Tuesday, August 30, 2011

चारा घोटाले में अदालत में पेश हुए लालू यादव

पटना बिहार के चर्चित चारा घोटाले में पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और जगन्नाथ मिश्र समेत 34 आरोपी सोमवार को विशेष सीबीआइ अदालत में पेश हुए। हालांकि अदालत में आरोप तय होने थे, लेकिन आरोपियों के अनुरोध पर अदालत ने सुनवाई टाल दी। सीबीआई के विशेष न्यायाधीश बीके जैन की अदालत में पशुपालन विभाग द्वारा 1995-96 में जाली दस्तावेज से बांका और भागलपुर के कोषागारों से 47 लाख रुपए फर्जी तरीके से निकाले जाने के मामले में आरोप तय किए जाने थे। अदालत में पेश हुए लालू और मिश्र समेत आधा दर्जन आरोपियों ने न्यायाधीश के समक्ष अर्जी दाखिल की,जिसमें 18 अगस्त के फैसले को पटना उच्च न्यायालय में चुनौती देने की मोहलत मांगी गई थी। अदालत ने इस अर्जी को स्वीकार करते हुए मामले की सुनवाई 21 सितंबर तक के लिए टाल दी। उल्लेखनीय है कि सीबीआई की विशेष अदालत ने बीते 18 अगस्त को सभी आरोपियों की उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें उन्होंने आरोपों से बरी किए जाने की अपील की थी।


सरकारों के लिए मनहूस रहा है लोकपाल बिल

नई दिल्ली संसद में नौवीं बार पेश किए गया लोकपाल विधेयक अपने प्रावधानों से ज्यादा मनहूसियत के लिए ज्यादा जाना जाता है। पिछले आठ मौकों पर वह संसद के बाहर ही नहीं निकल सका, अलबत्ता सरकारें जरूर बदल गई। इस विधेयक को पेश करने वाली आधी सरकारें तो अपना कार्यकाल पूरा ही नहीं कर सकी और आधा दर्जन प्रधानमंत्री अगली बार सत्ता में नहीं लौटे। 1968 से अब तक केवल दो सरकारें ही ऐसी रहीं, जो लोकपाल को लेकर नहीं आई, उन्होंने बिना किसी झंझट के पांच साल पूरे किए। संसद में सबसे पहले एक मई 1968 को लोकसभा में तत्कालीन मंत्री वाई वी चव्हाण ने लोकपाल विधेयक पेश किया। इसे संयुक्त समिति को भेजा गया, जहां से लौटने के बाद 20 अगस्त 1969 को सदन ने इसे पारित कर दिया। इसके बाद यह राज्यसभा जाता, तभी कांग्रेस में सिंडीकेट का सवाल खड़ा हो गया और लोकसभा भंग होने के साथ यह भी चला गया। दूसरी बार इसे 2 अगस्त 1971 को तत्कालीन मंत्री रामनिवास मिर्धा ने पेश किया, लेकिन उस लोकसभा में भी यह पारित नहीं हो सका। तीसरा मौका जनता पार्टी सरकार के समय आया जबकि 23 जुलाई 1977 को तब के गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह ने इसे विधेयक को पेश किया, लेकिन जनता पार्टी की कलह में इस पर किसी का ज्यादा ध्यान ही नहीं गया। जनता पार्टी की सरकार भी गंवानी पड़ी और लोकसभा का कार्यकाल भी पूरा नहीं हुआ। 25 अगस्त 1985 राजीव गांधी के सत्ता में आने पर कानून मंत्री अशोक कुमार सेन ने चौथी बार इस विधेयक को पेश किया। विधेयक को इस बार भी पारित नहीं हुआ। अगले आम चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। पांचवी बार 21 दिसंबर 1989 को वीपी सिंह सरकार के मंत्री दिनेश गोस्वामी ने इस विधेयक को पेश किया, लेकिन पहले सरकार गई और उसके बाद लोकसभा भी समय पूर्व भंग हो गई। छठा प्रयास 10 दिसंबर 1996 को हुआ। देवगौड़ा सरकार के मंत्री एसआर बालासुब्रमण्यम ने विधेयक को पेश किया, लेकिन फिर से वही इतिहास दोहराया गया। सातवीं बार वाजपेयी सरकार ने 23 जुलाई 1998 को के आर जनार्दनन ने इस विधेयक को पेश किया, लेकिन कुछ महीने बाद उनकी भी सरकार गिर गई और एक बार फिर समय पूर्व लोकसभा भंग हो गई। अगली बार सत्ता में आने पर 9 जुलाई 2001 को तत्कालीन मंत्री वसुंधरा राजे ने एक बार फिर विधेयक को पेश किया, लेकिन विधेयक उससे आगे नहीं बढ़ सका और अगले आम चुनाव में वाजपेयी सरकार भी चुनाव हार गई। अब यह नौवां मौका है जब इस विधेयक को लोकसभा में पेश किया गया है।


जजों के खिलाफ जांच करने वाली समिति में सांसद भी हों

: उच्च न्यायपालिका को जवाबदेह बनाने के मकसद से प्रस्तावित विधेयक का अध्ययन करने वाली संसदीय समिति ने वरिष्ठ न्यायाधीशों के खिलाफ आरोपों में जांच के लिए बनाई जाने वाली समिति में संसद के दो सदस्यों को शामिल करने की सिफारिश की है। समिति की यह रिपोर्ट मंगलवार को संसद में पेश किए जाने की उम्मीद है। कानून और न्याय मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने न्यायिक मानक तथा जवाबदेही विधेयक, 2010 पर सिफारिशों को अंतिम रूप दे दिया है। समिति ने वरिष्ठ जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए प्रस्तावित राष्ट्रीय न्यायिक निगरानी समिति में दो गैर न्यायिक सदस्यों को शामिल करने का सुझाव दिया है। समझा जाता है कि समिति ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की है कि राष्ट्रीय न्यायिक निगरानी समिति में लोकसभा और राज्यसभा से एक-एक सदस्य को शामिल किया जाए। विधेयक के तहत भारत के किसी पूर्व प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय निगरानी समिति मेंच्उच्चतम न्यायालय के एक न्यायाधीश, किसीच्उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति तथा भारत के अटार्नी जनरल भी शामिल होंगे। गौरतलब है कि कलकत्तच् उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सौमित्र सेन के खिलाफ राज्यसभा में महाभियोग की कार्यवाही के दौरान अनेक सदस्यों ने न्यायपालिका की जवाबदेही की भी बात उठाई थी। समिति ने न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों का अध्ययन करने और उन्हें गुण-दोष के आधार पर निगरानी समिति को बढ़ाने के लिए गठित होने वाली छानबीन समितियों में गैर न्यायिक सदस्यों को शामिल करने की जरूरत बताई हच्। उच्चतम न्यायालय और सभी च्1 उच्च न्यायालयों में छानबीन समिति होगी जो तीन महीने के भीतर रिपोर्ट निगरानी समिति को सौंपेंगी। समिति ने न्यायाधीशों के खिलाफ अपुष्ट शिकायतें करने के दोषी लोगों की सजा और उन पर जुर्माना भी कम करने की सिफारिश की है।


