Wednesday, September 7, 2011

रेलबोर्डो की मनमानी से संसदीय समिति खफा

नई दिल्ली रेलवे ने गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा है और अभी भी भर्ती प्रक्रिया में तमाम खामियां बरकरार हैं। इससे न केवल विभाग को नुकसान हो रहा है बल्कि छवि भी खराब हो रही है। संसद की रेलवे संबंधी स्थायी समिति ने हाल में संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा है कि लंबे समय तक रेलवे में विभिन्न भर्ती बोर्ड अलग-अलग परीक्षाओं का संचालन करते रहे जिससे एक ही अभ्यर्थी को कई जगहों पर एक ही पद के लिए परीक्षाएं देने और चयनित होने का मौका मिलता रहा। इससे रेलवे का नुकसान हुआ, क्योंकि एक जोन में अभ्यर्थी की नियुक्ति होने से दूसरे जोन में वह पद फिर खाली हो गया और फिर से परीक्षा आयोजित करने की जरूर पड़ी। इस खामी को नई भर्ती प्रक्रिया से दुरुस्त करने की कोशिश की गई है और अब सभी जोनों में समान पद के लिए एक साथ परीक्षा आयोजित कराने का निर्णय किया है। समिति का कहना है कि रेलवे गड़बड़ी होने के बाद उसे दुरुस्त करने का प्रयास करता है। जबकि कायदे से उसे पहले से ही ऐसे प्रयास करने चाहिए ताकि खामियां पैदा ही न हों। इसके लिए एक निश्चित अंतराल पर प्रक्रिया की पेशेवर ढंग से वैज्ञानिक समीक्षा होनी चाहिए। समिति ने ग्रुप ए और ग्रुप बी के पदों पर जरूरत से ज्यादा कर्मचारियों की भर्ती पर आश्चर्य प्रकट किया है और रेलवे से जवाब मांगा है। उत्तर रेलवे में इन पदों पर 32 कर्मचारी ज्यादा थे तो पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे एवं दक्षिण-पूर्व रेलवे में इनकी संख्या क्रमश: 86 एवं 48 अधिक थी। इसी तरह मध्य रेलवे में 141, पूर्व रेलवे में 183, उत्तर-पूर्व रेलवे में 156, दक्षिण रेलवे में 159, दक्षिण रेलवे में 258 तथा पश्चिम रेलवे में 123 कर्मचारी ज्यादा पाये गये। कुल मिलाकर इन पदों पर 1240 रिक्तियां थीं। इसी तरह ग्रुप सी और डी में भी 1,66,100 रिक्तियां थीं। इसमें ग्रुप डी की 85,663 रिक्तियां शामिल हैं। समिति यह जानकर हैरान है कि आखिर इन पदों पर भर्तियां क्यों नहीं की गई हैं। इस मामले में रेलवे के जवाब से असंतुष्ट समिति ने एक निश्रि्वत समय सीमा में इन पदों को भरने तथा जल्दी-जल्दी भर्ती परीक्षाएं आयोजित करने को कहा है। समिति ने संरक्षा श्रेणी के कर्मचारियों-लोको पायलट, अस्सि्टेंट लोको पायलट, फायरमैन, गार्ड, ब्रेकमैन, मोटरमैन आदि की कमी पूरी करने के लिए सेवानिवृत्त कर्मचारियों की नियुक्ति पर भी सवाल उठाया है और कहा है कि एक बार भले कर लिया गया हो। मगर इसे स्थायी समाधान नहीं माना जाना चाहिए। समिति ने अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणी में क्रमश: 8304, 10939 तथा 5336 रिक्तियों पर हैरानी जताते हुए 31 मार्च 2012 तक इन्हें भरने की राय दी है। समिति ने भर्ती को लेकर महाप्रबंधकों के अधिकारों पर भी सवाल उठाए हैं।


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