Friday, September 2, 2011

अब घरों के नजदीक न्याय

नई दिल्ली दिल्ली में नौ अलग-अलग सत्र डिविजन बनाने के लिए नौ मेट्रोपोलिटन क्षेत्र बनाए जाएंगे। इसके साथ ही दिल्ली में नौ चीफ मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट (सीएमएम) की नियुक्ति का रास्ता लगभग साफ हो जाएगा है। सीएमएम को सहायता देने के लिए नौ सहायक सीएमएम भी रखे जाएंगे। इस व्यवस्था के लागू हो जाने से महानगर के लोगों को घर के निकट न्याय मिल पाएगा। इसी आशय का एक बिल दिल्ली विधानसभा में पास किया गया। वर्तमान में दिल्ली में एक सीएमएम हैं। गुरूवार को आपराधिक प्रक्रिया संहिता दिल्ली संशोधन विधेयक 2011 विधानसभा में सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया। इस विधेयक के जरिए आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 8 में संशोधन किया जा रहा है जिससे दिल्ली में नौ अलग-अलग सत्र डिविजन बनाने के लिए नौ मेट्रोपोलिटन क्षेत्र बनाए जाएंगे। यह संशोधन केंद्र सरकार की अनुमति से लाया गया है। इसके जरिए माननीय उच्चतम न्यायालय के एक मई 2000 के निर्देशों को लागू किया जा रहा है जिनके तहत अलग सत्र डिविजन/न्यायिक जिले बनाए जाने की बात कही गई थी। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने बताया कि वर्तमान में दिल्ली एक ही मेट्रोपोलिटन क्षेत्र माना जाता है। संहिता की धारा 7 के अनुसार प्रत्येक ऐसे क्षेत्र के लिए अलग सत्र डिविजन और जिला होगा। 1973 की आपराधिक प्रक्रिया संहिता के अनुसार मेट्रोपोलिटन क्षेत्र को किसी शहर का एक इलाका माना जाता है जिसकी जनसंख्या 10 लाख से ज्यादा होती है। जब कोई शहर मेट्रोपोलिटन क्षेत्र घोषित किया जाता है तो वहां सत्र डिविजन और जिला बन जाता है। इस धारा के प्रावधान में यह उल्लेख नहीं है कि शहर की आबादी 10 लाख से ज्यादा होने पर क्या उस शहर को कई मेट्रोपोलिटन क्षेत्र में बांटा जा सकता है जिनकी आबादी 10-10 लाख से ज्यादा हो। मौजूदा प्रावधान के अनुसार कोई भी राज्य सरकार एक शहर को इस तरह अलग-अलग मेट्रोपोलिटन क्षेत्र में बांट नहीं सकती जिससे वहां अलग-अलग सत्र डिविजन बन सके और महानगर के लोगों को घर के निकट न्याय सुनिश्चित कराया जा सके। इस कानूनी दिक्कत को दूर करने और राज्य सरकार को यह शक्ति दी जा रही है कि वह किसी महानगर के उन अलग-अलग भागों को भी अलग मेट्रोपोलिटन क्षेत्र घोषित कर सकती है। इस प्रकार उस शहर में एक से अधिक सत्र न्यायालय होंगे जिनके क्षेत्र में 10-10 लाख से अधिक आबादी होगी। जनता के नजदीक अदालतें स्थापित करने के उद्देश्य से इस विधेयक को पारित किया गया है। उल्लेखनीय है कि दिल्ली में अभी तक एक ही मेट्रोपोलिटन क्षेत्र होने के कारण आबादी के अनुपात में मुकदमों का बोझ अदालतों पर बढ़ता जा रहा था। लंबित मुकदमों की फेहरिस्त बढ़ने के साथ सरकार पर न्यायिक क्षेत्र बढ़ाने का दबाव अर्से से था।

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