Friday, September 16, 2011

आयुर्वेदिक दवा खरीद का मसला हाईकोर्ट पहुंचा

, शिमला हिमाचल प्रदेश के आयुर्वेदिक अस्पतालों के लिए सूबे के बाहर से अधिक मूल्य पर दवाओं की खरीद का मामला अदालत पहुंच गया है। हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा कि उसने किस कारण अधिक मूल्य पर दवाइयों की खरीद की। अदालत ने सरकार को इस बाबत 30 सितंबर तक हलफनामे के साथ जवाब दाखिले को कहा है। मुख्य न्यायाधीश कुरियन जोसेफ और न्यायाधीश राजीव शर्मा की खंडपीठ ने हिमाचल प्रदेश आयुर्वेदिक मैन्युफेक्चरिंग एसोसिएशन की याचिका की सुनवाई के दौरान आयुर्वेद निदेशक को 30 सितंबर तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि निदेशक आयुर्वेद ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर अधिकतर दवाइयों की खरीददारी राज्य से बाहर की कंपनियों से अधिक मूल्य पर की। नियमों के तहत 70 फीसदी खरीददारी राज्य की और 30 फीसदी खरीददारी बाहरी कंपनियों से की जानी चाहिए। निदेशक ने नियमों को ताक पर रखकर 8 से 9 करोड़ की खरीद की। निदेशक आयुर्वेद ने नियमों को अपने ढंग से अमल में लाते हुए अधिक मूल्यों पर राज्य से बाहर की कंपनियों से दवाइयों की खरीददारी की। इस बाबत यह स्पष्टीकरण दिया गया कि केंद्र द्वारा दी मदद से दवाइयों की खरीद की गई, इस कारण केंद्र के नियमों को अमल में लाते हुए खरीददारी की गई। प्रार्थी ने तर्क दिया है कि सेंट्रल रूल्स में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि खरीददारी बाहर की कंपनियों से ही की जानी थी। प्रार्थी के अनुसार, 2009 की कोटेशन के आधार पर खरीदारी के आर्डर फैक्स के माध्यम से भेजे गए। इस बाबत निविदाएं नहीं आमंत्रित की गई। निदेशक आयुर्वेद को दवाइयों की क्वालिटी के बारे में ज्ञान नहीं है, क्योंकि वह ड्रग्ज एंड कास्मेटिक्स रूल्स के अनुसार निदेशक की शैक्षणिक योग्यता को पूरा नहीं करते हैं। प्रार्थी ने न्यायालय से गुहार लगाई है कि राज्य सरकार को निर्देश दिए जाएं कि 2010-11 में हुई दवाइयों की खरीद की जांच स्वतंत्र एजेंसी से की जाए

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