संसद की दर्शक दीर्घा में प्रवेश हुआ मुश्किल

अन्ना की हुंकार ने सरकार को परेशान किया तो अन्ना समर्थक ने संसद परिसर में प्रवेश कर संसदीय सचिवालय को सतर्क कर दिया है। दो दिन पहले संसद परिसर में अन्ना समर्थक की नारेबाजी से चौकस हुए सचिवालय ने सभी सदस्यों से आगंतुकों के लिए पास की सिफारिश करते समय जरूरी एहतियात बरतने का आग्रह किया है। दो दिन पहले कांग्रेस के एक सदस्य अनंतरामी रेड्डी की अनुशंसा पर दर्शक दीर्घा में प्रवेश पाए हरियाणा के युवक मनजीत सिंह ग्रेवाल ने बाहर संसद परिसर में अन्ना के समर्थन में नारेबाजी कर सुरक्षा कर्मियों के बीच हड़कंप मचा दिया था। मनजीत सांसद के सचिव के मित्रों में शामिल था। सोमवार को इसकी प्रतिक्रिया दिखी। लोकसभा सचिवालय की ओर से जारी एक पत्र में सांसदों से आग्रह को याद दिलाया गया कि दर्शकों की जिम्मेदारी संबंधित सांसदों पर होती है। लिखित रूप में उन्हें यह जिम्मेदारी उठानी होती है। लिहाजा यह अनुमोदन अपने संबंधियों या खास मित्रों तक सीमित रखें। उन्हें यह भी बताया गया है कि नए निर्णय के अनुसार चालू सत्र के दौरान उसी दिन के लिए प्रवेश पत्र केवल पति, पत्नी, बच्चों व निकट संबंधियों तक सीमित रखा जाएगा। इसका भी ख्याल रखने का आग्रह किया गया है कि एक दिन में दो से अधिक प्रवेश पत्र जारी न किए जाएं। गौरतलब है कि अब तक आवेदन पत्र में चार से पांच लोगों के लिए अनुशंसा करने का प्रावधान है।


मनरेगा में लूट पर समिति ने सरकार को लताड़ा

, नई दिल्ली महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर संसद की स्थायी समिति ने सरकार को आड़े हाथों लिया है। योजना में मजदूरों को भुगतान की प्रणाली में भारी गड़बड़ी को बानगी भर बताते हुए स्थायी समिति ने आशंका जताई है कि हालात कहीं ज्यादा नाजुक हैं। समिति ने ग्रामीण विकास और डाक विभाग के आंकड़ों में भारी अंतर पर सवाल खड़ा किया है। स्थायी समिति ने मनरेगा के भ्रष्टाचार का खुलासा करते हुए कहा कि मजदूरी के भुगतान में मिली गड़बडि़यों को हल्के में नहीं लिया जा सकता है। यह बहुत विकराल है। डाकघरों के मार्फत मनरेगा के मजदूरों को दी जाने वाली मजदूरी में जो भ्रष्टाचार पकड़ में आया है, समिति उससे भौंचक है। यह कहानी का बहुत छोटा हिस्सा है। असल मसला अत्यंत गंभीर है। समिति के मुताबिक बिचौलियों की भूमिका, फिरौती मांगने और निर्धारित मजदूरी से कम भुगतान की घटनाएं सामने आई हैं। स्थायी समिति ने भ्रष्टाचार के दर्ज मामले, मनरेगा के मजदूरों के खातों की संख्या, डाक विभाग और ग्रामीण विकास विभाग से बांटी गई मजदूरी के आंकड़ों में भारी अंतर पाया है। इनमें दूर-दूर तक तालमेल नहीं है। ग्रामीण विकास विभाग के रिकॉर्ड में मजदूरी वितरण में भ्रष्टाचार के कुल 244 मामले दर्ज किए गए है। जबकि डाक विभाग के रिकार्ड में धोखाधड़ी के मामले केवल सात दर्ज हैं। राव इंद्रजीत सिंह की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने आकड़ों की इस गड़बड़ी को गंभीरता से लेते हुए सख्त नाराजगी जताई है। समिति की रिपोर्ट में 2008-09 के दौरान के खातों की संख्या में 10 लाख का हेरफेर और 290 करोड़ रुपये की गड़बड़ी का जिक्र किया है। समिति ने मनरेगा के मामले में दोनों विभाग की कार्य प्रणाली पर सवालिया निशान लगाया है।


रीकॉल को कांग्रेस ने बताया अव्यावहारिक

कांग्रेस ने सोमवार को कहा कि अन्ना की मांग के मुताबिक, निर्वाचित प्रतिनिधियों को वापस बुलाने और खारिज करने का अधिकार व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि देश के 50 फीसदी लोग मतदान नहीं करते, वहीं भाजपा ने कहा कि इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी ने संसद के बाहर संवाददाताओं से कहा कि वापस बुलाने का अधिकार भारत में व्यावहारिक नहीं है। देश में 50 फीसदी लोग मतदान के लिए नहीं जाते। जो प्रत्याशी चुनाव जीतते हैं, वे 13-14 करोड़ मतदाताओं में से केवल तीन करोड़ मत पाकर जीत जाते हैं। इसलिए मुझे नहीं लगता कि यह देश में संभव है। प्रत्याशियों को खारिज करने के अधिकार की मांग पर उन्होंने कहा कि यह भी उसी स्थिति में लागू किया जा सकता है, जब ज्यादा से ज्यादा मतदाता मतदान के लिए आगे आएं। सबसे पहले हमें यह सुनिश्चित करने की कोशिश करनी होगी कि 80 से 90 फीसदी मतदाता मतदान के लिए जाएं, अन्यथा खारिज करने का अधिकार भी व्यावहारिक नहीं है। चुनाव सुधारों का समर्थन करते हुए भाजपा नेता राजनाथ सिंह ने कहा कि जहां तक व्यवस्था में सुधार का प्रश्न है, हम उसके पक्ष में हैं। चुनाव तंत्र, प्रशासनिक तंत्र और आर्थिक तंत्र में बदलाव आना चाहिए। जेपी आंदोलन को याद करते हुए सिंह ने कहा, जब जेपी ने देश में संपूर्ण क्रांति की बात कही थी, तब उस समय वापस बुलाने के अधिकार और खारिज करने के अधिकार का मुद्दा भी उठा था। इस मुद्दे को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।


