करने का माहौल सुनिश्चित करने को आयोग की प्राथमिकता बताया। उन्होंने बताया कि विजिलेंस के काम को और उद्देश्यपरक और प्रभावी बनाने के लिए आयोग जांच के अपने मानक विकसित कर रहा है। भ्रष्टाचार के मामलों की बाढ़ का जिक्र करते हुए कुमार ने कहा कि आयोग का भार बढ़ता जा रहा है और मौजूदा मानव संसाधन पर्याप्त साबित नहीं हो रहे हैं। नियुक्तियों का अधिकार आयोग को नहीं है। आयोग ने जरूरी कर्मचारियों की नियुक्ति किए जाने की मांग सरकार से की है। आयुक्त ने कहा कि मौजूदा समय में राष्ट्रमंडल खेलों में अनियमितता और कई अन्य महत्वपूर्ण मामलों की जांच की जा रही है। आयोग की ताजा प्रदर्शन रिपोर्ट के मुताबिक भ्रष्टाचार के लगभग 1681 मामलों का निपटारा किया गया और लगभग 5.94 करोड़ रुपये की राशि जब्त की गई।

Tuesday, September 27, 2011

चिदंबरम की इस्तीफे की पेशकश

प्रणव और चिदंबरम ने की सोनिया से मुलाकात

नई दिल्ली। 2जी स्पेक्ट्रम मामले में वित्त मंत्रालय द्वारा प्रधानमंत्री कार्यालय को लिखे पत्र ने कांग्रेस की राजनीति में ऐसा भूचाल ला दिया दिया है जो थमने का नाम नहीं ले रहा है। इस पूरे प्रकरण से बेहद आहत गृहमंत्री पी चिदंबरम ने सोमवार को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात कर अपने इस्तीफे की पेशकश की। महत्वपूर्ण घटनाक्रम में अमेरिका से लौटने के बाद वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने भी पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात की। प्रणव लगभग एक घंटे तक सोनिया के साथ रहे। इससे पूर्व प्रणव ने चिदंबरम से भी बात की। बताया जा रहा है कि पूरे घटनाक्रम से जितने आहत चिदंबरम हैं, उतने ही नाराज प्रणव मुखर्जी भी हैं और इन दोनों से कहीं ज्यादा आहत प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं। सूत्रों की मानें तो स्वदेश वापसी के बाद प्रधानमंत्री कोई बड़ा पैसला ले सकते हैं। सरकार के दोनों वरिष्ठ मंत्रियों की नाराजगी का कारण यह है कि पूरे घटनाक्रम में जिस तरह से वित्त मंत्रालय और वित्त मंत्री की भूमिका को लेकर संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है, उससे दादा की भौहें तनी हुई हैं। सूत्रों की मानें तो पार्टी अध्यक्ष से मुलाकात में प्रणव ने जहां प्रधानमंत्री से न्यूयार्क में हुई अपनी बातचीत का ब्यौरा दिया, वहीं कहा कि वित्त मंत्रालय के नोट को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।उधर गृहमंत्री पी चिदंबरम ने सोनिया से मुलाकात में साफ कहा कि जिस तरह से उनकी छवि पर सवाल उठाए जा रहे हैं उससे न केवल वह आहत हैं, बल्कि उन्होंने अपने इस्तीफे की पेशकश यह कर की कि वह नहीं चाहते हैं कि उनके कारण पार्टी को असहज स्थितियों का सामना करना पड़े। उन्होंने कहा कि इस मामले की पूरी जांच होनी चाहिए कि उनके खिलाफ राजनीतिक षड़यंत्र के लिए कौन जिम्मेदार है।

चिदंबरम की नाराजगी को इससे भी समझा जा सकता है कि कल बाढ़ का जायजा लेने के लिए उड़ीसा जाने के कार्यक्रम को उन्होंने रद्द कर दिया है। मामले में कुछ भी कहने से पूर्व वह एक बार प्रधानमंत्री से बात करना चाहते हैं। पार्टी नेतृत्व की समस्या यह है कि जितना वह मामले को शांत करने की कोशिशों में जुटा है उतना ही मामला थमने का नाम नहीं ले रहा। पार्टी विधिवेत्ताओं से यह राय भी ले रही है कि क्या वित्त मंत्रालय के नोट को न्यायालय में साक्ष्य के रूप में पेश किया जा सकता है। इससे पूर्व वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने सोमवार को स्वदेश वापसी के बाद अपने मंत्रालय पहुंचकर अधिकारियों से पूरी जानकारी ली। इस पूरे मामले में जहां वित्त मंत्रालय अपने को पाक साफ मान रहा है तो वहीं प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारियों का कहना है कि नोट वित्त मंत्रालय से आया है इसमें उनकी कोई भूमिका नहीं है। कांग्रेस के रणनीतिकार मान रहे हैं कि एक सामान्य नोट के चलते पूरी सरकार का अस्तित्व दांव पर लगा हुआ है। दस जनपथ में दोनों मंत्रियों की कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात के बाद अब पार्टी नेतृत्व को प्रधानमंत्री की स्वदेश वापसी का इंतजार है। सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री की सोनिया गांधी से मुलाकात के बाद ही पार्टी अपनी रणनीति के पत्ते खोलेगी। उधर, सरकार के मंत्री 2 जी नोट को सामान्य प्रक्रिया बताकर मामले को जितना सहज बनाने की कोशिशें में जुटे हैं, पार्टी की अंतर्कलह उनके प्रयासों पर पानी फेर रही है। केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने सोमवार को फिर साफ किया कि सरकार के मंत्रियों में कोई मतभेद नहीं है और वित्त मंत्रालय द्वारा भेजा गया नोट एक सामान्य प्रक्रिया है। उन्होंने फिर गृहमंत्री को ईमानदार और सक्षम मंत्री बताते हुए कहा कि उनके ऊपर संदेह का कोई मतलब ही नहीं है। सरकार के साथ ही पार्टी भी पूरी तरह से चिदंबरम के पक्ष में खड़ी है। पार्टी ने आज फिर चिदंबरम का बचाव करते हुए कहा कि उन्होंने कोई गलत काम नहीं किया है और उनके इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता। पार्टी जहां चिदंबरम का बचाव कर रही है तो वहीं नोट के लिए वित्त मंत्री का भी पक्ष यह कहते हुए ले रही है कि उन्होंने कोई गलत काम नहीं किया। वित्त मंत्री और गृहमंत्री दोनों की चुप्पी से रहस्य और गहराता जा रहा है। केंद्र की यूपीए सरकार के कार्यकाल में पहली बार कांग्रेस पार्टी के मंत्री ही नहीं, प्रधानमंत्री भी निशाने पर हैं। पार्टी की समस्या यह है कि ताजा विवाद में शामिल उसके दोनों ही मंत्री न केवल काफी वरिष्ठ हैं, बल्कि तेज तरार्र भी हैं। पार्टी नेतृत्व मान रहा है कि इस बार का संकट काफी गंभीर है और यदि इससे सही तरीके से नहीं निपटा गया तो सरकार और पार्टी दोनों के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी हो सकती है। मामले की गंभीरता को समझते हुए ही सर्जरी के बाद स्वास्थ्य लाभ कर रहीं पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने स्वयं कमान संभाली। इलाज कराकर वापस लौटने के बाद आज पहली बार उन्होंने अपने दोनों मंत्रियों से लगभग डेढ़ घंटे बातचीत की। सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष के बीच फोन पर बात हुई है। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने विधि मंत्री सलमान खुर्शीद से भी इस मामले में बात की है। पार्टी न्यायालय के रुख को लेकर भी काफी सहमी हुई है। गौरतलब है कि न्यायालय के कड़े रुख के चलते ही पूर्व केंद्रीय मंत्री ए राजा और दयानिधि मारन को अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी थी।

Monday, September 26, 2011

भ्रष्टाचार पर नकेल कसने को छह बिल पेश करेगी सरकार

नई दिल्ली काले धन व भ्रष्टाचार पर चारों तरफ से घिरी केंद्र सरकार अपनी छवि सुधारने में जुटी है। इस संबंध में सरकार ने फैसला किया है कि वह आने वाले दिनों में भ्रष्टाचार या काले धन पर रोक लगाने संबंधी हर विधेयक पर सार्वजनिक बहस कराने के बाद ही उसे संसद में पेश करेगी। प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक व लोक शिकायत राज्य मंत्री वी. नारायणसामी ने यह जानकारी दी। नारायणसामी ने बताया कि प्रधानमंत्री के अमेरिका से लौटने के बाद भ्रष्टाचार निवारण से संबंधित कुछ विधेयकों पर चर्चा होनी है। सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में भ्रष्टाचार निवारण से संबंधित लगभग आधा दर्जन विधेयक पेश करना चाहती है। इसमें एक विधेयक सार्वजनिक खरीद से संबंधित होगा। नारायणसामी ने अन्य विधेयकों का नाम तो नहीं लिया लेकिन माना जा रहा है कि इनमें जन शिकायत विधेयक, न्यायिक जवाबदेही विधेयक, मनी लांड्रिंग निषेध कानून में संशोधन विधेयक सहित कुछ और विधेयक शामिल होंगे। हाल ही में सरकार ने भ्रष्टाचार से संबंधित लोकपाल विधेयक भी पेश किया है, जिस पर संसद की स्थायी समिति विचार विमर्श कर रही है। नारायरणसामी सोमवार को पत्रकारों को आगामी बुधवार से नई दिल्ली में शुरू हो रहे सातवें भ्रष्टाचार विरोधी क्षेत्रीय सम्मेलन के बारे में जानकारी दे रहे थे। एशियाई विकास बैंक (एडीबी) व आर्थिक सहयोग तथा विकास संगठन (ओईसीडी) के संयुक्त तत्वावधान में होने वाले इस सम्मेलन में भारत 27 देशों के साथ काले धन व भ्रष्टाचार की समस्या से लड़ने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय समझौते पर हस्ताक्षर करेगा। सभी हस्ताक्षरकर्ता देश भ्रष्टाचार उन्मूलन व काले धन पर रोकथाम के लिए अपनी विभिन्न एजेंसियों के बीच आपसी सहयोग बढ़ाने का रास्ता निकालेंगे। साथ ही इन मामलों में एक दूसरे को किस तरह की न्यायिक मदद दी जाए, इस बारे में भी सहमति बनेगी। सदस्य देश निजी क्षेत्र में भ्रष्टाचार की समस्या पर भी विचार करेंगे। वे एक ऐसा सर्वमान्य रोडमैप बनाने की कोशिश करेंगे जिसे सभी देशों में एक साथ लागू किया जा सके। इस सम्मेलन का उद्घाटन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल करेंगी। एडीबी और ओईसीडी एशिया व प्रशांत क्षेत्र के देशों में भ्रष्टाचार को खत्म करने तथा सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से यह सम्मेलन आयोजित कराते हैं

सरकार के लिए गले की फांस बन रही आरटीआइ

नई दिल्ली आरटीआइ से सरकार के अंदर की लड़ाई बाहर आ रही है। इससे सरकार भी चिंतित है। वह सूचना के अधिकार कानून में कुछ संशोधन करने पर भी विचार कर रही है। लेकिन ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जाएगा जिससे यह कमजोर हो। वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी की तरफ से 2जी मामले में गृह मंत्री पी. चिदंबरम के बारे में प्रधानमंत्री को लिखे गये पत्र के सार्वजनिक होने से उपजे विवाद पर प्रतिक्रिया जताते हुए कानून व विधि मंत्री सलमान खुर्शीद ने उक्त जानकारी दी। बताते चलें कि एक आरटीआइ के जरिए ही वित्त मंत्री के इस पत्र का खुलासा हुआ है। इससे यूपीए सरकार के बीच अजीब स्थिति उत्पन्न हो गई है। कांग्रेस पार्टी के कुछ नेता यह मांग करने लगे हैं कि आरटीआइ कानून में भी संशोधन किया जाना चाहिए। इस बारे में जब खुर्शीद से सरकार की राय मांगी गई तो उनका जवाब था कि सिर्फ सरकार के भीतर ही नहीं, बल्कि सरकार के बाहर और यहां तक कि कुछ न्यायाधीश भी यह मानने लगे हैं कि आरटीआइ से कई तरह दिक्कतें आ रही हैं। लेकिन मूल सवाल यह है कि लोकतंत्र के आधार को मजबूत करने के लिए इन दिक्कतों को सहन करना चाहिए या नहीं। यूपीए सरकार ने ही आरटीआइ को लागू किया है और हमें इस बात का गर्व है। सरकार यह कतई नहीं चाहेगी कि इसे कमजोर बनाया जाए। हालांकि हर कानून में बदलाव की हमेशा गुंजाइश होती है। आरटीआइ पर सरकार लगातार नजर रखे हुए है। जरूरत महसूस होने पर कुछ बदलाव की संभावना से उन्होंने इनकार नहीं किया

