Friday, September 23, 2011
सरकार के प्रति बदला अन्ना का रुख
नई दिल्ली अन्ना हजारे अब अपने ही आंदोलन की छाया से बाहर निकलने की कोशिश में दिख रहे हैं। साथ ही दिल्ली के अपने सिपहसलारों के प्रभाव से भी। यह पहला मौका है, जब उन्होंने भ्रष्टाचार की रोकथाम के मामले में सरकार की तारीफ की है। इसी तरह यह भी पहली बार है कि प्रधानमंत्री को लिखे उनके पत्र में न कोई कठोर शब्द है, न कोई समय सीमा दी गई है। यहां तक कि न्यायिक उत्तरदायित्व बिल पर भी अन्ना अपने घोषित रुख से पीछे हटे हैं। अन्ना ने प्रधानमंत्री को पिछला पत्र 16 अगस्त के अपने चर्चित अनशन से ठीक दो दिन पहले लिखा था। इसमें प्रधानमंत्री को तानाशाह तक बताया था। मगर बुधवार को लिखी चिट्ठी की भाषा बहुत बदली हुई है। इसमें अन्ना ने लोकपाल पर सरकार के आश्वासन की तारीफ करते हुए लिखा है कि भ्रष्टाचार की रोकथाम की दिशा में यह एक अच्छी पहल है। न्यायिक उत्तरदायित्व बिल पर संसदीय समिति की रिपोर्ट आने के बाद अन्ना के सहयोगियों ने इसे साफ तौर पर खारिज कर दिया था। अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण और किरण बेदी ने कहा था कि इस धोखे के बाद वे न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में लाने की अपनी मांग पर फिर से लौट आए हैं। मगर अन्ना ने लिखा है, इस कानून के लिए जानकार लोगों, जन प्रतिनिधियों और सरकारी तंत्र को मिल कर अच्छा मसौदा बनाना चाहिए। मनमोहन सिंह को लिखे पत्र में उन्होंने बार-बार राजीव गांधी के स्थानीय स्वशासन के काम की तारीफ की है। उन्होंने लिखा है कि राजीव के प्रयासों से ही संविधान में 73वें और 74वें संशोधन के जरिए ग्राम सभा और शहरी निकायों को अहमियत मिली। भू अधिग्रहण के संबंध में उन्होंने ग्राम सभाओं को अधिक शक्ति देने को कहा है। इस बार उन्होंने जन लोकपाल बिल के किसी खास प्रावधान या इसकी समय सीमा को लेकर कुछ भी नहीं लिखा है। बल्कि कहा है कि बार-बार आंदोलन से उन्हें कोई खुशी नहीं होती। इससे जनता के प्रति सरकार की अनास्था और अनादर की भावना का संदेश जाता है
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