शीला से इस्तीफे की मांग पर हंगामा

नई दिल्ली दिल्ली विधानसभा का मानसून सत्र पहले ही दिन हंगामे की भेंट चढ़ गया। राष्ट्रमंडल खेलों की योजनाओं में घपले को आधार बनाकर भाजपा सदस्यों ने जबरदस्त हंगामा किया तथा मुख्यमंत्री से इस्तीफा की मांग की। विधानसभा अध्यक्ष के बार-बार कहने पर भी जब भाजपा सदस्य नहीं माने तो उन्होंने दिन भर के लिए विधानसभा स्थगित कर दी। दिल्ली विधानसभा के मानसून सत्र का सोमवार को पहला दिन था। दोपहर दो बजे विधानसभा सत्र शुरू हुआ। विधानसभा अध्यक्ष डा. योगानंद शास्त्री ने अन्ना हजारे द्वारा अनशन समाप्त करने पर प्रस्ताव पढ़ा। उन्होंने कहा कि यह सदन सभी तरह के भ्रष्टाचार के खिलाफ है। साथ ही भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष का संकल्प लेता है। इसके बाद सदन ने महानगर परिषद के सदस्य बृजमोहन तूफान व सतीश सक्सेना की मृत्यु पर शोक शोक संवेदना व्यक्त की। प्रश्नकाल शुरू होता इससे पहले ही नेता प्रतिपक्ष वी के मल्होत्रा ने शुंगलू कमेटी और सीएजी रिपोर्ट के आधार पर मुख्यमंत्री पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए प्रस्ताव लाने की मांग की। अध्यक्ष ने अनुमति नहीं दी। भाजपा सदस्य डा. हर्षवर्धन, कर्ण सिंह तंवर, रमेश विधूड़ी, नरेश गौड़ आदि अपनी सीटों से खड़े हो गए और शुंगलू कमेटी व सीएजी रिपोर्ट वाले पर्चे लहरा कर हंगामा करने लगे। 2 बजकर 20 मिनट तक यह सब चलता रहा। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने खड़े होकर कुछ बोलना शुरू किया। मगर शोर-शराबे में कुछ सुनाई नहीं दिया। विधानसभा अध्यक्ष ने 15 मिनट के लिए कार्यवाही स्थगित कर दी। ऊर्जा मंत्री हारून यूसुफ मुख्यमंत्री के पास गए। दोबारा कार्यवाही 2 बजकर 35 मिनट पर जब शुरू हुई तो भाजपा सदस्यों ने फिर से हंगामा शुरू कर दिया। भाजपा सदस्य मुख्यमंत्री के खिलाफ नारे लगाने लगे और विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी के सामने आ गए। यह सब चल रहा था तो मुख्यमंत्री शीला दीक्षित अपनी सीट पर बैठी शांत भाव से उनकी ओर देख रही थीं। इस दौरान विधानसभा अध्यक्ष ने फिर से भाजपा सदस्यों से सदन चलने देने के लिए कहा। मगर उन्होंने नहीं सुना तो उन्होंने आधा घंटे के लिए कार्यवाही स्थगित कर दी। आधे घंटे बाद कार्यवाही फिर शुरू हुई तो फिर से भाजपा सदस्यों ने हंगामा किया। इस पर विधानसभा अध्यक्ष ने कार्यवाही दिन भर के लिए स्थगित कर दी।


आत्मदाह करने वाले अन्ना समर्थक की मौत

, नई दिल्ली राजघाट के सामने खुद को आग के हवाले करने वाले अन्ना समर्थक दिनेश यादव ने सोमवार को यहां लोक नायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल में दम तोड़ दिया। दिनेश पटना के दुल्हिन बाजार का रहने वाला था। माना जा रहा है कि अनशन के दौरान अन्ना हजारे के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैये से क्षुब्ध होकर उसने आत्मदाह जैसा कदम उठाया। दिनेश बीते 22 अगस्त को बिहार की राजधानी पटना से दिल्ली के रामलीला मैदान पहुंचा था। 23 अगस्त को मंच पर अन्ना की हालत और जन लोकपाल बिल पर सरकार के रवैये से क्षुब्ध होकर उसने राजघाट पर खुद को आग लगा ली थी। सोमवार को शव परिजनों को सौंप दिया गया। उसका दाह संस्कार पैतृक गांव में किया जाएगा। दिनेश की मौत की सूचना पर सिविल सोसाइटी के सदस्य अरविंद गौड़ समेत कई लोग परिजनों को सांत्वना देने के लिए अस्पताल पहुंचे। सिविल सोसाइटी की तरफ से परिजनों को आर्थिक मदद भी दी गई है। दिनेश (32) मूलरूप से बिहार के पटना जिला स्थित दुल्हिन बाजार का रहने वाला था। बताया जाता है कि 23 अगस्त को रामलीला मैदान में कुछ घंटे बीताने के बाद वह बोतल में पेट्रोल लेकर शाम सवा चार बजे राजघाट जा पहुंचा। वहां गेट के बाहर अपने ऊपर पेट्रोल उड़ेलकर लाग ली। पुलिस ने उसे लोक नायक अस्पताल में भर्ती कराया। 85 फीसदी झुलसा दिनेश रविवार तक जीवन व मौत से जूझता रहा। अत्यंत गंभीर हालत में होने के बावजूद दिनेश अस्पताल में अन्ना हजारे जिंदाबाद व भारत माता की जय के नारे लगाता रहा।


उप्र के लोकायुक्त ने मांगे मप्र-कर्नाटक जैसे अधिकार

लखनऊ उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त न्यायमूर्ति एनके मेहरोत्रा का कहना है कि भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश के लिए देश के सभी राज्यों में मध्य प्रदेश और कर्नाटक जैसा कानून होना चाहिए। उनका कहना है कि यूपी में मजबूत लोकायुक्त कानून नहीं है। लोकायुक्त की जांच के दायरे में न तो मुख्यमंत्री हैं और न ही ग्राम प्रधान। ऐसे में वह चाहकर भी भ्रष्टाचार की तमाम शिकायतों का निपटारा नहीं कर पा रहे हैं। लोकायुक्त न्यायमूर्ति एनके मेहरोत्रा का कहना है कि शासन-सत्ता के शीर्षस्थ पद से लेकर ग्राम प्रधान तक भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जा रहे हैं लेकिन राज्य में लोकायुक्त की जांच के दायरे में न मुख्यमंत्री है न ही ग्राम प्रधान। तकनीकी विद्यालय, विश्वविद्यालय, प्राविधिक शिक्षा विश्वविद्यालय, चिकित्सा विश्वविद्यालय, अनुदानित शिक्षण संस्थाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार के मामलों में भी लोकायुक्त कुछ नहीं कर सकते हैं क्योंकि ये भी उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं हैं। सूबे में जब तक कर्नाटक व मध्यप्रदेश में लागू मजबूत कानून की व्यवस्था नहीं होगी तब तक ऐसी संस्थाएं भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश लगाए जाने में सक्षम नहीं हो सकती हैं। उन्होंने कहा, उत्तर प्रदेश में लोकायुक्त भ्रष्टाचार के बड़े से बड़े मामले में खुद पहल नहीं कर सकते हैं जबकि उक्त राज्यों में स्वत: संज्ञान लेने का अधिकार है। यहां दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए वह सिर्फ राज्य सरकार (मुख्यमंत्री या मुख्य सचिव) से सिफारिश कर सकते हैं।