दयानिधि मारन के खिलाफ सीबीआइ ने कसा शिकंजा

नई दिल्ली एयरसेल को बेचने के लिए दबाव बनाने के आरोप में पहले से ही सीबीआइ जांच का सामना कर रहे पूर्व संचार मंत्री दयानिधि मारन की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। मारन पर आरोप है कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में जेल में बंद ए. राजा के ठीक पहले संचार मंत्री रहते हुए उन्होंने चेन्नई स्थित अपने घर में323 टेलीफोन लगवाकर बीएसएनएल को करोड़ों रुपये का चूना लगाया। इस मामले में सीबीआइ प्रारंभिक जांच का केस दर्ज करने की तैयारी में है। दूरसंचार मंत्रालय से सीबीआइ को भेजी गई ताजा रिपोर्ट के बाद प्रारंभिक जांच का केस दर्ज करने का फैसला किया गया। सीबीआइ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि संचार मंत्री रहने के दौरान 2004 से 2007 के बीच दयानिधि मारन के चेन्नई स्थित घर पर बीएसएनएल के 323 टेलीफोन कनेक्शन लगाए गए थे। मारन पर इन कनेक्शनों का वाणिज्यिक इस्तेमाल कर बीएसएनएल को तीन साल में 440 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान पहुंचाने का आरोप है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि दूरसंचार विभाग से इस संबंध में 2009 में ही विस्तृत जानकारी मांगी गई थी। लेकिन विभाग ने जांच एजेंसी को पूरी जानकारी नहीं दी। इसके बाद सीबीआइ ने दोबारा दूरसंचार विभाग को पूरी जानकारी देने के लिए कहा। लेकिन दूरसंचार विभाग ने चुप्पी साध ली। मारन के इस्तीफे के बाद सीबीआइ ने इस साल जून में नए सिरे से दूरसंचार मंत्रालय के सामने यह मुद्दा उठाया। घोटाले के आरोपों में घिरे दूरसंचार विभाग ने बीएसएनएल कनेक्शनों के बारे में इसी महीने सीबीआइ को विस्तृत रिपोर्ट दी है। इस रिपोर्ट में मारन की भूमिका पर सवालिया निशान लगाया गया है। इसके बाद सीबीआइ ने प्रारंभिक जांच का केस दर्ज करने का फैसला किया

चिदंबरम की गवाही से खुलेगी सच्चाई

जागरण संवाददाता 2जी घोटाले के आरोपी और पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा ने पटियाला हाउस की विशेष कोर्ट में एक बार फिर मांग की है कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन की सच्चाई जानने के लिए तत्कालीन वित्त मंत्री और मौजूदा गृह मंत्री पी. चिदंबरम को गवाह के तौर बुलाया जाए तभी सच्चाई सामने आएगी। उन्होंने विशेष कोर्ट से अनुरोध किया कि चिदंबरम को इसके लिए समन जारी किया जाए। विशेष जज ओपी सैनी की कोर्ट में राजा की ओर से वरिष्ठ वकील सुशील कुमार ने कहा कि सीबीआइ को कैबिनेट की एक बैठक के संदर्भ में चिदंबरम का बयान दर्ज करना चाहिए जिसमें उन्होंने शेयरों को कम करने के मुद्दे पर स्थिति स्पष्ट की थी। उनका तर्क था कि चिदंबरम से यह पूछा जाना चाहिए कि क्या उन्होंने प्रधानमंत्री की मौजूदगी में शेयरों को कम करने के मुद्दे पर सुझाव दिया था। उन्होंने कहा कि अपराध दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 311 के तहत चिदंबरम से गवाह के तौर पर पूछताछ करनी चाहिए। पीएम से हो सकती है पूछताछ संसद की लोक लेखा समिति के अध्यक्ष डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले में जरूरत पड़ने पर समिति प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से भी पूछताछ कर सकती है। उदयपुर, माउंट आबू की यात्रा पर आए डॉ. जोशी ने कहा कि इस घोटाले में जो कुछ हुआ वह प्रधानमंत्री की जानकारी में हुआ। जोशी ने कहा कि प्रधानमंत्री इस मामले में लगातार गुमराह क्यों होते रहे, यह समझ से परे है। मनमोहन को भी जांच के दायरे में लाने की मांग 2जी मामले में गृहमंत्री पी. चिदंबरम की बर्खास्तगी के लिए दबाब बना रही भाजपा ने प्रधानमंत्री को भी जांच के दायरे लाने की मांग की है। पार्टी महासचिव व प्रवक्ता जगत प्रकाश नड्डा ने कहा है कि जिस तरह से जेल में बंद पूर्व मंत्री ए. राजा के वकील ने अदालत में प्रधानमंत्री व गृह मंत्री को बुलाने की मांग की है, उससे स्पष्ट है कि संप्रग केवल भ्रष्टाचार का गठबंधन बन कर रह गया है। यूपीए के सहयोगी दलों के मंत्री ही नहीं, बल्कि कांग्रेस भी इस घोटाले में पूरी तरह से शामिल है

चिदंबरम की कुर्सी खतरे में

नई दिल्ली 2जी घोटाले में दो फाड़ हो चुकी सरकार और कांग्रेस के अगले कदम और गृहमंत्री पी. चिदंबरम के राजनीतिक भविष्य का फैसला अब सुप्रीमकोर्ट का रुख तय करेगा। चिदंबरम को जिम्मेदार ठहराने वाले वित्त मंत्रालय के नोट पर मची रार इससे पहले सोमवार को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दरबार में भी पहुंची। पहले पी. चिदंबरम ने जाकर सोनिया से मुलाकात की और चर्चा है कि उन्होंने इस्तीफे की पेशकश भी की। इस पूरे घटनाक्रम से नाराज प्रणब मुखर्जी न्यूयार्क से लौटकर सीधे नॉर्थ ब्लाक स्थित अपने कार्यालय गए। इसके बाद इस मसले से जुड़े जरूरी कागजातों के साथ 10, जनपथ पहुंचे और करीब 40 मिनट तक सोनिया गांधी के साथ पूरे मसले पर चर्चा की। रविवार को न्यूयार्क में प्रधानमंत्री से विचार-विमर्श के बाद ही वित्त मंत्री शाम चार बजे ही नई दिल्ली लौटे थे। और ठीक छह बजे सोनिया गांधी से मिलने पहुंचे। इससे ठीक पहले कांग्रेस अध्यक्ष ने चिदंबरम से वार्ता की थी। सरकार और संगठन के उच्च पदस्थ सूत्र अब यह तो मान रहे हैं कि शीर्ष स्तर पर वित्त मंत्रालय के नोट को लेकर अविश्वास का भारी संकट पैदा हो गया है। मगर फिलहाल सबकी प्राथमिकता इस संकट से सरकार को निकालने की है। इसलिए शीर्ष स्तर पर आपसी लड़ाई को फिलहाल शांत कर मौजूदा संकट टालने में पूरा तंत्र जुटा है। दरअसल, अंदरूनी संकट से कहीं सरकार के वजूद पर ही न बन आए, संकटमोचकों के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती है। उस पर भी तुर्रा यह है कि सरकार के प्रमुख संकटमोचक प्रणब मुखर्जी ही नाराज हैं। साथ ही प्रधानमंत्री के सबसे विश्वस्त चिदंबरम का राजनीतिक भविष्य ही सवालों के घेरे में है। तनाव का ही नतीजा है कि चिदंबरम ने अपना उड़ीसा का दौरा रद कर दिया है। वैसे भी मंगलवार को सुप्रीमकोर्ट का रुख देखने लायक होगा कि वह वित्त मंत्रालय के पत्र का संज्ञान लेता है या नहीं। अगर अदालत ने इस मामले में जरा भी सख्त तेवर दिखाये तो जाहिर तौर पर चिदंबरम के लिए संकट बड़ा हो जाएगा। चिंता यह भी है कि इसके बाद बात कहां तक पहुंचेगी, यह सोच पाना भी मुश्किल है। इसीलिए, सरकार की पूरी रणनीति अब अदालत के रुख पर निर्भर करेगी। अलबत्ता सस्ती दरों पर 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन के लिए चिदंबरम को जिम्मेदार ठहराने वाले वित्त मंत्रालय की 25 मार्च की चिट्ठी को सरकार ने अभी से खारिज करना शुरू कर दिया है। कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने दावा किया कि इस पत्र में ऐसा कुछ नहीं है। साथ ही वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के नोट देखे जाने की बात को भी उन्होंने यह कहकर खारिज किया कि निचले स्तर के अधिकारी की इस राय का बहुत कोई मतलब नहीं है। जहां तक इसे वित्त मंत्री के देखे जाने की बात है तो यह एक रूटीन प्रक्रिया है और जरूरी नहीं कि उन्होंने उस पत्र को देखा ही हो। बकौल खुर्शीद, मंगलवार को प्रधानमंत्री वापस आ जाएंगे और मंत्री उनसे मुलाकात के बाद स्थिति स्पष्ट कर देंगे। सुब्रमण्यम स्वामी की चिदंबरम के खिलाफ सीबीआइ जांच का आदेश मांगने वाली अर्जी पर सुप्रीमकोर्ट में मंगलवार को फिर सुनवाई होनी है। मंगलवार को स्वामी की अर्जी पर बहस पूरी होने के बाद गैर सरकारी संगठन सीपीआइएल के वकील प्रशांत भूषण की अर्जी पर सुनवाई होगी जिसमें उन्होंने 2जी मामले में सीबीआइ जांच की निगरानी के लिए 2-3 विशेषज्ञों का निगरानी पैनल गठित करने की मांग की

Sunday, September 25, 2011

सुब्बा राव से दोबारा पूछताछ करेगी सीबीआइ

नई दिल्ली पीएमओ को भेजे गए वित्त मंत्रालय के नोट में हुए नए खुलासे के बाद सीबीआइ 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की नए सिरे से जांच में जुट गई है। इस सिलसिले में स्पेक्ट्रम आवंटन से जुड़े तत्कालीन वित्त सचिव डी.सुब्बाराव समेत वित्त मंत्रालय के तत्कालीन अफसरों से नए सिरे से पूछताछ होगी। यह वही नोट है, जिसमें तत्कालीन वित्त मंत्री पी.चिदंबरम और संचार मंत्री ए.राजा के बीच हुई बैठक का विवरण है। बैठक के मिनट्स तत्कालीन वित्त सचिव व भारतीय रिजर्व बैंक के मौजूदा गवर्नर डी. सुब्बाराव ने तैयार किए थे, जो इस बैठक में मौजूद थे। इसके पहले सीबीआइ ने सुब्बा राव के बयान के आधार पर 2जी घोटाले में चिदंबरम को क्लीन चिट दी थी। सीबीआइ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच के सिलसिले में वित्त मंत्रालय के तत्कालीन अफसरों से लंबी पूछताछ की गई थी। इनमें उस समय वित्त सचिव रहे सुब्बा राव भी शामिल थे। इन अधिकारियों ने अपने बयान में 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन से अपना पल्ला झाड़ते हुए इसकी सारी जिम्मेदारी संचार मंत्रालय पर डाली थी। जाहिर है इन्हीं बयानों के आधार पर चिदंबरम को भी क्लीन चिट दी गई थी, लेकिन वित्त मंत्रालय के नए खुलासे ने तत्कालीन अधिकारियों की भूमिका पर सवालिया निशान लगा दिया है। जाहिर है इस नोट से दिए गए तथ्यों के बारे में सुब्बा राव समेत मामले से जुड़े सभी अधिकारियों से दोबारा पूछताछ की जाएगी। वैसे इस मामले में चिदंबरम से पूछताछ को लेकर सीबीआइ अधिकारी फिलहाल कुछ भी बोलने के लिए तैयार नहीं हैं। वित्त मंत्रालय की ओर से प्रधानमंत्री को भेजे गए नोट में तत्कालीन वित्त मंत्री चिदंबरम पर घोटाले के दौरान निष्कि्रय रहने का आरोप लगाया गया है। इस नोट में कहा है कि स्पेक्ट्रम आवंटन के 20 दिन बाद तत्कालीन संचार मंत्री ए.राजा और वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के बीच एक बैठक हुई थी। बैठक में तत्कालीन वित्त सचिव डी.सुब्बाराव भी मौजूद थे। उन्होंने ही बैठक के मिनट्स तैयार किए थे। इसके मुताबिक, चिदंबरम ने कहा था कि स्पेक्ट्रम आवंटन के मामले में हम वर्तमान दरों और राजस्व अंशधारिता के पुर्न निर्धारण नहीं करेंगे। उनका कहना था कि आवंटन वापसी के नियंत्रण के वर्तमान नियमों-प्रावधानों पर विचार की आवश्यकता है। इस बैठक के तीन माह बाद अप्रैल दो 2008 में राजा ने अप्रत्याशित घटनाक्रम के तहत तीन साल की निर्धारित समय सीमा के भीतर विलय और अधिग्रहण के नियमों में बदलाव का आदेश जारी कर दिया। इस नए आदेश का फायदा स्वान और यूनीटेक को हुआ, जिन्होंने भारी मात्रा में अपने स्पेक्ट्रम टेलीनॉर जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बेंच दिए। नोट के मुताबिक, उस समय वित्त मंत्रालय चाहता तो एक लाख 76 हजार करोड़ रुपये के घोटाले को रोका जा सकता था। वैसे सीबीआइ अधिकारियों का मानना है कि इस नोट से यह स्पष्ट नहीं है कि घोटाले की साजिश में वित्त मंत्रालय के तत्कालीन अधिकारी की भी संलिप्तता थी। एक अधिकारी ने कहा, घोटाले की साजिश में शामिल होने के स्पष्ट सबूत के अभाव में भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा सकती

