Wednesday, September 14, 2011

जेपीसी ने तलब की जांच एजेंसियों से रिपोर्ट

2जी घोटाले की जांच कर रही सभी एजेंसियों को समय-समय पर संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को जांच की प्रगति से अवगत कराना होगा। मंगलवार को हुई जेपीसी की बैठक के बाद समिति के अध्यक्ष पीसी चाको ने कहा कि हम 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में हुई गड़बडि़यों की जांच कर रही जांच एजेंसियों से मामले में प्रगति पर सीधी जानकारी लेना चाहते हैं। इसके साथ ही जेपीसी ने राजग कार्यकाल में डब्ल्यूएलएल कंपनियों और बेसिक सेवाओं के लाइसेंस देने में हुई गड़बडि़यों पर भी सवाल उठाए हैं। चाको के मुताबिक, जांच एजेंसियों से कहा जाएगा कि वे जेपीसी के सामने निश्चित अंतराल पर जांच की प्रगति रिपोर्ट रखें। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय प्रत्यक्ष कर निदेशालय (सीबीडीटी) 2जी घोटाले के विभिन्न पहलुओं की जांच कर रहे हैं, जिसकी निगरानी सुप्रीम कोर्ट की देख-रेख में हो रही है। सीबीडीटी तो पिछले हफ्ते ही जेपीसी के सामने अपनी जांच रिपोर्ट का प्रस्तुतीकरण दे चुकी है। अब सीबीआइ से 2जी मामले में जांच रिपोर्ट की प्रगति समिति के सामने रखने को कहा जाएगा। मंगलवार को जेपीसी ने पूर्व दूरसंचार सचिव श्यामल घोष के बयान भी रिकॉर्ड किए। घोष के समय में ही डब्ल्यूएलएल (वायरलेस इन लोकल लूप) लाइसेंस के लिए चर्चित पहले आओ, पहले पाओ नीति बनी थी। कई सारे दूरसंचार ऑपरेटरों ने डब्ल्यूएलएल के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किया। उन्होंने अनुमति न होने के बावजूद रोमिंग सुविधा अपने ग्राहकों को उपलब्ध कराई। इस संबध में घोष की दलील थी कि संचार सेवा के तेजी से विस्तार और काल दरें कम करने के उद्देश्य से डब्ल्यूएलएल तकनीक को लागू किया गया था। घोष ने जेपीसी के सामने इस पूरी कार्रवाई को उस समय की जरूरत बताया। उनका तर्क था कि टेलीफोन लाइनें व्यस्त रहती थीं और काल बीच में ही कटने की भीषण समस्या आ रही थी। घोष का यह भी तर्क था कि ऑपरेटरों के सुझाव के बाद ही यह फैसला किया गया था। एक सवाल के जवाब में चाको ने माना कि इस तकनीक का सबसे ज्यादा फायदा रिलायंस और टाटा को मिला। चाको ने बताया कि 2001 में 25 बेसिक सेवाओं के लाइसेंस दिए गए, इनमें से 17 रिलायंस को और भारती व टाटा को चार-चार लाइसेंस दिए गए। हालांकि, लाइसेंस पाने के लिए 147 आवेदन आए थे। जेपीसी अध्यक्ष ने कहा कि रिलायंस और टाटा ने नियमों को ताक पर रखते हुए अप्रत्यक्ष तौर पर रोमिंग सेवा शुरू कर दी थी, जबकि इसकी उनको अनुमति ही नहीं थी। राजग के कार्यकाल में आवंटित स्पेक्ट्रम पर सवालिया निशान लगाते हुए चाको ने कहा, 2002 में मंत्रालय ने स्पेक्ट्रम बांटने में कुछ ज्यादा ही हड़बड़ी दिखाई थी। कंपनियों को अतिरिक्त स्पेक्ट्रम देने का प्रस्ताव तत्कालीन उपमहानिदेशक (मूल्यव‌िर्द्धत सेवा) ने तत्कालीन दूरसंचार सचिव घोष को दिया था। इसे संचार मंत्री प्रमोद महाजन ने मंजूरी दी थी। चाको यह जोड़ना नहीं भूले कि यह सारी प्रक्रिया 31 जनवरी, 2002 को एक ही दिन में पूरी कर ली गई थी। चाको ने कहा कि यह प्रक्रिया पारदर्शी नहीं थी, इसीलिए हम इसकी जांच कर रहे हैं

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