विशेषाधिकार हनन में घिरे ओमपुरी-किरण

नई दिल्ली अन्ना का अनशन भले खत्म हो गया हो, पर रामलीला मैदान में उनके मंच से सांसदों के खिलाफ टिप्पणी का मसला तूल पकड़ रहा है। मंच से फिल्म अभिनेता ओमपुरी द्वारा सांसदों को अनपढ़ व गंवार बताने का मामला सोमवार को संसद में भी गूंजा। उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए लोकसभा एवं राज्यसभा में विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया गया है। पुरी के साथ ही नेताओं के खिलाफ टिप्पणी के लिए किरण बेदी के विरुद्ध भी नोटिस दिया गया है जो लोस एवं रास के सभापति के पास विचाराधीन है। इस बीच अभिनेता ने अपनी टिप्पणी के लिए माफी मांगते हुए कहा है कि यदि उन्हें संसद में तलब किया जाता है तो वह वहां पेश होंगे। पुरी ने कहा, मैं बहुत भावुक हो गया था और मुझे ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करने पर खेद है। मुझे बेहतर शब्दों का इस्तेमाल करना चाहिए था। वहीं फिल्म अभिनेता अनुपम खेर ने कहा कि मैं ओमपुरी के साथ हूं, जिन्होंने उस बात को सार्वजनिक तौर पर कहा जो हर दिन लाखों बार और लाखों घरों में कहीं जाती है। किरण बेदी ने विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पर यह कहते हुए टिप्पणी करने से इंकार कर दिया कि उन्हें नोटिस नहीं मिला है। उन्होंने कहा कि मुझे जब नोटिस मिलेगा मैं उसका जवाब दूंगी। राज्यसभा में सोमवार को प्रश्नकाल खत्म होते ही सपा के प्रो. रामगोपाल यादव ने कहा कि अन्ना के मंच से 26 अगस्त को ओमपुरी की तरफ से संसद सदस्यों को अनपढ़, गंवार और नालायक कहा गया है। समाचार चैनल पर उसका सीधा प्रसारण हुआ। यह इस सदन की अवमानना है। लिहाजा कार्रवाई के लिए यह प्रकरण विशेषाधिकार समिति को सौंप दिया जाना चाहिए। सपा सदस्य ने जोड़ा कि जहां तक सदस्यों के अनपढ़ होने का सवाल है, 80 प्रतिशत सांसद ग्रेजुएट हैं। उन्होंने सवाल किया कि अनशन पर बैठने वाले अन्ना खुद कितने पढ़े-लिखे है? अपने प्रबंध तंत्र के लिए जाना जाने वाला अकबर महान ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं था। बिल गेट्स ने बीच में पढ़ाई छोड़ दी थी। इसी कड़ी में उन्होंने उद्योगपति स्वर्गीय धीरुभाई अंबानी का भी नाम लिया। निर्दलीय मुहम्मद अदीब ने कहा कि अन्ना आंदोलन से जुड़ी किरण बेदी ने तीन दिनों पहले सांसदों को भला-बुरा कहा। अन्ना के सहयोगी प्रशांत भूषण ने इस सदन के एक सदस्य के साथ रविवार को एक न्यूज चैनल पर कहा कि संसद में घूस लेकर विधेयक पास किए जाते हैं। बेदी व भूषण के खिलाफ विशेषाधिकार का मामला दर्ज कर कार्रवाई की जानी चाहिए। जदयू के शिवानंद तिवारी ने कहा कि प्रशांत ने जिसे नेता मानकर आंदोलन किया, वह एक ट्रक ड्राइवर था। सदन के दूसरे सदस्यों ने भी इन सदस्यों से सहमति जतायी। उप सभापति रहमान खान ने कहा कि यह मामला अब सभापति के विचाराधीन है। जल्द ही निर्णय लिया जाएगा। लोस अध्यक्ष मीरा कुमार ने शून्यकाल में बताया कि सांसद रामशंकर राजभर, प्रवीण सिंह ऐरन, जगदंबिका पाल, डॉ. विनय पांडेय, पीएल पुनिया, मिर्जा महबूब बेग, हर्षवर्धन, कमल किशोर, प्रेमदास कठेरिया और शैलेंद्र कुमार ने ओमपुरी के खिलाफ एक नोटिस दिया है।

राहुल का सुझाव नहीं बनेगा देरी का सबब

: लोकपाल को चुनाव आयोग की तरह संवैधानिक संस्था बनाने के राहुल के प्रस्ताव के पीछे देरी की साजिश के आरोपों को कांग्रेस ने सिरे से खारिज किया है। कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि पार्टी राहुल के प्रस्ताव का समर्थन करती है और इसमें जरा भी देरी नहीं लगेगी। वहीं, लोकपाल विधेयक का परीक्षण कर रही कानून मामलों की संसदीय समिति के अध्यक्ष और कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि राहुल गांधी का सुझाव अंतिम लक्ष्य है और इस वजह से कानून बनाने में देर नहीं होगी।