Friday, September 23, 2011

येद्दयुरप्पा पर आरोप लगाने वाले उद्योगपति को मिल रही धमकियां

नई दिल्ली कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येद्दयुरप्पा और उद्योग मंत्री मुरुगेश नीरानी के खिलाफ जमीन आवंटन में धोखाधड़ी का आरोप लगाने वाले उद्योगपति आलम पाशा का कहना है उनकी जान को खतरा है। उनके मुताबिक उन्हें लगातार धमकियां मिल रही हैं। उन पर मामला वापस लेने के लिए दबाव डाला जा रहा है। इस संबंध में पाशा ने दिल्ली आकर भाजपा के राष्ट्रीय सचिव श्याम जाजू से मिलकर मौखिक शिकायत भी दर्ज कराई है। येद्दयुरप्पा और मुरुगेश नीरानी पर आलम पाशा ने फर्जी हस्ताक्षर के जरिये 26 एकड़ जमीन हड़पने का आरोप लगाया था। दरअसल सरकार की तरफ से उन्हें 26 एकड़ प्लाट का आवंटन किया गया था। जब वह आवंटन की मंजूरी में हो रही देरी का पता करने कर्नाटक इंडस्ट्रीयल एरिया डेवलपमेंट बोर्ड के दफ्तर पहुंचे तो उन्हें पता चला कि किसी ने फर्जी लेटरहेड पर उनके जाली हस्ताक्षर के जरिये प्लाट आवंटन रद करने के लिए अनुरोध किया है। इस अनुरोध पर उनका आवंटन रद कर दिया गया। इस संबंध में पाशा ने तत्कालीन मुख्यमंत्री येद्दयुरप्पा और उद्योग मंत्री के खिलाफ लोकायुक्त के पास शिकायत की। क्योंकि येद्दयुरप्पा कर्नाटक उद्योग मित्र के चेयरमैन और नीरानी वाइस चेयरमैन थे। लोकायुक्त ने भी इस धोखाधड़ी के मामले में दोनों आरोपियों को नोटिस जारी कर चार हफ्ते में जवाब मांगा है। पाशा ने अपनी शिकायत में ग्लोबल इनवेस्टर मीट के सहभागियों के साथ भी धोखाधड़ी की आशंका जाहिर की है। आलम पाशा ने अपनी कंपनी पाश स्पेस इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड की तरफ से पिछले साल जून में ग्लोबल मीट के अंतिम सत्र के दौरान आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए 600 मकान बनाने का प्रस्ताव दिया था। इस प्रस्ताव को येद्दयुरप्पा सरकार ने मंजूरी देते हुए देवानहल्ली इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पास 26 एकड़ जमीन के आवंटन को हरी झंडी दी थी

आंदोलन भ्रष्टाचार के समूल नाश के लिए

महोबा अन्ना व्यवस्था परिवर्तन से भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए संघर्ष कर रहे है। हमारा आंदोलन भ्रष्टाचार के समूल नाश के लिए है। विदेशों में जमा 400 लाख करोड़ का काला धन वापस आ गया, तो लोग अवैध कमाई और घोटाले करना खुद ही बंद कर देंगे। भय रहेगा कि गलत तरीके से की गई कमाई, आज नहीं तो कल सरकार जब्त कर लेगी। यह बात योग गुरु रामदेव ने यहां योग शिविर के बाद पत्रकारों से बातचीत में कही। अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की चर्चा पर उन्होंने कहा हम अन्ना का पूरा समर्थन व सम्मान करते हैं। दोनों एक ही उद्देश्य के लिए संघर्ष कर रहे है। फिर भी दोनों के आंदोलन में दिख रही दूरी क्यों है। इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा यह बात अन्ना से पूछे। हम तो उनके साथ चलने को तैयार हैं। अन्ना ने आडवाणी की यात्रा को दिखावा बताया है। इस संबंध में आप का क्या कहना है। यह पूछने पर योगगुरु ने कहा कि यात्रा व जागरूकता पैदा करना हर व्यक्ति का अधिकार है। आडवाणी की यात्रा से कुछ न कुछ निकल कर आएगा, जो राष्ट्र के हित में होगा। काले धन की वापसी के लिए शुरू किए गये आंदोलन की गति धीमी होने के सवाल पर उनका जवाब था कि भारत स्वाभिमान की द्वितीय चरण की यह यात्रा इसी का हिस्सा है। अपने संकल्प के प्रति हम पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा योग के जरिए गांव-गांव में राष्ट्र के लिए समर्पित संकल्पवान युवाओं की संगठित शक्ति तैयार की जा रही है। भ्रष्टाचार गरीबी तंगहाली से जूझ रहे यह नौजवान सरकार को काले धन की वापसी के लिए मजबूर कर देंगे

सरकार के प्रति बदला अन्ना का रुख

नई दिल्ली अन्ना हजारे अब अपने ही आंदोलन की छाया से बाहर निकलने की कोशिश में दिख रहे हैं। साथ ही दिल्ली के अपने सिपहसलारों के प्रभाव से भी। यह पहला मौका है, जब उन्होंने भ्रष्टाचार की रोकथाम के मामले में सरकार की तारीफ की है। इसी तरह यह भी पहली बार है कि प्रधानमंत्री को लिखे उनके पत्र में न कोई कठोर शब्द है, न कोई समय सीमा दी गई है। यहां तक कि न्यायिक उत्तरदायित्व बिल पर भी अन्ना अपने घोषित रुख से पीछे हटे हैं। अन्ना ने प्रधानमंत्री को पिछला पत्र 16 अगस्त के अपने चर्चित अनशन से ठीक दो दिन पहले लिखा था। इसमें प्रधानमंत्री को तानाशाह तक बताया था। मगर बुधवार को लिखी चिट्ठी की भाषा बहुत बदली हुई है। इसमें अन्ना ने लोकपाल पर सरकार के आश्वासन की तारीफ करते हुए लिखा है कि भ्रष्टाचार की रोकथाम की दिशा में यह एक अच्छी पहल है। न्यायिक उत्तरदायित्व बिल पर संसदीय समिति की रिपोर्ट आने के बाद अन्ना के सहयोगियों ने इसे साफ तौर पर खारिज कर दिया था। अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण और किरण बेदी ने कहा था कि इस धोखे के बाद वे न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में लाने की अपनी मांग पर फिर से लौट आए हैं। मगर अन्ना ने लिखा है, इस कानून के लिए जानकार लोगों, जन प्रतिनिधियों और सरकारी तंत्र को मिल कर अच्छा मसौदा बनाना चाहिए। मनमोहन सिंह को लिखे पत्र में उन्होंने बार-बार राजीव गांधी के स्थानीय स्वशासन के काम की तारीफ की है। उन्होंने लिखा है कि राजीव के प्रयासों से ही संविधान में 73वें और 74वें संशोधन के जरिए ग्राम सभा और शहरी निकायों को अहमियत मिली। भू अधिग्रहण के संबंध में उन्होंने ग्राम सभाओं को अधिक शक्ति देने को कहा है। इस बार उन्होंने जन लोकपाल बिल के किसी खास प्रावधान या इसकी समय सीमा को लेकर कुछ भी नहीं लिखा है। बल्कि कहा है कि बार-बार आंदोलन से उन्हें कोई खुशी नहीं होती। इससे जनता के प्रति सरकार की अनास्था और अनादर की भावना का संदेश जाता है

चिदंबरम पर बढ़ा इस्तीफे का दबाव

नई दिल्ली 2 जी घोटाले में अपने ही कठघरे में खड़ी सरकार पर विपक्ष ने जोरदार हमला बोला है। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के प्रधानमंत्री को लिखे पत्र के खुलासे से विपक्ष को सरकार के खिलाफ नया गोला बारूद मिल गया है। भाजपा ने दो टूक कहा है कि अब गृह मंत्री पी चिदंबरम को जाना ही होगा। चाहे वह खुद इस्तीफा दें या फिर उन्हें बर्खास्त किया जाए। साथ ही मनमोहन सिंह को भी निशाने पर लेते हुए कहा, वह गुमराह क्यों हो जाते हैं, देश की जनता इसका जवाब चाहती है। सरकार की सहयोगी द्रमुक ने विपक्ष के सुर में सुर मिलाया है। गैर राजग दल अन्नाद्रमुक ने भी चिदंबरम का इस्तीफा मांगा, जबकि माकपा ने चिदंबरम के खिलाफ सीबीआइ से जांच की मांग की है। भाजपा के वरिष्ठ नेता व पीएसी के अध्यक्ष डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने 2जी घोटाले के लिए चिदंबरम को जेल में बंद ए. राजा के साथ सह अपराधी करार देते हुए कहा है कि प्रणब मुखर्जी के पत्र से सारा सच सामने आ गया है। साल 2008 में वित्त सचिव की आपत्ति के बावजूद वित्त मंत्री रहते चिदंबरम ने 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन का समर्थन किया। यदि उन्होंने यह नहीं किया होता तो यह घोटाला नहीं होता। डॉ. जोशी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि वह गुमराह क्यों होते हैं? अब उनको इसका जवाब देश को देना होगा। संसद की लोक लेखा समिति की रिपोर्ट में भी चिदंबरम की भूमिका पर सवाल उठाए गए थे। सरकार के खिलाफ तीखे तेवरों व धारदार आरोपों से लैस डॉ. जोशी ने योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया की भी विदाई की मांग कर डाली। उन्होंने कहा, गरीबी की बेतुकी परिभाषा गढ़ने वाले मोंटेक को भी चिदंबरम की राह पर भेज दिया जाए तो अच्छा होगा। यह दोनों अपने पद छोड़ कर हमें बख्श दें तो अच्छा होगा। उन्होंने कहा कि तत्कालीन वित्त मंत्री चिदंबरम उस समय के दूरसंचार मंत्री ए. राजा के 2जी स्पेक्ट्रम फार्मूले से सहमत थे। अगर तब चिदंबरम ने यह रूख अपनाया होता कि 2008 में 2001 के दामों पर स्पेक्ट्रम नहीं बेचा जा सकता है तो देश में इतना बड़ा घोटाला नहीं होता। राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने भी चिदंबरम का इस्तीफा मांगते हुए मनमोहन सिंह को कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा, मुखर्जी के पत्र के साथ 21 और पत्र हैं जो प्रधानमंत्री व वित्त मंत्रालय के बीच के हैं। ऐसे में क्या प्रधानमंत्री कहेंगे कि उन्हें कुछ नहीं मालूम था? जब इस मामले में न्यायपालिका कुछ कहती है तो कांग्रेस उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने का सवाल उठाती है, लेकिन अब तो उसके सबसे वरिष्ठ व अनुभवी मंत्री ने सारा खुलासा किया है। यह मामला जनता के बीच है और उसे यह जानने का हक है कि चिदंबरम ने सही काम किया या नहीं। अन्नाद्रमुक ने भी भाजपा की राह पर चलते हुए चिदंबरम का इस्तीफा मांगा है। माकपा ने इस मामले में चिदंबरम के खिलाफ सीबीआइ से जांच की मांग की है। सरकार की सहयोगी द्रमुक ने भी विपक्ष के साथ खड़े होकर चिदंबरम की तरफ अंगुली उठाई है

Wednesday, September 21, 2011

अब मायावती लगाएंगी भ्रष्टाचार पर अंकुश

लखनऊ भ्रष्टाचार के खिलाफ बने देशव्यापी माहौल और समाजसेवी अन्ना हजारे की यूपी का दौरा करने की घोषणा के बाद मायावती सरकार को भी आखिरकार हरकत में आ गई। मुख्यमंत्री मायावती ने मंगलवार को हुई समीक्षा बैठक में ने केवल मंडलायुक्तों व जिलाधिकारियों को भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए सख्त कदम उठाने के निर्देश दिए बल्कि इसके लिए उप्र जनहित गारंटी कानून को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने को कहा है। मुख्यमंत्री ने राज्य के सभी जिलाधिकारियों को हर हफ्ते किसी एक तहसील के एक गांव का निरीक्षण करने और उप जिलाधिकारियों को हर महीने पांच गांवों का दौरा करने के भी निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री ंने सभी विभागों की लंबित विजिलेंस जांच और अभियोजन के मामलों समेत विभागीय कार्रवाईयों में तेजी लाने एवं इन्हें एक निश्चित समय सीमा निबटाने के निर्देश दिए हंै। उन्होंने लापरवाही बरतने और काम में रुचि न लेने वाले कर्मियों की अनिवार्य सेवानिवृत्ति के लिए समयबद्ध स्क्रीनिंग कराने को कहा है। जबकि भ्रष्टाचार में लिप्त वरिष्ठ अधिकारियों को रंगे हाथों पकड़ने और इसके लिए इंटेलीजेंस को सक्रिय करने का जिम्मा जिलाधिकारियों को सौंपा है। मंगलवार को हुई समीक्षा बैठक का इस बार नजारा बदला हुआ नजर आया। आमतौर पर समीक्षा बैठक करने के बाद कैबिनेट सचिव उसके निष्कर्षो से मुख्यमंत्री को अवगत कराते थे, जिस पर मुख्यमंत्री निर्देश देती थीं, लेकिन मंगलवार को हुई समीक्षा बैठक से पहले ही मुख्यमंत्री ने कैबिनेट सचिव को निर्देश दिए कि वह सरकारी सेवाओं में भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए बैठक में अधिकारियों को विस्तार से अवगत कराएं खासतौर पर जनहित गारंटी कानून का फायदा बताया जाए। उन्होंने सेवाओं की संख्या में बढ़ोतरी कर खास तौर पर परिवहन से जुड़ी सेवाओं को भी इसके दायरे में शामिल करने के निर्देश दिए। माना जा रहा है कि विधानसभा चुनाव वाले राज्यों में अन्ना हजारे के दौरों की योजना को देखते हुए सरकार की भ्रष्टाचार पर फिक्र बढ़ी है। बैठक में उपजिलाधिकारियों को दौरे के दौरान गांव में खुली बैठक करने, समस्याओं की सुनवाई कर उन्हें मौके पर ही निस्तारित करने, सरकार के सभी कार्यक्रमों से जनता को अवगत कराने और इस पूरी कार्रवाईयों की वीडियो रिकार्डिग कराने के निर्देश दिए हैं। चुनाव नजदीक देख न केवल सरकार जनता के करीब पहुंचना चाहती है, बल्कि वीडियो रिकार्डिग आदि से अधिकारियों को जनता की सुनवाई के लिए भी बाध्य करना चाहती है। त्यौहारों के मद्देनजर चाक चौबंद हो सुरक्षा व्यवस्था मुख्यमंत्री मायावती ने कानून-व्यवस्था पर विशेष ध्यान देने के साथ ही त्यौहारों के मद्देनजर सुरक्षा व्यवस्था को और चाक-चौबंद करने को कहा है। उन्होंने अभिसूचना तंत्र को मजबूत और भरोसेमंद बनाने पर बल दिया। जिले के डीएम और एसपी दोनों ही वरिष्ठ अधिकारियों को आपसी तालमेल से कार्य करने की हिदायत दी। सूबे के सभी कमिश्नर, डीएम, डीआईजी, एसपी के अलावा प्रमुख सचिवों के साथ समीक्षा बैठक करते हुए कैबिनेट सचिव और मुख्य सचिव ने मुख्यमंत्री के इन निर्देशों की जानकारी दी। उन्होंने रबी की बुआई के लिए उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने, कांशीराम शहरी गरीब आवास योजना फेज-दो के तहत बने आवासों का आवंटन 25 सितम्बर तक करने के भी निर्देश दिये। उन्होंने बाढ़ से क्षतिग्रस्त आवासों की मरम्मत हेतु गृह अनुदान की धनराशि सितम्बर माह के अन्त तक हर हाल में वितरित करने को भी कहा। जहां भूमि और आवासों के पट्टों का कब्जा तीन चार बार लाभार्थियों को दिया जा चुका है, लेकिन उन्हें अभी भी वास्तविक रूप से कब्जा नहीं मिला है, ऐसे मामलों में अवैध कब्जेदारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराकर सख्त कार्यवाही की जाए। सभी जिलाधिकारियों को कहा गया कि वे एक माह में कॉमन सर्विस सेन्टर को क्रियाशील कर लोगों को डिजिटल हस्ताक्षर के साथ खतौनी की कापी व अन्य सेवायें मुहैया कराएं

अब मायावती लगाएंगी भ्रष्टाचार पर अंकुश

लखनऊ भ्रष्टाचार के खिलाफ बने देशव्यापी माहौल और समाजसेवी अन्ना हजारे की यूपी का दौरा करने की घोषणा के बाद मायावती सरकार को भी आखिरकार हरकत में आ गई। मुख्यमंत्री मायावती ने मंगलवार को हुई समीक्षा बैठक में ने केवल मंडलायुक्तों व जिलाधिकारियों को भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए सख्त कदम उठाने के निर्देश दिए बल्कि इसके लिए उप्र जनहित गारंटी कानून को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने को कहा है। मुख्यमंत्री ने राज्य के सभी जिलाधिकारियों को हर हफ्ते किसी एक तहसील के एक गांव का निरीक्षण करने और उप जिलाधिकारियों को हर महीने पांच गांवों का दौरा करने के भी निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री ंने सभी विभागों की लंबित विजिलेंस जांच और अभियोजन के मामलों समेत विभागीय कार्रवाईयों में तेजी लाने एवं इन्हें एक निश्चित समय सीमा निबटाने के निर्देश दिए हंै। उन्होंने लापरवाही बरतने और काम में रुचि न लेने वाले कर्मियों की अनिवार्य सेवानिवृत्ति के लिए समयबद्ध स्क्रीनिंग कराने को कहा है। जबकि भ्रष्टाचार में लिप्त वरिष्ठ अधिकारियों को रंगे हाथों पकड़ने और इसके लिए इंटेलीजेंस को सक्रिय करने का जिम्मा जिलाधिकारियों को सौंपा है। मंगलवार को हुई समीक्षा बैठक का इस बार नजारा बदला हुआ नजर आया। आमतौर पर समीक्षा बैठक करने के बाद कैबिनेट सचिव उसके निष्कर्षो से मुख्यमंत्री को अवगत कराते थे, जिस पर मुख्यमंत्री निर्देश देती थीं, लेकिन मंगलवार को हुई समीक्षा बैठक से पहले ही मुख्यमंत्री ने कैबिनेट सचिव को निर्देश दिए कि वह सरकारी सेवाओं में भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए बैठक में अधिकारियों को विस्तार से अवगत कराएं खासतौर पर जनहित गारंटी कानून का फायदा बताया जाए। उन्होंने सेवाओं की संख्या में बढ़ोतरी कर खास तौर पर परिवहन से जुड़ी सेवाओं को भी इसके दायरे में शामिल करने के निर्देश दिए। माना जा रहा है कि विधानसभा चुनाव वाले राज्यों में अन्ना हजारे के दौरों की योजना को देखते हुए सरकार की भ्रष्टाचार पर फिक्र बढ़ी है। बैठक में उपजिलाधिकारियों को दौरे के दौरान गांव में खुली बैठक करने, समस्याओं की सुनवाई कर उन्हें मौके पर ही निस्तारित करने, सरकार के सभी कार्यक्रमों से जनता को अवगत कराने और इस पूरी कार्रवाईयों की वीडियो रिकार्डिग कराने के निर्देश दिए हैं। चुनाव नजदीक देख न केवल सरकार जनता के करीब पहुंचना चाहती है, बल्कि वीडियो रिकार्डिग आदि से अधिकारियों को जनता की सुनवाई के लिए भी बाध्य करना चाहती है। त्यौहारों के मद्देनजर चाक चौबंद हो सुरक्षा व्यवस्था मुख्यमंत्री मायावती ने कानून-व्यवस्था पर विशेष ध्यान देने के साथ ही त्यौहारों के मद्देनजर सुरक्षा व्यवस्था को और चाक-चौबंद करने को कहा है। उन्होंने अभिसूचना तंत्र को मजबूत और भरोसेमंद बनाने पर बल दिया। जिले के डीएम और एसपी दोनों ही वरिष्ठ अधिकारियों को आपसी तालमेल से कार्य करने की हिदायत दी। सूबे के सभी कमिश्नर, डीएम, डीआईजी, एसपी के अलावा प्रमुख सचिवों के साथ समीक्षा बैठक करते हुए कैबिनेट सचिव और मुख्य सचिव ने मुख्यमंत्री के इन निर्देशों की जानकारी दी। उन्होंने रबी की बुआई के लिए उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने, कांशीराम शहरी गरीब आवास योजना फेज-दो के तहत बने आवासों का आवंटन 25 सितम्बर तक करने के भी निर्देश दिये। उन्होंने बाढ़ से क्षतिग्रस्त आवासों की मरम्मत हेतु गृह अनुदान की धनराशि सितम्बर माह के अन्त तक हर हाल में वितरित करने को भी कहा। जहां भूमि और आवासों के पट्टों का कब्जा तीन चार बार लाभार्थियों को दिया जा चुका है, लेकिन उन्हें अभी भी वास्तविक रूप से कब्जा नहीं मिला है, ऐसे मामलों में अवैध कब्जेदारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराकर सख्त कार्यवाही की जाए। सभी जिलाधिकारियों को कहा गया कि वे एक माह में कॉमन सर्विस सेन्टर को क्रियाशील कर लोगों को डिजिटल हस्ताक्षर के साथ खतौनी की कापी व अन्य सेवायें मुहैया कराएं

उत्तराखंड में जब्त होंगी अवैध संपत्ति

देहरादून मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूड़ी की भ्रष्टाचार के खिलाफ और आम जनता को पारदर्शी प्रशासन को लेकर छेड़ी गई मुहिम का असर कैबिनेट के महत्वपूर्ण फैसलों के रूप में सामने आया। इस कड़ी में लोक सेवा अधिकार, लोक सेवकों की अवैध रूप से अर्जित धन या संपत्ति के अधिग्रहण संबंधी विधेयकों के मसौदे को कैबिनेट ने मंजूरी प्रदान कर दी। लोक सेवकों के भ्रष्टाचार के मामलों के लिए विशेष अदालतें गठित होंगी और इसके जरिए अवैध तरीके से अर्जित धन या संपत्ति को सरकार अपने कब्जे में ले सकेगी। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में मंगलवार को सचिवालय में हुई कैबिनेट की दूसरी बैठक में सरकारी सेवकों के लिए तबादला नीति के एक्ट के प्रस्ताव को भी हरी झंडी दिखाई गई। वहीं बेनाप भूमि को रक्षित वन भूमि घोषित करने के अविभाजित उत्तरप्रदेश शासनकाल के फैसले को कैबिनेट ने निरस्त कर दिया। इससे विशेष तौर पर पर्वतीय जिलों में चार लाख हेक्टेयर जमीन विकास कार्यो के लिए उपलब्ध होगी। कैबिनेट ने अनुपूरक बजट के साथ जनहित में कई महत्वपूर्ण फैसलों पर मुहर लगा दी। जनता को आने वाले समय में सरकारी कामकाज में इसकी झलक दिखाई देगी। उड़ीसा, बिहार, मध्यप्रदेश और हिमाचल की तर्ज पर उत्तराखंड में भी लोक सेवकों की अवैध रूप से कमाई गई संपत्ति और धनराशि अब सरकार के खाते में आएगी। इस संबंध में प्रस्तावित विधेयक के मसौदे में दो महत्वपूर्ण व्यवस्था की गई हैं। इनमें भ्रष्टाचार के मामलों के लिए विशेष अदालतों का गठन और विशेष अदालतों में राज्य सरकार अनधिकृत अर्जित संपत्ति या धन का अधिग्रहण करेगी। इसमें संबंधित लोकसेवक को भी पक्ष रखने का मौका दिया गया है। सेवा का अधिकार विधेयक के प्रस्तावित मसौदे में राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, खतौनी, आय प्रमाण पत्र समेत नागरिक सेवाएं चिन्हित की गई हैं। यह विधेयक दिल्ली, जम्मू-कश्मीर समेत कई राज्यों में लागू किया जा चुका है। पर्वतीय जिलों में अब ग्राम पंचायत की बेनाप जमीन वन महकमे के खाते में नहीं जाएगी। ब्रिटिश शासनकाल में 17 अक्टूबर, 1893 और फिर उत्तरप्रदेश शासन के 17 मार्च, 1997 के शासनादेश से रक्षित वन भूमि में शामिल की गई बेनाप भूमि से उत्तराखंड की परेशानी बढ़ी हुई थीं। कैबिनेट ने उप्र शासनादेश को निरस्त कर दिया। वहीं राज्य में प्रत्येक वर्ष राज्य कर्मचारियों के तबादलों के लिए नया एक्ट लागू होगा। इसके प्रस्ताव को मंजूरी मिल चुकी है। अब सुगम क्षेत्र में पांच वर्ष से अधिक अवधि तक तैनात कर्मियों को दुर्गम क्षेत्रों में अनिवार्य सेवाएं देनी पड़ेंगी। चार जिलों दून, हरिद्वार, ऊधमसिंहनगर और नैनीताल में पहले चरण में ई-गवर्नेस की ओर कदम बढ़ाते हुए ई-स्टैंपिंग व्यवस्था लागू की गई। अब इन जिलों में लोगों को स्टांप वेंडरों के साथ आनलाइन स्टांप भी उपलब्ध होंगे। कुमाऊं मंडल विकास निगम के अनुसूचित जनजाति विभाग के सेवानिवृत्त कर्मियों को एरियर के भुगतान पर अड़ंगा कैबिनेट ने दूर कर दिया। विधानसभा सत्र की अधिसूचना जारी होने के चलते कैबिनेट बैठक की ब्रीफिंग नहीं की गई

लोकपाल को लेकर हिसार चुनाव में उतरी टीम अन्ना

नई दिल्ली अगले महीने हरियाणा के हिसार में हो रहे लोकसभा उप चुनाव में अन्ना हजारे की टीम भी कमर कस कर उतर गई है। टीम ने तय किया है कि यहां वे उन सभी उम्मीदवारों का विरोध करेंगे, जो जन लोकपाल का समर्थन नहीं करेंगे। टीम अन्ना ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भी जमकर आलोचना की है। अन्ना के सहयोगी अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण ने भाजपा नेता मोदी के कार्यक्रमों की तीखी आलोचना की। केजरीवाल ने कहा कि ऐसी जानकारी मिल रही है कि भाजपा के बहुमत वाली गुजरात विधानसभा में जल्दी ही लोकायुक्त कानून में संशोधन कर इसके चयन में मुख्यमंत्री निर्णायक भूमिका तय की जाने वाली है। यह अन्ना के जन लोकपाल बिल की भावना के ठीक खिलाफ है। मोदी पर सीधे हमला करते हुए उन्होंने कहा कि अनशन और यात्राओं की बजाय उन्हें चाहिए कि वे कोई ढंग का लोकायुक्त कानून बनवाएं। इसी तरह भूषण ने कहा कि जिस तरह मोदी ने सरकारी खर्च से निजी राजनीतिक लाभ के लिए अनशन का कार्यक्रम किया वह भ्रष्टाचार है। टीम अन्ना ने हिसार चुनाव को भी अपनी अग्नि परीक्षा बताया। केजरीवाल ने कहा कि हमने वहां की जनता से अपील की है कि इस बार का चुनाव लोकपाल के मुद्दे पर लड़ा जाए। सभी उम्मीदवारों से अपील की गई है कि वे अपने पार्टी अध्यक्ष से लिखित आश्वासन लेकर आएं कि उनकी पार्टी संसद में जन लोकपाल के पक्ष में वोट देगी। जो भी उम्मीदवार ऐसा नहीं करेगा, उसे वोट नहीं देने के लिए हम जनता से अपील करेंगे। जन लोकपाल का समर्थन करने वाले उम्मीदवारों में से जो सबसे योग्य और ईमानदार हो, उसे जनता अपना वोट दे। केजरीवाल ने यह भी कहा कि अन्ना भी यहां का दौरा करने का कार्यक्रम बना रहे हैं। अगर वे नहीं आ सके तो सीडी के जरिए उनका वीडियो संदेश यहां के लोगों तक पहुंचाया जाएगा