क्षतिपूर्ति में जुटी कांग्रेस

नई दिल्ली अन्ना के अनशन से भ्रष्टाचार के मोर्चे पर चौतरफा फजीहत झेलने के बाद अब कांग्रेस नुकसान की भरपाई में जुट गई है। इसके तहत पार्टी अब सरकार पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय संगठन के विवेक पर ज्यादा भरोसा करेगी। टीम अन्ना सरकार के खिलाफ जनांदोलन की जमीन दोबारा तैयार न कर सके, इसके लिए पार्टी नेतृत्व पूरी तरह से कमान अपने हाथ में रखेगा। महासचिव राहुल गांधी अब इस पूरे प्रकरण पर मुख्य भूमिका में आ ही चुके हैं। अमेरिका से इलाज करा कर लौटते ही पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाकर इस पूरे घटनाक्रम की समीक्षा और आगे की दशा-दिशा तय करेंगी। कांग्रेस के शीर्ष सूत्रों ने दैनिक जागरण से कहा, प्रशासनिक फैसले तेजी से तो लिए जाएंगे, पर राजनीतिक बुद्धि को किनारे रख कर नहीं। यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि सरकार के किसी मंत्री या कांग्रेसी नेता के बयान या क्रियाकलाप से जनता के बीच सरकार के दंभी होने के संदेश न जाए। इसीलिए, कपिल सिब्बल और पी. चिदंबरम जैसे विशुद्ध प्रशासनिक दृष्टिकोणवादी नेताओं को टीम अन्ना से बातचीत करने और सार्वजनिक बयान देने से रोक दिया गया है। बरेली से कांग्रेस सांसद प्रवीण ऐरन ने तो राहुल गांधी को पत्र लिखकर इस मामले को बिगाड़ने में साजिश तक की शिकायत कर दी। पत्र में ऐरन ने सवाल उठाया है कि कहीं यह सब राहुल को प्रधानमंत्री बनने से रोकने या फिर ईमानदार प्रधानमंत्री को नुकसान पहुंचाने के लिए जानबूझकर तो नहीं किया गया। उनका इशारा सिब्बल और चिदंबरम की तरफ माना जा रहा है। हालांकि ऐरन के साजिश के आरोप से तो पार्टी नेतृत्व सहमत नहीं है, लेकिन वह मान रहा है कि मामले से निपटने में चूक दर चूक हुई, जिससे सरकार को बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। सरकार की असली चिंता अब अन्ना के उस बयान को लेकर भी है जिसमें उन्होंने लोकपाल पर संसद में चर्चा को अधूरी जीत बताया है। जिस तरह से टीम अन्ना के राजनीतिक सुधार का एजेंडा बढ़ रहा है, उससे कांग्रेस अब खासी सतर्क है। इसीलिए, राहुल गांधी ने युवा मंत्रियों के साथ-साथ युवा सांसदों के साथ बैठक कर उन्हें इस मसले पर मुखरता के साथ जनता के बीच जाने को कहा है। कांग्रेस के युवा नेताओं को प्रणब मुखर्जी टिप्स भी दे रहे हैं। इतना ही नहीं, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी अमेरिका से इलाज कर इसी हफ्ते लौट रही हैं। सितंबर में वह कांग्रेस की सबसे ताकतवर इकाई कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक करेंगी। भ्रष्टाचार के खिलाफ राहुल गांधी के बयान के मुताबिक, सरकार हरकत में दिखेगी। शीतकालीन सत्र से पहले अभिषेक मनु सिंघवी की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति लोकपाल कानून का नया मसौदा संसद भेज दिया जाएगा। पूरी कोशिश होगी कि टीम अन्ना को वार्ता में लगाए रखा जाए और उन्हें आंदोलन की जमीन तैयार करने का कोई मौका न मिले।


सांसदों से मतभेद हैं मनभेद नहीं

रामलीला मैदान में आम जनता के बीच रहे अन्ना गुड़गांव के निजी अस्पताल मेदांता में स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं और वहा पहुंचना जंग जीतने से कम नहीं। किसी तरह अस्पताल की 13वीं मंजिल पर उनके कमरे तक पहुंचना होता है। वह हर शख्स का स्वागत चिरपरिचित मुस्कान से करते हैं। उनके बेड के पास रखा मेडिकल चार्ट बताता है कि उनके रक्त का दबाव सामान्य है, लेकिन जोश से उबलते अन्ना कहते हैं, मुझे तो कुछ नहीं हुआ, फिर भी डॉक्टर लोगों ने मुझे बिस्तर पर डाल दिया है। अन्ना भले ही पूरी दुनिया के हीरो बन गए हों, मगर उनके हीरो आज भी महात्मा गांधी ही हैं। अन्ना ने सोमवार सुबह पांच बजे उठते ही अस्पताल प्रशासन से महात्मा गांधी की तस्वीर लाने का आग्रह किया। अन्ना की खिदमत में जुटे स्टाफ ने गांधी की फोटो मुहैया कराने में देर नहीं लगाई। बापू की तस्वीर के सामने बैठकर उन्होंने करीब एक घंटे तक ध्यान लगाया। अस्पताल कर्मियों के अनुसार, अन्ना ने उनसे बातचीत के दौरान कहा कि संसद में बैठे लोगों से उनका कोई मनभेद नहीं हैं, कुछ बातों को लेकर मतभेद जरूर है। हम सब एक देश के वासी हैं और मतभेद अपनों से होता है। अपनों से ही कोई अपनी बात कह सकता है और वही हम कर रहे हैं। लगातार हजारों से घिरे रहने के बाद अन्ना अस्पताल के कमरे में अपना समय कैसे बिता रहे हैं, इसका जवाब दे रहे हैं उनके बिस्तर पर पसरे कागज। थोड़ी-थोड़ी देर में करवट लेकर वह यकायक कुछ लिखने लग जाते हैं। अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया जैसे करीबी लोग भी कमरे के दूसरे हिस्से में बैठे हैं। अन्ना के सहयोगी विभव बताते हैं कि अभी अस्पताल में दूसरा दिन है, लेकिन अन्ना को सिर्फ जूस, नारियल पानी और शहद ही दिया जा रहा है। शायद कल कुछ ठोस आहार ले सकें। डा. नरेश त्रेहान ने बताया कि अभी उनके स्वास्थ्य में केवल 30 प्रतिशत ही सुधार हुआ है। उन्होंने अभी भोजन लेना भी शुरू नहीं किया है। केवल आराम करना पसंद कर रहे हैं। अस्पताल के बाहर अन्ना समर्थकों की भीड़ जुटने का सिलसिला कायम है। लोग इस चाह में आ रहे हैं कि शायद अन्ना के दर्शन हो जाएं। पुणे का एक परिवार भी अन्ना से मिलने के लिए यहां आया है। सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना की मदद पाने। अन्ना का अनशन तुड़वाने में सरकार की तरफ से अहम भूमिका निभाने वाले केंद्रीय मंत्री विलास राव देशमुख ने अस्पताल जाकर अन्ना के स्वास्थ्य की जानकारी ली और उनके जल्दी स्वस्थ होने की कामना भी की। रामलीला मैदान की तरह अस्पताल के सामने भी टोपी व झंडे की बिक्री शुरू हो गई है।