Tuesday, September 20, 2011

खेलगांव के फ्लैटों का सीबीआइ ने बिगाड़ा खेल

नई दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलगांव में अतिरिक्त बनाए गए फ्लैट और बढ़ गए एफएआर (फ्लोर एरिया रेशियो) आदि को लेकर उठ रहे सवालों को लेकर सीबीआइ ने पूरी योजना की जांच शुरू कर दी है। सीबीआइ ने डीडीए मुख्यालय से इस मामले से संबंधित फाइलें जब्त की हैं। सीबीआइ की वही टीम जांच कर रही है, जिसने सीरीफोर्ट मामले में सीएजी रिपोर्ट के आधार पर एफआइआर दर्ज की है। ऐसे में खेल गांव के फ्लैटों तक जनता की शीघ्र पहुंच को झटका लग सकता है, जबकि डीडीए अपने हिस्से के 722 फ्लैट बेचने की फिराक में था और बिल्डर कंपनी ने अपने हिस्से के बेचे गए 446 फ्लैट लोगों को शीघ्र देने का आश्र्वासन दे रखा था। मगर अब सब लटकता नजर आ रहा है। ज्ञात हो कि खेल गांव में 17 फ्लैट अतिरिक्त बन गए थे जिन्हें कुछ समय पहले तोड़ दिया गया। सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में खेलगांव के निर्माण में कुछ अनियमितताओं का जिक्र किया था। हालांकि खेलों के बाद से डीडीए और बिल्डर कंपनी के बीच संबंध तनावपूर्ण हैं। फिर भी फ्लैटों की योजना बीच में फंसी होने के चलते कुछ समय पहले दोनों ओर से पहल हुई थी। इस पर डीडीए ने मरम्मत के लिए फ्लैटों के टावर कंपनी को देने शुरू किए थे। मगर डीडीए की ओर कुछ टावर सील कर दिए जाने के कारण मामला फिर से उलझ गया था। डीडीए चाहता था कि फ्लैटों में अतिरिक्त एफएआर मामले को कुछ टावर सील कर निपटा लिया जाए। मगर कंपनी को यह पसंद नहीं आया और कंपनी इस पर राजी नहीं हुई। इससे मामला फिर उलझ गया है। बहरहाल डीडीए ने यह मामला शहरी विकास मंत्रालय के पास भेज दिया है। उधर दिल्ली अर्बन आर्ट कमीशन ने भी इस योजना को कंपलीशन सर्टिफिकेट नहीं दिया है। ये पचड़े तो पहले से ही फंसे हुए हैं और अब ताजा मामला सीबीआइ का जुड़ गया है। ज्ञात हो कि खेलगांव में कुल 34 टावरों में 1168 फ्लैट हैं। इनमें एमार एमजीएफ के 446 और डीडीए के 722 फ्लैट हैं। अब सीबीआइ की तलवार लटकने से डीडीए के हिस्से के फ्लैट्स की नीलामी रुक गई है और न ही बिल्डर कंपनी एमार एमजीएफ अपने हिस्से के बेचे गए फ्लैट्स को उनके मालिकों को सौंप सकती है

अन्ना के मन का लोकायुक्त कानून बनाएंगे खंडूड़ी

उत्तराखंड सरकार अन्ना हजारे की मंशा के मुताबिक लोकायुक्त कानून बनाएगी। मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी के बुलावे पर देहरादून पहुंची टीम अन्ना ने सोमवार को मुख्यमंत्री व उच्चाधिकारियों संग बैठक कर मजबूत लोकायुक्त कानून के सुझाव दिए। टीम अन्ना के सदस्यों अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण व कुमार विश्वास ने सोमवार शाम तकरीबन पांच बजे मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी, मुख्य सचिव सुभाष कुमार, प्रमुख सचिव दिलीप कोटिया के साथ बैठक की। मुख्यमंत्री सचिवालय में तकरीबन ढाई घंटे तक चली बैठक में टीम अन्ना ने लोकायुक्त कानून के नए मसौदे पर अहम सुझाव दिए। बैठक के बाद टीम ने पत्रकारों से कहा, कई राज्यों में लोकायुक्त कानून लागू है, लेकिन उसमें खामियां हैं। जन लोकपाल बिल की भावना के मुताबिक, राज्यों में इस कानून को प्रभावी बनाने के साथ ही लोकपाल नियुक्ति में सरकारी हस्तक्षेप से बचा जाना चाहिए। उत्तराखंड सरकार ऐसा लोकायुक्त कानून बना कर अन्य राज्यों के लिए नजीर साबित हो सकता है। वहीं, मुख्यमंत्री ने कहा, राज्य में जल्द ही मजबूत लोकायुक्त बिल लाया जाएगा। इसी क्रम में टीम अन्ना को सुझाव देने के लिए बुलाया गया था

नोट कांड के सूत्रधार अहमद पटेल

नई दिल्ली संसद में नोट के बदले वोट मामले की आंच आखिर कांग्रेस पर भी आ गई। इस मामले में फंसे पूर्व सपा नेता अमर सिंह के वकील राम जेठमलानी ने सोमवार को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल को मास्टर माइंड करार दे दिया। दिल्ली की एक अदालत में सुनवाई के दौरान जेठमलानी ने कहा कि रिश्वत के लिए धन देने वाले अमर सिंह नहीं, बल्कि अहमद पटेल थे। हालांकि कांग्रेस ने इसका खंडन किया है। अहमद पटेल ने भी इसे बेबुनियाद ठहराया है। कांग्रेस पूरे प्रकरण को जेठमलानी और भाजपा के करीबी रिश्तों से भी जोड़कर देख रही है। तीस हजारी कोर्ट की विशेष जज संगीता ढींगरा सहगल की अदालत में अमर सिंह की नियमित जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान जेठमलानी ने कहा कि साजिश उन्हीं लोगों ने की, जिनकी सरकार बचाई जानी थी। भाजपा सांसदों के धन के लेन-देन की जगह अमर सिंह का आवास नहीं, बल्कि राजधानी का एक पांच सितारा होटल था। अहमद पटेल को भी वहां आना था, लेकिन वे ऐन वक्त पर नहीं आए। इस पर अहमद पटेल ने कहा कि जेठमलानी का तर्क बिल्कुल आधारहीन है और इस बारे में वे पहले ही स्थिति स्पष्ट कर चुके हैं। कांग्रेस प्रवक्ता रेणुका चौधरी ने कहा कि जेठमलानी की बातों का कोई मतलब नहीं है। कांग्रेस को इस पूरे मामले में भाजपा का षड्यंत्र नजर आ रहा है। पार्टी के उच्च पदस्थ सूत्र इसमें भाजपा की साजिश की तरफ इशारा कर रहे हैं और अमर सिंह एवं अमिताभ की मुलाकात को भी जोड़ रहे हैं। अमिताभ गुजरात पर्यटन के ब्रांड एंबेसडर हैं। बीते सप्ताह 12 सितंबर को अमर सिंह की जमानत के लिए पैरवी के दौरान जेठमलानी भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी का नाम लिया था। उन्होंने कहा कि इस मामले में स्टिंग ऑपरेशन आडवाणी ने कराया था। लोकसभा में लहराई गई नोटों की गड्डियां भाजपा प्रायोजित थीं। जेठमलानी सोमवार को अपने इस कथन से पलट गए। उन्होंने कहा कि नकद लेन-देन की वीडियो सीडी में बार-बार नजर आने वाले सपा सांसद रेवती रमण सिंह को दिल्ली पुलिस ने क्लीन चिट दे दी, जबकि सीडी में अमर सिंह का चेहरा और आवाज न होने के बावजूद दिल्ली पुलिस ने उन्हें आरोपी बना दिया

Monday, September 19, 2011

भ्रष्टाचार से बढ़ी महड्डगाई

अन्ना हजारे ने महंगाई का कारण भ्रष्टाचार को बताया है। पिछले दिनों संसद में भी महंगाई को लेकर काफी शोर-शराबा हुआ था। पूर्व केंद्रीय वित्तमंत्री यशवड्डत सिन्हा ने भी कहा कि महंगाई भ्रष्टाचार के कारण बढ़ी है। जब महड्डगाई पर तत्काल काबू पाने की जरूरत है तो सरकार कभी पेट्रोल के दाम तो कभी ब्याज की दरें बढ़ा देती है। पिछले 18 महीनों में ग्यारह बार ब्याज की दरों में बढ़ोतरी की गई है। अब स्थिति यह है कि महंगाई के कारण आम आदमी का जीना मुश्किल हो गया है। सांसदों ने तो अपने वेतन भत्ते और निधि को बढ़ाकर अपना कल्याण कर लिया है। सरकारी कर्मचारियों का भी महंगाई भत्ता सात फीसदी बढ़ा दिया, लेकिन देश की बाकी जनता कैसे जिए इस बारे में सरकार ने आखिर क्या सोचा है? आम आदमी की आमदनी बढ़ नहीं रही है लेकिन उस पर लगने वाले करों का भार लगातार बढ़ रहा है। सरकार के मंत्री और अधिकारी जिस तरह के घपले-घोटाले कर रहे हैं उससे वह अपने को ठगी हुई महसूस कर रही है। भ्रष्टाचार राजकाज का जिस तरह से हिस्सा बन गया है उसे रोकने के लिए अभी तक कोई कारगर उपाय नहीं किया गया है। इससे जनता में मंत्रियों और सांसदों के खिलाफ संदेह गहरा रहा है, क्योंकि उनकी सड्डपत्ति दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है और जनता महंगाई की मार से कराह रही है। भ्रष्टाचार राजनीतिक सत्ता के शिखर पर पहुड्डच कर अब देश की जनता को ही मुंह चिढ़ा रहा है। जिन लोगों पर इसे रोकने की जिम्मेदारी है वे बड़ी बेशर्मी से अपने-अपने नेताओं का बचाव करते हैं। राष्ट्रमड्डडल खेलों की बात हो, पीजे थॉमस की नियुक्ति का मामला हो अथवा 2जी स्पेक्ट्रम की बात सरकार की कोताही सामने आई। इतना ही नहीं कांग्रेस का अपने मंत्रियोड्ड का बचाव भी शर्मनाक उदाहरण है। भ्रष्टाचार के मामले में कांग्रेस सहित सभी पार्टियों का रवैया एक जैसा ही है। कर्नाटक में भाजपा ने येद्दयुरप्पा और रेड्डी बंधुओं का बचाव करके साबित कर दिया है कि भ्रष्टाचार के मामले में सब एक जैसे हैं। क्षेत्रीय दलों ने तो पहले से ही भ्रष्टाचार के कीर्तिमान स्थापित कर रखे हैं। वास्तव में हमारी सभी समस्याओं की जड़ भ्रष्टाचार ही है। यूपीए की सरकार यह दावा कर रही है कि वह देश का समावेशी विकास कर रही है, लेकिन महंगाई जिस रफ्तार से बढ़ रही है उससे देश के गरीब लोगों की आमदनी भी बाजार के जरिये बड़ी कड्डपनियों के पास पहुड्डच रही है। महंगाई पर नियंत्रण करना है तो जमाखोरी और मुनाफाखोरी पर लगाम जरूरी है। पर इसके लिए न यूपीए तैयार है और न विपक्षी दलों की राज्य सरकारें कोई कदम उठाना चाहती हैं। भ्रष्ट नेता ही जमाखोरी और मुनाफाखोरी को बढ़ावा दे रहे हैं और वे इस कमाई में हिस्सेदार हो गए हैं। सरकार अरबों-खरबों की योजनाएं चलाकर भी लोगों का पूरा कल्याण नहीं कर सकती, क्योंकि भ्रष्टाचार के कारण उसकी नीतियां कभी सफल नहीं हो सकती हैं। आज कोई योजना या कार्यक्रम ऐसा नहीं हैं जिसमें भ्रष्टाचार नहीं है। 2जी स्पेक्ट्रम, कॉमनवेल्थ गेम्स से लेकर मनरेगा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन तक तमाम योजनाएं भ्रष्टाचार की गिरफ्त में हैं। ऐसा नहीं है कि भ्रष्टाचार दूसरे देशों में नहीं है, लेकिन वहां भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों को कड़ी सजा मिलती है। कुछ लोगों को तो फांसी पर भी लटकाया गया है। हमारे यहाड्ड जिस बेशर्मी से देश के राजनेता भ्रष्ट मंत्रियों और अधिकारियों का बचाव करते नजर आते हैं उसकी मिसाल खोजनी मुश्किल है। राज्यों के लोकायुक्तों और कैग की रिपोर्ट सुबूत है कि किस तरह से जनता के धन की बंदरबाट और लूट हो रही है। उत्तर प्रदेश हो या कर्नाटक अथवा महाराष्ट्र सब जगह सार्वजनिक धन के दुरुपयोग की शिकायतें हैं, लेकिन महंगाई और भ्रष्टाचार पर राजनीतिक दल शायद ही कभी विलाप करते हैं। यूपीए सरकार के सत्ता संभालने के बाद से महंगाई के मुद्दे पर संसद में कम से कम दस बार चर्चा हो चुकी है, लेकिन इन चर्चाओं का कुछ खास नतीजा नहीं निकला। महंगाई की मार से आम आदमी को फिलहाल बचाने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा। (लेखक स्वतड्डत्र टिप्पणीकार हैं

विदेश में नौकरी के नाम पर ठगी, 500 पासपोर्ट बरामद

पटना बिहार की राजधानी में विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर लोगों को ठगने वाली एक कंपनी का पर्दाफाश हुआ है। पटना पुलिस ने शनिवार को ग्रीन इंडिया नाम की कंपनी के दफ्तर से पांच सौ लोगों के पासपोर्ट जब्त किए हैं। ये पासपोर्ट बिहार व झारखंड के लोगों के हैं, जिन्होंने विदेश में नौकरी के लिए इसे उक्त कंपनी में जमा किया था। पटना के सिटी एसपी शिवदीप लांडे ने बताया कि ग्रीन इंडिया नामक कंपनी ने विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर तमाम लोगों से 20-20 हजार रुपये और उनके पासपोर्ट जमा कराए थे। बाद में वह विदेश में नौकरी दिलाने के वादे से मुकर गई। जब उसने धनराशि व पासपोर्ट वापस नहीं किए, तो लोगों ने कंपनी के खिलाफ थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी। इसके बाद पुलिस ने पांच सितंबर को कंपनी का दफ्तर सील कर दिया था। पुलिस ने शनिवार को सील तोड़कर दफ्तर की जांच की तो वहां पर पांच सौ लोगों के पासपोर्ट व नौकरी के आवेदन बरामद हुए। कंपनी के अधिकारी फरार हैं। दफ्तर की देखरेख करने वाले दो लोगों को हिरासत में लिया गया है। उनसे पूछताछ जारी है। कंपनी के अधिकारियों ने लोगों को बताया था कि उनकी शाखा पटना के अलावा मुंबई और कोलकाता में है। जब लोगों को जानकारी हुई कि कंपनी की कोई भी शाखा मुंबई और कोलकाता में नहीं है तो वे अपने पैसे वापस करने का दबाव बनाने लगे। इसी बीच कंपनी के लोग फरार हो गए। सिटी एसपी ने कहा कि मामले की तहकीकात जारी है। फर्जीवाड़ा करने वाले शीघ्र ही पुलिस की गिरफ्त में होंगे

नोट कांड में आडवाणी का नया खुलासा

: भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने शनिवार को नोट के बदले वोट मामले में कहा कि उनकी पार्टी के तीन सांसदों से लोगों ने यह सोच कर संपर्क किया कि वे अनुसूचित जाति और आदिवासी समुदाय के हैं और उन्हंें गुमराह करने में आसानी होगी। आडवाणी ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि गड़बडि़यों का पर्दाफाश करने वालों को प्रभावकारी विधायी संरक्षण उपलब्ध कराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इसके अभाव में आइओसी के अधिकारी मंजूनाथ शनमुघम और एनएचएआइ के इंजीनियर सत्येंद्र दुबे की तरह खुलासा करने वालों की हत्याओं का खतरा बना रहेगा। उन्होंने कहा कि नोट के बदले वोट मामले में भाजपा के दो सांसदों फग्गन सिंह कुलस्ते और महावीर भागोरा को गिरफ्तार किया गया जबकि इन दोनों ने जुलाई 2008 के विश्वास मत के दौरान सांसदों की खरीद फरोख्त का खुलासा किया था। अपने ब्लाग में आडवाणी ने दावा किया कि भाजपा के जिन तीन सांसदों ने इस घोटाले का पर्दाफाश करके इतिहास रचा उसमें फग्गन सिंह कुलस्ते आदिवासी और महावीर भागोरा तथा अशोक अरगल अनुसूचित जाति के हैं। जिन लोगों ने उनसे संपर्क किया, वे यह मान कर चले कि इन सांसदों को आसानी से अपने जाल में फंसाया जा सकता है

टीम अन्ना से बदसलूकी

नई दिल्ली बाराखंभा थाना पुलिस ने शुक्रवार को टीम अन्ना के दो सदस्यों प्रवीण कुमार व मनोज यादव को इसलिए पकड़ लिया क्योंकि वे काला कुर्ता पहने थे और दाढ़ी बढ़ा रखी थी। दोनों को थाने लाकर सात घंटे तक बैठाए रखा गया। कुछ भी बोलने पर उनके साथ दु‌र्व्यवहार किया गया। टीम के कई वरिष्ठ सदस्यों के पहुंचने पर जब मामला भारी पड़ गया तब थानाध्यक्ष हाथ जोड़ मांफी मांगने लगे। टीम अन्ना के सदस्य मनीष सिसौदिया व अरविंद गौड़ ने इसकी लिखित शिकायत एडिशनल पुलिस कमिश्नर केसी द्विवेदी से लेकर पुलिस कमिश्नर बीके गुप्ता से की है। वे इस मामले को मानवाधिकार आयोग में भी ले जाएंगे। दोनों युवक अस्मिता थियेटर के हैं। इंडिया अगेंस्ट करप्शन कोर कमेटी के सदस्य अरविंद गौड़ अस्मिता थियेटर ग्रुप के डायरेक्टर हैं। थियेटर के कलाकर जगह-जगह अन्ना के समर्थन में नुक्कड़ नाटक कर लोगों को जागरूक करने का काम कर रहे हैं। इसी कड़ी में शुक्रवार की दोपहर थियेटर के कुछ कलाकर वसंत वैली स्कूल में नुक्कड़ नाटक कर रहे थे। नाटक समाप्त होने के बाद प्रवीण व मनोज फार्म खरीदने कनॉट प्लेस आए थे। दोनों काले रंग का कुर्ता पहन रखा था व दाढ़ी बढ़ा रखी थी। दोपहर करीब साढ़े तीन बजे कुछ पुलिस कर्मी दोनों के पास आए और कहा कि उन्होंने काला कुर्ता क्यों पहन रखा है। उन्हें उन पर शक है। दोनों ने अपना परिचय देते हुए परिचय पत्र भी दिखाया और पुलिस कर्मियों की अरविंद गौड़ से बात भी करवा दी। फिर भी वे उनकी बात सुनने को तैयार नहीं हुए और दोनों को हिरासत में लेकर पूछताछ के लिए थाने ले आए। कुछ ही देर में अरविंद गौड़ समेत थियेटर के कई कलाकर थाने पहुंच गए। उस समय थानाध्यक्ष अमरदीप सहगल थाने में नहीं थे। थाने में मौजूद सब इंस्पेक्टर से टीम के अन्ना के सदस्यों ने बात करनी चाही। किंतु कोई उनसे बात करने को तैयार नहीं हुए। रात नौ बजे जब थानाध्यक्ष थाने आए तो वह भी टीम अन्ना की बात सुनने को तैयार नहीं हुए। तब तक मनीष सिसौदिया भी आ गए। मामला जब आला अधिकायिों के पास पहुंचा तो रात साढ़े दस बजे दोनों को छोड़ दिया गया। केसी द्विवेदी ने बताया कि वह मामले की जांच करवा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार पुलिस अधिकारियों का अपनी सफाई में कहना है कि आतंकी हमलों के खतरे के चलते किसी भी संदिग्ध व्यक्ति या परिस्थिति की वे पूरी तरह से गहन छानबीन करते हैं। ऐसा न करने पर उन पर ही लापरवाही बरतने के भी आक्षेप लगते हैं। हालांकि दिल्ली पुलिस के आला अफसर इस मामले को किसी तरह भी आगे नहीं बढ़ने देना चाहते ताकि अन्ना समर्थकों के पक्ष में लोगों को रोष न बढ़े

जनता खड़ी होने लगी है, रास्ते निकलेंगे

जनलोकपाल कानून के लिए आंदोलन कर रहे महाराष्ट्र के समाजसेवी अन्ना हजारे से देश के लोगों की अपेक्षाएं काफी बढ़ गई हैं। अन्ना के इस आंदोलन में तरह-तरह के लोग भी जुड़ रहे हैं। इससे आंदोलन के भटकाव का खतरा भी अन्ना महसूस करते हैं और वह इससे सचेत भी हैं। अन्ना के आदर्श गांव रालेगण सिद्धि में उनसे उनके आंदोलन सहित कई अन्य मुद्दों पर दैनिक जागरण के विशेष संवाददाता ओमप्रकाश तिवारी ने लंबी चर्चा की। प्रस्तुत हैं इसके प्रमुख अंश- जनलोकपाल के लिए आपका आंदोलन शुरू होने के बाद से इसमें तमाम लोग जुड़ते जा रहे हैं। कुछ ऐसे लोग भी होंगे जो इस आंदोलन का फायदा उठाना चाहेंगे। उनकी पहचान आप कैसे करेंगे? आंदोलन में ये खतरे तो होते हैं। भीड़ में आने वाले लोगों में सामाजिक-राष्ट्रीय दृष्टिकोण वाले लोग भी आते हैं, कुछ स्वार्थी लोग भी इसमें आते हैं। इसलिए देश में ये आंदोलन तो चलाना है, लेकिन कहीं भी संगठन नहीं खड़ा करना है। संगठन में कई अवांछित बातें भी होने लगती हैं। मैं महाराष्ट्र में पिछले कई वर्षो से आंदोलन चला रहा हूं। 250 ब्लॉक में हमारा भ्रष्टाचार विरोधी जनांदोलन का संगठन है। लेकिन दो बार हमें पूरे राज्य में अपने इस संगठन की सभी इकाइयां भंग करनी पड़ी हैं। तब जाकर अच्छे लोग हाथ में आ सके हैं। इसलिए देश में आंदोलन चलाना तो और भी मुश्किल काम है। फिर क्या रास्ता है इन खतरों से बचकर चलने का? हम नहीं चाहते कि कोई संगठन बनाकर जनलोकपाल की लड़ाई का आंदोलन चलाया जाए। स्वयंसेवक के रूप में जो लोग जुड़ना चाहते हैं वे जुड़ें। कोई संगठन बनाकर अध्यक्ष, सचिव, महासचिव जैसे पदों का सृजन हम नहीं करना चाहते। पिछले दिनों हुआ आंदोलन भी स्वत:स्फूर्त जुड़े लोगों के कारण सफल हो सका। कोई संगठन नहीं था हमारे पास। लोग स्वयं जुड़ते गए, आंदोलन बड़ा होता गया। इसी तरह का आंदोलन हमेशा चलते रहना चाहिए। हम किसी पर अपनी मुहर नहीं लगाना चाहते। भ्रष्टाचार के साथ-साथ एक बड़ी समस्या देश में आतंकवाद की भी है। इसे समाप्त करने के संदर्भ में क्या सोचते हैं आप? आखिर आतंकवाद क्यों बढ़ा? इसकी जड़ में भी जाना चाहिए। सरकार जिस तरह का बर्ताव करती है लोगों के साथ, उसके कारण आतंकवाद बढ़ता है। आज किसानों की जमीन लाठी-गोली चलाकर ली जाती है। क्या इसे लोकतंत्र कहेंगे? ऐसी घटनाओं के कारण आतंकवाद पैदा होता है। जब लोगों की समस्याओं पर सरकार ध्यान नहीं देगी, उनके समाज की समस्याओं पर ध्यान नहीं देगी तो आतंकवाद पैदा होगा ही। सरकार कभी इस पर विचार नहीं करती। आज सरकार को लगता है कि हम मालिक हैं देश के। इसीलिए समस्याएं पैदा हो रही हैं। सेवक बनकर सरकार काम करती तो ऐसी समस्याएं कभी पैदा नहीं होतीं। अच्छी बात है कि जनता अब खड़ी होने लगी है। इसमें से कई रास्ते निकलकर आएंगे। ये आंदोलन कहां तक जाएगा, यह आज नहीं कहा जा सकता, लेकिन आशा की किरण तो दिखाई दे रही है। एक तरफ आडवाणी यात्रा निकाल रहे हैं, एक तरफ अन्ना की यात्रा निकलेगी। दोनों में क्या फर्क होगा? हम कोई रथयात्रा नहीं निकाल रहे हैं। एक तरफ गरीब लोगों के पास खाने को नहीं है, दूसरी तरफ रथयात्रा निकालना हम सही नहीं मानते। कोई पैदल यात्रा करे तो हम मान सकते हैं। गांधीजी की यही नीति थी कि पदयात्रा से बहुत शक्ति मिलती है। उसे हम भी मानते हैं। आपकी यात्रा किस तरह की होगी? वह यात्रा तो हम लोगों को जगाने के लिए करेंगे। ट्रेन से जाएंगे देश के कोने-कोने में। बहुत जरूरी हुआ तो हवाई जहाज से जा सकते हैं। यह यात्रा हम उन राज्यों में करेंगे जहां चुनाव होने वाले हैं। जनलोकपाल विधेयक के लिए राजनेताओं की तरफ से विपरीत बातें की जा रही हैं। इसका क्या कारण हैं? नेताओं की तरफ से विपरीत बातें तब की जाती हैं जब उनमें दंभ की भावना आ जाती है। सेवाभाव कम हो जाता है। राष्ट्र के प्रति प्रेम कम हो जाता है। तब अहं निर्माण होता है और ऐसे शब्द निकलते हैं। यह बात ठीक नहीं है। समाज को लेकर चलने वालों को ये सोचना चाहिए कि मेरे पीछे पूरा समाज आ रहा है। मैं क्या खाता हूं, मैं क्या पीता हूं, मैं कहां रहता हूं, कहां घूमता हूं, इस पर लोगों का ध्यान रहता है। यदि मुझमें कोई कमी रह जाएगी तो उसका बुरा असर समाज पर होगा। कुछ दिनों पहले जब मैं दिल्ली में अनशन कर रहा था तो भी यहां रालेगणसिद्धि में 30-40 हजार लोग रोज आते थे। ये माहौल इसलिए बना, क्योंकि लोग मेरी तरफ देखते हैं कि मैं क्या कर रहा हूं। यह बात हमारे राजनेताओं के दिल में भी आनी जरूरी है। आपके प्रति लोगों की अपेक्षाएं बढ़ गई हैं। रालेगणसिद्धि डाकघर में रोज 500-700 पत्र रोज आते हैं आपके नाम। आप कैसे उनकी अपेक्षाएं पूरी कर पाएंगे? (हंसते हुए) ये समस्या तो मेरे सामने भी है। देश की जनता की अपेक्षा मुझसे बहुत बढ़ गई है। जनता की यह अपेक्षा मैं कैसे पूरी कर सकूंगा, मेरे सामने ये बड़ा प्रश्न है। एक फकीर अपने मंदिर में सोता है। न धन है, न दौलत है। कोई बैंक बैलेंस नहीं है मेरा। एक दिन 500 पत्र आते हैं तो उनका जवाब देना भी मेरे लिए मुश्किल है। एक पत्र का जवाब देने के लिए पांच रुपए का भी टिकट लगाइए तो कितना पैसा खर्च होगा? ये पैसा कहां से लाऊंगा मैं। पैसा देने वाले भी हैं, लेकिन दो नंबर का पैसा हमें जमता नहीं है। ये पैसा लेकर मैं कुछ अच्छा काम करने जाऊं तो उसका बुरा असर पड़ेगा। इसलिए अपने जीवन में मैंने कभी किसी से कोई आर्थिक मदद या दान नहीं लिया। अभी दिल्ली में किसी ने मुझे एक करोड़ रुपये का अवार्ड देने की घोषणा की थी, लेकिन देने वाले लोगों के हाथ ठीक नहीं थे, इसलिए मैंने इंकार कर दिया। तो कैसे पूरी होंगी लोगों की अपेक्षाएं? एक मंदिर में रहने वाले एक फकीर के पीछे पूरे देश की जनता कैसे खड़ी हो गई, मेरे लिए भी यह एक रहस्य है। उनका मेरा कोई परिचय नहीं। उन्होंने मुझे देखा नहीं। फिर भी लोग मेरे पीछे खड़े हो गए, इससे मुझे भगवद्गीता का वह श्लोक याद आता है-यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत..। अर्थात, भगवान को कहीं परिवर्तन लाना है तो वह किसी न किसी को निमित्त बनाकर उसके पीछे खुद ही खड़ा हो जाता है। लोगों को सद्बुद्धि दे देता है। आज भी जनता की जो अपेक्षा बढ़ी है, उसमें कुछ न कुछ रास्ता वह निकालेगा, ऐसा मुझे विश्वास है।