अधूरे सर्वे के एवज में अग्निवेश ने पाए 18 लाख

, नई दिल्ली सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश के विवादित वीडियो का सच जो भी हो, पर कांग्रेस और उसकी अगुआई वाली सरकार को लेकर उनकी फिक्रमंदी यूं ही नहीं है। कांग्रेस ने उन्हें सरकारी खजाने से उपकृत जो कर रखा है। दिल्ली सरकार ने बंधुआ मजदूरों के सर्वे के लिए नियम-शर्तो को दरकिनार कर अग्निवेश के बंधुआ मुक्ति मोर्चा को 18 लाख रुपये जारी कर दिए। जैसे आनन-फानन में रुपये जारी हुए, एनजीओ ने वैसी ही बिना मतलब की 60 पेज की रिपोर्ट भी जारी कर दी। सर्वे में गेहूं, चावल जैसे किराने के साथ-साथ आफिस के टेलीफोन का बिल तक शामिल है। बंधुआ मजदूर कहां थे, कौन नियोजक था, इसका कोई ब्यौरा नहीं है। हां खर्च का पूरा हिसाब 160 पन्नों में दर्ज है। दिल्ली सरकार की इस अंधेरगर्दी भरी दरियादिली के पांच वर्ष बाद अब महालेखा परीक्षक इस साठगांठ की जांच करने की तैयारी में है। बात है 2006 की। उस समय दिल्ली सरकार ने यकायक सभी नौ जिलों में बंधुआ मजदूरों के सर्वे के लिए अग्निवेश के जंतर-मंतर स्थित संगठन को 18 लाख की एकमुश्त राशि दे दी। इसके लिए न तो कोई समझौता पत्र तैयार हुआ न ही नियम व शर्ते तय की गईं। आरटीआइ के तहत मांगी गई जानकारी में डिवीजनल मजिस्ट्रेट ने स्पष्ट किया है कि संस्था से सर्वे कराने का फैसला किसी आवेदन के आधार पर नहीं,बल्कि सरकार के स्तर पर हुआ था। शायद यही कारण था कि पूरी राशि एकमुश्त अग्रिम मिल गई। संगठन ने 2007 में 60 पेज की रिपोर्ट तो दी लेकिन ऐसी जिसे पहली नजर में ही खारिज किया जा सकता है। दरअसल, दिल्ली में 90 फीसदी बंधुआ मजदूर बताने वाली इस रिपोर्ट के खर्च का लेखा-जोखा लगभग 160 पन्नों में है। इसमें न सिर्फ जंतर मंतर स्थित संगठन के टेलीफोन बिल का 38 हजार का भुगतान बताया गया है, बल्कि मजदूरों के भोजन के नाम पर गेहूं, चावल, आलू, सब्जी, टेंट आदि के भी हजारों रुपये जोड़े गए हैं। हवाई चप्पल तक की रसीद चस्पां है। अधिकतर खर्च मुक्ति मोर्चा के अपने वाउचर पर किए गए, जिसमें लाभार्थियों के नाम अधिकतर अस्पष्ट हैं। पांच हजार से ज्यादा के भुगतान पर भी कहीं रसीदी टिकट नहीं है। सर्वे रिपोर्ट में एक भी नियोजक का नाम-पता नहीं है। लिहाजा किसी के खिलाफ कार्रवाई का सवाल ही नहीं उठता। सर्वे के लिए दिशा निर्देश तय करने वालों में प्रमुख रहे पूर्व श्रम सचिव लक्ष्मीधर मिश्रा का कहना है कि ऐसी रिपोर्ट को कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता है, मगर दिल्ली सरकार इस मामले पर कुंडली मारे बैठी है। वहीं स्वामी अग्निवेश ने काफी कोशिशों के बाद भी स्पष्ट जवाब नहीं दिया। उलटे आरोप मढ़ा कि मुझे कुछ लोग बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं।


Rallying behind Anna

Nobody in this village had seen a face painted with the tricolour, except while watching cricket on television. Until ten days ago, that is.

But then there have been many firsts for Ralegan Siddhi in the past few days. Anna Hazare’s village in Maharashtra’s Ahmednagar district, where its 6,000 residents live tucked in an arid rainshadow, welcomed a record 1,20,000 visitors over 10 days, say those at the helm of what will be the home stop for the nationwide Anna Hazare juggernaut. Through these 10 days, Ralegan Siddhi has been closed for business, but open for anti-corruption crusades of any colour.

Its 30-odd commercial units, including grain merchants, flour mills, clothing store, a computer coaching centre, a few tailors, cobblers and cooperative institutions have kept shutters down except for emergencies. Two primary schools and a high school have stayed empty barring a few teachers using the unexpected break for a spring cleaning of the premises. The closest store selling a pack of biscuits is 10 km away, though there’s freshly brewed tea for everyone courtesy a Jain charitable organisation.

Simultaneously, tens of thousands have visited Ralegan Siddhi. Motorcycle rallyists and bhajan groups, snake charmers and cartoonists, former army-men and students, protesters and gawkers. In the village’s main square, the stage is occupied by those on a relay fast. Rows of red plastic chairs in a small pandal stay occupied through the day, more people squatting on the mud, the women in their brightly coloured sarees neatly on one side, the men on the other.

Subhash Pathare, 40, a teacher in a school run by one of Hazare’s charitable organisations, is one of those manning the microphone all day. He keeps up a steady commentary on the latest ‘dindi’ or group going through the village, introducing the sarpanch of a neighbouring village or leader of a visiting lawyers’ collective from Shirur taluka, inviting the secretary of a welfare organisation for retired army personnel to speak, exhorting the crowd that ebbs and swells through the day to shout the slogans more lustily.

“Anna stopped at the school on his last visit to Ralegan,” says Pathare, among the more prominent organisers and leaders of the events in the village. “He told the children that he’d be going away to New Delhi, but explained what the Jan Lokpal Bill is. The children have now themselves decided not to attend school in order to support our movement,” he claims.

Along with the estimated lakh-plus people, several thousand national flags of all sizes and even more ‘I Am Anna’ topis have made their way in and out of Ralegan Siddhi these past few days. You can start up a “Vande” anywhere here and get an enthusiastic “Mataram” in response, loud and clear. With its 7 a.m. ‘Prabhat Pheris’ and street corner discussions on freedom from corruption, the untiring announcements and exhortations on the public announcement system, perhaps it is Ralegan Siddhi that is really living Hazare’s dream for a “second freedom struggle”, caught up in a wave of patriotic appeals and fervent musicals.

Protest and performance blend in a messy marriage that is neither always rational nor ever meditative. But despite those odds, Ralegan Siddhikars are better informed than most about the Jan Lokpal Bill, about its key points of contest with the government draft. “They stay updated on the latest news from Delhi, the television news is on throughout the day,” says sarpanch Jaisingh Mapari, who was himself on fast until Thursday. Even during the complete shutdown of the village until Saturday morning, one enterprising group hired a projector and a screen so that nobody would miss a word.