लोकपाल के दायरे में आए कारपोरेट सेक्टर : सीवीसी

केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) का मानना है कि कारपोरेट सेक्टर को भी प्रस्तावित लोकपाल कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए। आयोग ने उच्च पदों पर आसीन नौकरशाहों और राजनेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप से लोकपाल के माध्यम से निपटने का समर्थन किया है। आयोग ने कहा है कि लोकपाल काकार्यक्षेत्र स्पष्ट होना चाहिए ताकि सीवीसी से उसका टकराव न हो। केंद्रीय सतर्कता आयुक्त प्रदीप कुमार ने कहा कि ब्रिटेन की तरह रिश्वत देने वाले को भी दंडित करने का प्रावधान शामिल किया जा सकता है। हम कारपोरेट सेक्टर को भी लोकपाल के दायरे में लाए जाने के खिलाफ नहीं हैं। वर्तमान में सीवीसी के पास निजी कंपनियों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर रोक लगाने की शक्तियां नहीं हैं। आयोग सरकारी कर्मचारियों और गैरसरकारी व्यक्तियों द्वारा आपराधिक षड्यंत्र और भ्रष्टाचार के मामलों को सीबीआइ के पास भेजता है। प्रदीप कुमार ने कहा, लोकपाल राजनेताओं से संबंधित भ्रष्टाचार के मामलों की भी जांच कर सकता है। अगर वे भ्रष्टाचार में संलिप्त पाए जाते हैं तो उनके खिलाफ कानून के तहत कदम उठाने जाने चाहिए। उल्लेखनीय है कि सीवीसी देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ शीर्ष सरकारी संगठन है। जुलाई में सीवीसी का पद संभालने वाले कुमार ने आगाह किया कि लोकपाल के अधिकारों की प्रक्रिया पेचीदा नहीं बनाई जानी चाहिए। इससे भ्रष्टाचार को दूर करने में विलंब होगा। उन्होंने कहा, सभी नौकरशाह विभागीय दंड नियमावलियों के अधीन आते हैं। कुछ मामलों में सीवीसी सीधे जुर्माना लगा सकता हैं, जबकि वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए उसे अनुमति लेनी पड़ती है। लोकपाल इन बिंदुओं पर ध्यान देकर प्रक्रिया को आसान कर सकता है। हाल में लोकपाल पर पुनर्गठित संसदीय समिति 23-24 सितंबर की बैठक में सीवीसी की भी राय ले सकती है

भ्रष्टाचार रोकने के तरीकों के बारे में जानेगी स्थायी समिति

लोकपाल विधेयक पर गौर कर रही संसद की स्थायी समिति के समक्ष इस सप्ताह मुश्किल काम होगा। संभावना है कि समिति केंद्रीय सूचना आयुक्त (सीवीसी) और सीबीआइ सहित विभिन्न संगठनों से भ्रष्टाचार रोकने के तरीकों के बारे में विचार जानेगी। विधि और न्याय तथा कार्मिक और जन शिकायत मामलों की स्थायी समिति का 3 दिन पूर्व पुनर्गठन होने के बाद कांगे्रस सदस्य अभिषेक मनु सिंघवी की अध्यक्षता में 23 और 24 सितंबर को इसकी बैठक होने वाली है। संसद के हालिया मानसून सत्र में इसी समिति को लोकपाल विधेयक भेजा गया और तीन महीने के भीतर रिपोर्ट देने को कहा गया। समिति से मजबूत लोकपाल विधेयक बनाने के तरीके सुझाने को कहा गया है ताकि अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं और सरकार के बीच मतभेद दूर किए जा सकें। सरकार ने जहां लोकपाल विधेयक संसद में पेश किया, वहीं हजारे पक्ष ने जन लोकपाल विधेयक का खाका तैयार किया जिसमें ऐसे कुछ प्रावधान हैं जो सरकार को मंजूर नहीं हैं। समिति की इन दो बैठकों में सीवीसी और सीबीआइ अधिकारियों के साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय, जाने माने वकील हरीश साल्वे और दलित नेता उदित राज को अपने विचार बताने के लिए बुलाया गया है। इस 31 सदस्यीय समिति में सिंघवी, भाजपा के राम जेठमलानी, बसपा के विजय बहादुर सिंह और कांग्रेस के मनीष तिवारी तथा शांताराम नाईक सहित कई सदस्य ऐसे हैं जो विधि विशेषज्ञ हैं। समिति में लालू प्रसाद, राम विलास पासवान और अमर सिंह भी हैं। समिति हजारे पक्ष के विचारों को पहले ही सुन चुकी है। समिति ने सभी से अनुरोध किया है कि उसे काम करने का उचित मौका दिया जाए। सिंघवी ने कहा, संभव है कि इससे सभी आलोचकों को आश्चर्य हो। प्रधानमंत्री ने यह स्पष्ट कर दिया है कि समिति न सिर्फ सरकार द्वारा पेश विधेयक पर, बल्कि जन लोकपाल विधेयक और अरुणा रॉय के विधेयक सहित विभिन्न संस्करणों पर भी गौर कर सकेगी

बिहार की तर्ज पर भ्रष्टाचारियों के खिलाफ होगी कार्रवाई

चित्रकूट मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री व भारतीय जनता पार्टी के फायर ब्रांड नेता उमा भारती ने यहां कहा कि बसपा और सपा दोनों पार्टियों ने पांच-पांच साल प्रदेश में राज कर जनता की गाढ़ी कमाई को लूटा है। सूबे में भाजपा की सरकार बनने पर भ्रष्टाचारियों को जेल भेजकर बिहार की तर्ज पर उनकी संपत्यिों में स्कूल और अस्पताल खोले जाएंगे। साध्वी उमा भारती रविवार को यहां विजय वाहिनी संकल्प सम्मेलन को संबोधित कर रही थीं। उन्होंने कहा कि भाजपा के सत्ता में आने पर दोनों सरकारों के खिलाफ जांच कराई जाएगी। उनकी पार्टी की मंशा है कि प्रदेश में रामराज्य कायम हो। उन्होंने पदाधिकारियों को आगाह किया कि दोबारा सत्ता हासिल करने के लिए विजयवाहिनी कार्यकर्ता ही आधार है। रामलीला मैदान कर्वी में आयोजित सम्मेलन में कार्यकर्ताओं से साध्वी ने कहा कि भारतमाता को परम वैभव तक पहुंचाने का रास्ता उत्तर प्रदेश से निकलता है। नेताओं के चक्कर लगाना बंदकर गरीबों की झोपड़ी के चक्कर लगाएं और उन्हें आश्र्वस्त करें कि रामराज्य लाएंगे। पहले सत्ता परिवर्तन, फिर व्यवस्था परिवर्तन के लिए कार्यकर्ता तैयार हो जाएं। इसके लिए नेताओं के चक्कर लगाने की जरूरत नहीं है। जनता के बीच जाएं, रूठे कार्यकर्ताओं को मनाएं। अत्याचारी, भ्रष्टाचारी व अपराधी सरकार के खिलाफ शुरू किये गए युद्ध में विजय जरूर मिलेगी, लेकिन हमें इसके लिए राम की सेना की तरह काम करना पड़ेगा। कार्यकर्ताओं को स्वार्थ ताक पर रखकर भारतमाता की अस्मिता बचाने के लिए चुनावी युद्ध के मैदान में जाना चाहिए। उन्होंने सम्मेलन में महिला कार्यकर्ताओं की खासी भागीदारी को देखते हुए कहा कि कामदगिरि में माता सीता सबसे अधिक सुखी रही हैं। उनकी छत्र छाया में रहनेवाली महिलाओं का आशीर्वाद पार्टी के साथ है। इससे विधानसभा चुनाव में अवश्य विजय प्राप्त होगी, क्योंकि

भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर हमलावर हुई कांग्रेस

कांग्रेसनीत केंद्र सरकार खुद जिस भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर परेशानियों के दौर से गुजर रही है, उसी मुद्दे को लेकर गुजरात कांग्रेस के नेता मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को घेर रहे हैं। मोदी के उपवास के खिलाफ यहां गांधी आश्रम पर सत्याग्रह कर रहे शंकर सिंह वाघेला और अर्जुन मोढवाडिया ने प्रदेश सरकार को भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा बताया है। प्रदेश कांग्रेस के दिग्गज नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री शंकर सिंह वाघेला और प्रदेश अध्यक्ष अर्जुन मोढवाडिया लंबे समय से मोदी के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। हाल ही में राज्यपाल डॉ. कमला की ओर न्यायमूर्ति आरए मेहता को लोकायुक्त नियुक्त किए जाने के बाद तो गुजरात की राजनीति में भूचाल आ गया। गुजरात कांग्रेस ने मोदी सरकार पर सबसे पहले एक लाख करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार का आरोप लगाया, जिससे सरकार पसोपेश में है। इसी बीच नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में राज्य सरकार के साढे़ छब्बीस हजार करोड़ रुपये के खर्चो पर सवाल उठा दिए हैं। फिलहाल कांग्रेस के निशाने पर मोदी का हाईटेक उपवास है। कांग्रेस का आरोप है कि राज्य सरकार गरीब जनता के धन के बूते फाइव स्टार उपवास कर रही है। वाघेला का कहना है कि मोदी खुद की छवि निखारने को सरकारी धन बर्बाद कर रहे हैं। तीस लाख रुपये का वातानुकूलित हॉल, चार सौ रुपये की खाने की प्लेट और अतिविशिष्ट मेहमानों के आने-जाने के लिए विशेष चार्टर्ड विमानों की व्यवस्था, यह खर्च कौन उठाएगा? पूर्व मुख्यमंत्री सुरेश मेहता ने तो बाकायदा मुख्य सचिव एके जोति को पत्र लिखकर कहा है कि सरकारी नियमों के मुताबिक इस प्रकार के उत्सव का खर्च सरकार वहन नहीं कर सकती। प्रशासन आखिर इस खर्च को किस मद में डालने की तैयारी कर रहा है। मोढवाडिया ने सवाल उठाया है कि गुजरात पर एक लाख 33 हजार करोड़ रुपये का कर्ज है। पैदा होते ही एक बच्चे पर 25 हजार रुपये का कर्ज चढ़ जाता है, लेकिन सरकार को परवाह ही नहीं है। दिनशा पटेल ने जड़े आरोप अहमदाबाद : केंद्रीय मंत्री दिनशा पटेल ने आरोप लगाया है कि गुजरात सचिवालय के दरवाजे आम आदमी के लिए बंद हैं। पैसे देने पर ही यह दरवाजे खुलते हैं, लेकिन अब तीन दिन के लिए तो सरकार और सचिवालय को ही ताला लग गया है। पूरी सरकार और प्रशासन मुख्यमंत्री मोदी की सेवा में खड़ा है। दिनशा का कहना है कि राज्य में असत्य सरकार के खिलाफ कांग्रेस के सत्य की लड़ाई है, जिसमें सत्य की ही जीत होगी। एचआइवी पीडि़त बच्चों ने सुनाई वाघेला को व्यथा जूनागढ़ के सरकारी अस्पताल की लापरवाही के कारण गत दिनों तीस थैलेसीमिया पीडि़त बच्चों को एचआइवी संक्रमित खून चढ़ा देने से उनके संक्रमित हो जाने का खुलासा हुआ था। जूनागढ़ महापौर कैप्टन सतीश और उपमहापौर गिरीश कोटेचा के साथ रविवार को 12 एचआइवी संक्रमित बच्चों तथा उनके अभिभावकों ने कांग्रेस के सत्याग्रह में आकर अपनी व्यथा सुनाई। अल्फाज गामिति तथा धर्मेश मावाणी ने बताया कि अस्पताल हमारी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। सरकार कोई मदद नहीं कर रही है जिसके कारण उनका जीवन खतरे में है। अस्पताल प्रशासन ने उलटा हम पर दोष मंढ दिया है कि आपने बाहर से संक्रमित खून चढ़वा लिया होगा। उधर, आसाराम बापू के आश्रम में संदिग्ध हालत में मृत पाए गए दीपेश -अभिषेक के परिजनों ने भी कांग्रेस के साथ सत्याग्रह पर बैठे हैं