Just past the main road leading towards Pimpalner village is the home of Maruti Hazare, Anna’s younger brother. In his porch that’s hemmed in by rose and hibiscus bushes, the PA system from the village square is a distant drone punctuated periodically by shouts of Vande Mataram and Bharat Mata ki Jai from flag-waving motorcyclists and the occasional kirtan group.

“My son has taken leave from work to be here, the family can talk of nothing else but the movement. In fact, that is the case with the entire village,” says Hazare, before launching into a tirade against the government that “wants to kill Anna”.

Sarpanch Mapari admits that normal daily life has been suspended almost entirely. From welcoming the thousands visiting the little village everyday to organising mundane logistics such as chairs, speakers, firecrackers for whenever the Bill is passed, an ambulance from Parner taluka town for emergencies, there is much work to be done. “Our success has been in awakening people. Even if everybody has not understood exactly what the Jan Lokpal Bill is, they are now united against corruption in a voice that’s louder and more unified than ever before,” says Mapari.

His biggest challenge was not keeping people’s spirits up after every disappointing round of talks in Delhi. “Just dealing with these crowds, so many visitors in a village without any hotel, that has been a task,” he smiles. Camping OB vans and television crews have been put up in rooms in a students’ hostel, while other visitors are simply availing the hospitality of Ralegan Siddhikars.

Mohan Gethe, 74, is a retired government officer of the Agriculture Department who also served as a trainer in the Hazare-run watershed development training institution that continues to see thousands of training sessions for those working with rural communities across the country. (In fact, currently, government employees from Tamil Nadu and Sikkim are in Ralegan Siddhi undergoing training on how to develop sustainable irrigation systems and watersheds in their states.) “I worked very closely with Anna here for six years until 2008,” says Gethe, a resident of Sangamner who’s travelled 100 km to “be a part of a historical movement” and has been camping in the village for the last three days.

Not all visitors have such roots here. The Hazare family is no closer to the New Delhi negotiations than any other protesters in the village, but they’ve received a steady stream of visitors everyday since the fast began, mostly relatives including Anna’s maternal cousin Ganpat Rokle from a village 80 km away, but there are also some strangers asking if anybody knows how to contact Hazare in Delhi.

The same querries for a mobile telephone number and random assurances of support besiege Dattatrey Awari, 30, as he attends to one more phone call just after hanging up on the previous one in the office of the Bhrashtachar Virodhi Jan Aandolan, another of Hazare’s organisations, a kilometre from the village square. “Sampark madhe rahaa,” he advises callers, asking them to stay in touch. “We’ll tell you how you can help after this struggle ends.”

Awari, who joined Hazare formally just as he was completing his B.Com in 2002, has stories of the leader that tap into his own memories of the leader since he was a class II student in the village primary school adjacent to the Sant Yadavbaba temple where Hazare lives and into village legends of a younger Hazare. “We used to hear that he would get a group of boys together on hearing of anyone who continued to brew alcohol or consume it even after residents had collectively decided to be an alcohol-free village and tie him up to a pole opposite the temple. He’d then flog the person,” says Awari.

Awari, along with Suresh Pathare of Ralegan Siddhi who was arrested with Hazare on August 17 in New Delhi, spend their days poring through as many as 15,000 letters of complaint that the organisation receives from across the state every year. The serious letters are sorted district-wise and subject-wise, stacked up on shelves in the office. “Every six months or so, we take these letters along with a covering letter by Anna to departments concerned and record the follow-up action,” he says, explaining that many complaints are taken through to their logical conclusion simply by Hazare’s name being attached before being sent forward to government agencies. “The maximum letters are pertaining to cooperative societies, a few are from people expressing their faith in the Right to Information law that Anna helped enact, the fewest are letters thanking Anna or the organisation for problems solved,” Awari adds.

Back on stage in the main square, the mood turns into one of hope, even mild celebrations, on Thursday night as it appears that the fast may end on Friday morning. The women are still cheerful after spending all afternoon on a porch opposite the village hall, the children join vociferously when there’s singing and slogan-shouting, the young girls arrive for the now frequent gram sabhas in fresh salwaar kameezes, sequined hairclips glittering in their hair. “Divasbhar mela-saarkha aahe,” says one woman. “It’s been like a carnival.”

With no regular entertainment in Ralegan Siddhi, the multiple bike rallies, “thaali” morchas, the nattily dressed college kids from Parner, Shirur and Aurangabad, one group’s hilariously evocative “last rites” for the Union government, the tireless singing and sloganeering has captured the villagers’ attention. Undeniably, on Thursday night when the announcer had to ask a visiting group not to dance for the TV crews as the struggle was “far from over”, the mood was carnivalesque.

A notebook of names is a growing database of Hazare supporters, with several thousand names and phone numbers scrawled into columns. At the end of a loud rendition of the Lokpal anthem, a 12-year-old stands up in the crowd and launches the sloganeering, continuing for a good 15 minutes. His act was neither planned nor staged. “I’ve done it before, we kids have learnt the slogans from hearing them ring in the village all day for so many days now,” says Ganesh Gadohak, a class VIII student of Sant Nilobaraay Vidyalaya.

He’s not wearing an Anna cap; he doesn’t have one. “But I also want to be like Anna. Just like everybody in Ralegan Siddhi.”

The model village

Long-time associate of Anna Hazare and trustee of the Hind Swaraj Trust T L Raut, 68, has a simple answer to why, and how, Ralegan Siddhi has established itself as a model village.

Five factors that are joint at the hip are responsible for the ruin of a village, he says: “Poverty, lack of education, superstition, alcoholism and politicking.” And Ralegan had all of this. Inspired by Swami Vivekanand on his return from the 1962 war, Hazare spent his VRS compensation on repairing the Yadavbaba temple that occupies pride of place just opposite Ralegan Siddhi’s main square. Soon, he would “hammer” it into his fellow villagers’ minds that he was committed to a life of service, before gathering support for his idea of prohibition, giving “military justice” to those who would not fall in line.

“But the real question was of bhaakri (Maharashtrian-style roti) and Anna knew that,” Raut recollects. That’s how the watershed development programme, which Ralegan Siddhi remains well-known for, was initiated. Hazare convinced the agriculture department to grant funds and roped in villagers to help with shramdaan (voluntary labour). “First 500 acres, then 1,000 acres got irrigated—lands that could not guarantee one crop a year were yielding two crops each year. The transformation had begun,” Raut says.

The next ideas flowed fast—donations of the excess grain to a community pool, sale of this to the needy at relaxed prices, a fund for community weddings for the villagers’ daughters, introduction of dairy development for subsidiary income, and more. “The village now produces 5,000 litres of milk daily,” he says.

Family makes abortive bid to cross LoC from PoK

A group of civilians, including women and children, made an unsuccessful bid to cross over to Nowshera on this side of the Line of Control (LoC) from Pakistan-occupied Kashmir on Saturday morning, but their attempt was foiled by the Army troops.