Saturday, September 17, 2011

भ्रष्टाचार से लड़ने के नियम

धूल दब गई है और कुछ हद तक शांति कायम हो गई है। दिल्ली को फतह कर अन्ना हजारे अपने गांव लौट गए हैं। अगले तूफान से पहले उन्हें अपनी बढ़त को और मजबूत करना चाहिए। वह अपने सहयोगियों के साथ मंथन कर रहे हैं ताकि भ्रष्टाचार के खिलाफ एक परिणामोन्मुख, दीर्घकालीन एजेंडे को आगे बढ़ा सकें। इस बीच, मैं टीम अन्ना को भ्रष्टाचार के कुछ प्राथमिक घटकों से अवगत कराना चाहता हूं। यह देखना अहम है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कौन से कदम कारगर साबित हो सकते हैं और कौन से नहीं। यह एक तरह से भ्रष्टाचार से लड़ने की नियमावली है। मजबूत लोकपाल अच्छा विचार है, किंतु यह प्रभावी होना चाहिए। लोकपाल तभी सफल हो सकता है जब यह कुछ चुनिंदा मामलों को ही हाथ में ले। इसे अपना ध्यान बड़ी मछलियों पर केंद्रित करना चाहिए और छोटी मछलियां लोकायुक्त, सतर्कता आयुक्त और अन्य एजेंसियों के जिम्मे छोड़ देनी चाहिए। लोकपाल के पास सरकार की अनुमति के बगैर मामले को हाथ में लेने का अधिकार होना चाहिए और इसका निर्णय बाध्यकारी होना चाहिए। मुख्य सतर्कता आयुक्त की विफलता के कारणों को दूर करके इसमें सुधार किया जा सकता है। मुख्य सतर्कता आयुक्त लोकपाल के प्रति जवाबदेह होना चाहिए, किंतु वह इसके अधीन नहीं होना चाहिए। इसी प्रकार, सीबीआइ भी लोकपाल के प्रति जवाबदेह होते हुए इसके अधीन नहीं होनी चाहिए। ये तीनों-लोकपाल, मुख्य सतर्कता आयुक्त और सीबीआइ स्वायत्त इकाई होनी चाहिए। हालांकि, सीबीआइ के मामले में, एकल निर्देश, जिसके तहत वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ मामला चलाने के लिए सरकार की पूर्वानुमति जरूरी होती है, के प्रावधान को खत्म नहीं करना चाहिए। जैसाकि सुप्रीम कोर्ट ने सुझाया था कि इससे निर्णय लेने की शक्ति खत्म हो जाती है। लोकपाल की नियुक्ति के संबंध में काफी कुछ भाग्य पर निर्भर करता है। टीएन शेषन के मोर्चा संभालने तक चुनाव आयोग एक सामान्य संस्थान ही था। इसके बाद एक और लाजवाब मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह आए। हाल ही में कर्नाटक के लोकायुक्त ने राज्य के मुख्यमंत्री को घुटने टेकने को मजबूर कर दिया। जब लोकपाल के चुनाव का समय आएगा तो इसकी सक्षमता, सख्ती, इच्छाशक्ति और साहस बहुत कुछ भाग्य पर निर्भर करेगा। लोकपाल को दवा की जरूरत है। बीमारी के लंबे समय बाद ही इस पर ध्यान गया है। इलाज से बेहतर रोकथाम है। भ्रष्टाचार को रोकने के लिए हमें शासन के अपने संस्थानों-प्रशासन, पुलिस, न्यायपालिका और चुनाव प्रणाली में सुधार की शुरुआत कर देनी चाहिए। चूंकि भारतीयों का रोजाना नौकरशाही से साबका पड़ता है, इसलिए यह पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। अगर निर्णय लेने में पारदर्शिता, ईमानदारी हो और देरी करने वाले अधिकारियों को दंडित किया जाए तो भ्रष्टाचार पर काफी अंकुश लग सकता है, किंतु ये प्रशासनिक सुधार तब तक कारगर नहीं होंगे जब तक कि नौकरशाही में पदोन्नति की प्रक्रिया में बदलाव न लाया जाए। वर्तमान व्यवस्था में वरिष्ठता को आधार बनाया जाता है। जो अधिकारी जितने समय से नौकरी कर रहा है उसे उतनी ही अधिक पदोन्नति मिलती है। इसमें बेहतर प्रदर्शन पर प्रोत्साहन और खराब काम पर दंडित करने की व्यवस्था होनी चाहिए। आकलन करने की वर्तमान व्यवस्था अप्रभावी है। भारत में ऐसे अधिकारी गिने-चुने हैं जिन्हें बहुत अच्छा या लाजवाब बताया जा सके। हांगकांग की एक स्वतंत्र फर्म ने 13 देशों की नौकरशाही में भारत को सबसे निचले दर्जे पर रखा है। भ्रष्टाचार दो प्रकार का होता है-उत्पीड़क और कपटपूर्ण। कपटपूर्ण भ्रष्टाचार में राष्ट्रीय संपत्ति को चुराने के लिए घूस लेने और देने वालों की मिलीभगत होती है, जैसाकि 2जी घोटाले में हुआ। इसमें दोनों पक्षों को दंडित किया जाना चाहिए। उत्पीड़क भ्रष्टाचार में कोई अधिकारी किसी नागरिक को उसका अधिकार जैसे जन्म प्रमाणपत्र या राशनकार्ड देने की एवज में घूस वसूलता है। यहां घूस देने वाला उत्पीड़न का शिकार है और उसे शिकायत करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। जनलोकपाल मसौदे में भ्रष्टाचार के शिकार लोगों की सुरक्षा की वकालत की गई है। झूठी शिकायतों के मामले में सरकारी बिल बेहतर है, जिसमें ऐसा करने वालों के लिए कठोर दंड का प्रावधान है। उत्पीड़क भ्रष्टाचार को रोकने में इंटरनेट हमारा बड़ा मददगार साबित हुआ है। इसकी वजह से पारदर्शिता बढ़ी है। रेलवे टिकट बुकिंग और कुछ राज्यों में भूमि का रिकॉर्ड नेट पर डालने से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा है। जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र, राशन कार्ड, पेंशन भुगतान, ड्राइविंग लाइसेंस रिन्यूवल आदि में ई-गवर्नेस अपनाने से भ्रष्टाचार में कमी आई है। प्रत्येक सरकारी विभाग के लिए यह अनिवार्य हो जाना चाहिए कि वह तमाम नियम, प्रक्रियाएं और फॉर्म आदि इंटरनेट पर जारी करे। सरकारी कार्यालयों में अभी तक सिटीजन चार्टर विफल रहा है, लेकिन अन्ना के आंदोलन के बाद दिल्ली समेत पांच राज्यों ने इसे लागू करने का फैसला लिया है। हर कोई जानता है कि भूमि भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा श्चोत है। भूउपयोग में परिवर्तन, नगरपालिका की अनुमति, कंपलीशन सर्टिफिकेट, रजिस्ट्री, नक्शा पास कराने और अन्य दर्जनों अनुमति देने में भारी घूसखोरी होती है। राष्ट्रीय संसाधनों, जैसे खनन, तेल व गैस, टेलीकॉम स्पेक्ट्रम आदि में तो भ्रष्टाचार चरम पर पहुंच जाता है, क्योंकि अधिकांश औद्योगिक और बड़ी भवन निर्माण परियोजनाओं में पर्यावरण मंत्रालय से अनुमति ली जाती है, इसलिए अब यह मंत्रालय ही लाइसेंस राज में तब्दील हो गया है। जब से इंदिरा गांधी ने कॉरपोरेट चंदे पर रोक लगाई है तब से चुनाव पूरी तरह काले धन पर ही लड़े और जीते जाते हैं। चुनाव सुधार को भी वरीयता दी जानी चाहिए। राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र स्थापित करने और अपराधियों को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित करने के उपायों पर विचार होना चाहिए। न्यायिक और पुलिस सुधार नाजुक विषय हैं। पुलिस विभाग को सरकार के बंधनों से मुक्त करके स्वायत्तता दी जानी चाहिए। न्यायपालिका को भी न्यायिक आयोग के अधीन लाया जाना चाहिए। अंत में, सबसे महत्वपूर्ण सबक यह है कि सरकार को छोटा बनाए रखें। समझदार सरकारें उद्योग, एयरलाइंस और होटल नहीं चलातीं। हम 1991 में देख चुके हैं कि कम से कम नियंत्रण और लाइसेंस का मतलब है कम भ्रष्टाचार। सुधार ही भ्रष्टाचार की सही दवा है। (लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं

जयललिता को एक और झटका

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता को आय से अधिक संपत्ति के मामले में एक और झटका लगा है। शुक्रवार को सुनवाई के दौरान कर्नाटक हाईकोर्ट ने मामले में आगे जांच करने के तमिलनाडु विजिलेंस विभाग के फैसले को खारिज कर दिया। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें व्यक्तिगत पेशी से छूट देने से इंकार करते 20 अक्तूबर को सुनवाई के दौरान कोर्ट में मौजूद रहने को कहा था। डीएमके महासचिव के. अनबाझगन ने याचिका दायर कर तमिलनाडु सतर्कता और भ्रष्टाचार निरोधक विभाग के निदेशक द्वारा मामले में आगे और जांच करने के फैसले को चुनौती दी थी। अनबाझगन की याचिका स्वीकार करते हुए 29 जुलाई को कोर्ट ने विजिलेंस के फैसले पर 4 अगस्त तक रोक लगा दी थी। साथ ही मामले में विशेष सरकारी अभियोजक और विजिलेंस शाखा चेन्नई को नोटिस जारी किया था। जस्टिस वी. जगन्नाथन ने शुक्रवार को दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद 15 जून के विजिलेंस विभाग के फैसले को खारिज कर मामले में आगे जांच करने को लेकर चल रही कवायद पर विराम लगा दिया। कोर्ट ने अंतरिम आदेश पर मुहर लगाते हुए कहा कि विजिलेंस इस मामले में आगे जांच नहीं कर सकता। न्यायाधीश जगन्नाथन ने कहा कि वक्त आ गया है कि मामले में न्याय किया जाए। अदालत ने साफ तौर पर जयललिता को निशाने पर लेते हुए कहा कि उनके सत्ता में आने के बाद आगे और जांच के फैसला संदेह पैदा करता है। इस बारे में विभिन्न विभागों के बीच हुए संवाद से साफ पता चलता है कि आगे और जांच का फैसला राज्य के मुख्य सचिव ने लिया है। राज्य के मुखिया पर चल रहे मामले में सरकार की ओर से जांच एजेंसी को दोबारा जांच करने का फैसला कई सवाल खड़े करता है। इस फैसले की मामले में आगे और जांच या दोबारा जांच करने से पहले जो किया जा चुका है, उसे बदला नहीं जा सकता। उच्च न्यायालय ने जया के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के इस मामले में ट्रायल कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का पूरी तरह पालन करने को भी कहा है। अनबाझगन ने याचिका में आरोप लगाया था कि विजिलेंस के फैसले से प्रतीत होता है कि आरोपियों के साथ उसकी साठगांठ है। उन्होंने कहा कि बेंगलूर की विशेष कोर्ट में सुनवाई के दौरान विजिलेंस के इस फैसले का एकमात्र उद्देश्य रिकॉर्ड में लाए जा चुके सबूतों और साक्ष्यों को नष्ट करना है। याचिका में कहा गया है कि सीआरपीसी की धारा 173(8) की आड़ में आगे जांच करने का यह फैसला राजनीतिक मकसद से लिया गया है और इसका उद्देश्य मुख्यमंत्री को फायदा पहुंचाना है। सुनवाई में कोई राजनीतिक दखल न पड़े, इसे देखते हुए इस मामले की सुनवाई तमिलनाडु से बाहर की जा रही है

Friday, September 16, 2011

आयुर्वेदिक दवा खरीद का मसला हाईकोर्ट पहुंचा

, शिमला हिमाचल प्रदेश के आयुर्वेदिक अस्पतालों के लिए सूबे के बाहर से अधिक मूल्य पर दवाओं की खरीद का मामला अदालत पहुंच गया है। हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा कि उसने किस कारण अधिक मूल्य पर दवाइयों की खरीद की। अदालत ने सरकार को इस बाबत 30 सितंबर तक हलफनामे के साथ जवाब दाखिले को कहा है। मुख्य न्यायाधीश कुरियन जोसेफ और न्यायाधीश राजीव शर्मा की खंडपीठ ने हिमाचल प्रदेश आयुर्वेदिक मैन्युफेक्चरिंग एसोसिएशन की याचिका की सुनवाई के दौरान आयुर्वेद निदेशक को 30 सितंबर तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि निदेशक आयुर्वेद ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर अधिकतर दवाइयों की खरीददारी राज्य से बाहर की कंपनियों से अधिक मूल्य पर की। नियमों के तहत 70 फीसदी खरीददारी राज्य की और 30 फीसदी खरीददारी बाहरी कंपनियों से की जानी चाहिए। निदेशक ने नियमों को ताक पर रखकर 8 से 9 करोड़ की खरीद की। निदेशक आयुर्वेद ने नियमों को अपने ढंग से अमल में लाते हुए अधिक मूल्यों पर राज्य से बाहर की कंपनियों से दवाइयों की खरीददारी की। इस बाबत यह स्पष्टीकरण दिया गया कि केंद्र द्वारा दी मदद से दवाइयों की खरीद की गई, इस कारण केंद्र के नियमों को अमल में लाते हुए खरीददारी की गई। प्रार्थी ने तर्क दिया है कि सेंट्रल रूल्स में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि खरीददारी बाहर की कंपनियों से ही की जानी थी। प्रार्थी के अनुसार, 2009 की कोटेशन के आधार पर खरीदारी के आर्डर फैक्स के माध्यम से भेजे गए। इस बाबत निविदाएं नहीं आमंत्रित की गई। निदेशक आयुर्वेद को दवाइयों की क्वालिटी के बारे में ज्ञान नहीं है, क्योंकि वह ड्रग्ज एंड कास्मेटिक्स रूल्स के अनुसार निदेशक की शैक्षणिक योग्यता को पूरा नहीं करते हैं। प्रार्थी ने न्यायालय से गुहार लगाई है कि राज्य सरकार को निर्देश दिए जाएं कि 2010-11 में हुई दवाइयों की खरीद की जांच स्वतंत्र एजेंसी से की जाए