Senior Army officers said that nearly a dozen civilians were seen coming over to Laam (Nowshera) on this side from across the LoC around 11 am.

As they were unarmed, the troops did not open fire. However, when they reached the forward Indian post on the LoC, they were stopped by the troops.

The civilians insisted on crossing over to this side, saying they belonged to the state and had inadvertently crossed over to PoK long ago. However, the troops did not agree and asked them to return to PoK. The drama continued for nearly two hours, and the civilians went back to PoK in the afternoon.

According to the police, the civilians who tried to cross over were Mohammad Ayub, his wife and seven children. The family was accompanied by one more person identified as Abdul Qayoom.

While Ayub had crossed over to PoK from Rajouri district in 1965, Qayoom went there in 2004. The latter was wanted by the police on charges of crossing the border, a senior police officer said.

Ever since the formulation of a policy by the Omar Abdullah government for rehabilitation of Kashmiri youth who wanted to return home from Pakistan and PoK, this has not been the first time that a family had tried to cross over.

Early this year, a couple along with four children had crossed over to Poonch from PoK. The family was handed over to the state police by the Army troops.

However, apprehending that more families may try to return to the state by crossing the LoC, the senior Army authorities decided not to allow anybody to cross over from anywhere other than the crossing points identified by the government.


Why Anna says ‘half victory’: Govt gives in, but not much

Parliament’s resolution on Saturday has paved the way for Anna Hazare to end his 12-day long fast but the government has managed to get out of the crisis zone without offering much to Team Anna.

Having rejected the government’s version of the Lokpal bill that was introduced in the Lok Sabha on August 4 — and burnt its copies in public — the Anna Hazare camp had demanded nothing short of the passage of its own version, called the Jan Lokpal Bill, when Hazare’s indefinite fast began on August 16.

Government’s harakiri in arresting Hazare and putting him in Tihar jail — leading to an outpouring of support from the masses — only resulted in the civil society grouping hardening its position even further, as it put a deadline of August 30 within which it wanted the Parliament to convert the Jan Lokpal bill into a law.

What it finally got was just a resolution conveying the “in-principle agreement” of both Houses of Parliament to the three contentious provisions that the Anna camp definitely wanted to be included in the

Lokpal bill — to include the lower bureaucracy within the ambit of the Lokpal, establishment of Lokayuktas in states through the Lokpal bill, and a citizen’s charter for all government employees. There is no certainty as to whether the final bill, as recommended by the Standing Committee, would have the Prime Minister within the purview of the Lokpal, a key demand at the start of the agitation, though the government is said to have relented on this count.

The climbdowns from the hardline positions had been made at the protracted negotiations between Team Anna and the government after it became apparent that some of the demands were not just unworkable but also unconstitutional. In the end, a face-saving exit was all that could be won.

The reality was not lost on Hazare who described Saturday’s development as only a “half victory.” “The complete victory is still to be won,” he said from the stage at Ramlila grounds after receiving a letter from the Prime Minister and a copy of the Parliament’s resolution from Union Minister Vilasrao Deshmukh.

After the give and take
What Team Anna demanded

Pass the Jan Lokpal bill in its entirety, by August 30. Specifically, bring the office of the Prime Minister and higher judiciary within the ambit of Lokpal.

What it was finally ready to settle for

Inclusion of three provisions in the Lokpal bill—include lower bureaucracy, provide for simultaneous establishment of Lokayuktas in every state, and a citizens’ charter defining the time in which a public service must be delivered.

What it finally got

A resolution expressing the “in-principle agreement” of both Houses of Parliament to these three provisions and to “transmit the proceedings” of the House to the Standing Committee dealing with the issue.

What remains

Virtually everything. The final shape of the bill would depend on the recommendations of the Standing Committee and the discussions in both Houses of Parliament after that.


जीत देखने से पहले अन्ना समर्थक ने दे दी जान

राजधानी दिल्ली में अनशन पर बैठे अन्ना हजारे के कुछ समर्थक आत्मघाती कदम उठाने से परहेज नहीं कर रहे। महाराष्ट्र के सांगली जिले की एक महिला ने तो अपनी जान ही दे दी। 33 वर्षीय सुभांगी ने आत्महत्या से पहले लिखे पत्र में साफ कहा है कि अन्ना हजारे अनशन कर रहे हैं, लेकिन सरकार कुछ नहीं कर रही है। सांगली के मिरज तालुका की निवासी सुभांगी कारंडे ने शुक्रवार की शाम को अपने घर में पंखे से लटककर फांसी लगा ली थी। शुभांगी अपने पीछे पति विनायक कारंडे, एक 13 वर्षीय पुत्री एवं एक 10 वर्षीय पुत्र छोड़ गई है। उसका पति मिरज इंडस्टि्रयल एस्टेट में गढ़ाई का काम करता है। शुभांगी की मौत का पता शुक्रवार को उस समय चला, जब उसके दोनों बच्चे शाम को स्कूल से लौटकर घर पहुंचे। शुभांगी ने आत्महत्या से पहले लिखे अपने पत्र में कहा है कि देश की गरीब जनता के भले के लिए सरकार को अन्ना हजारे की मांगें मान लेनी चाहिए। स्थानीय लोगों का कहना है कि शुभांगी का परिवार भी आर्थिक तंगी से गुजर रहा था। शुभांगी ने अपने पत्र में लिखा है कि मैं देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने के लिए आत्महत्या कर रही हूं। गरीबों का भूखों मरते मैं नहीं देख सकती। गरीबों को उचित तनख्वाह नहीं मिलती। यहां तक कि निजी कंपनियों में भी वेतन कम हैं और महंगाई बढ़ती जा रही है। शुभांगी ने अपना पत्र समाप्त करते हुए लिखा है कि मैं समाज के लिए ऐसा कर रही हूं और मेरे परिवार को इससे दुखी नहीं होना चाहिए।


राहुल का प्रस्ताव लोकपाल में देरी का बहाना

वृंदा मदुरै : माकपा नेता वृंदा करात ने कहा कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव द्वारा लोकपाल को संवैधानिक निकाय बनाए जाने का सुझाव इस विधेयक की मांग पर कोई कार्रवाई नहीं करने का एक और बहाना है। संवाददाताओं से यहां बातचीत में वृंदा करात ने कहा कि वह राहुल गांधी द्वारा शुक्रवार को अचानक रखे गए प्रस्ताव से आश्चर्यचकित थी और इस बात अचंभित थी कि वह अप्रैल से अगस्त तक उनके प्रस्ताव पर क्या कर रहे थे। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव काफी देर से आया है और यह देर करने की एक और रणनीति है। प्रस्ताव की कोई प्रासंगिकता नहीं है। माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य ने सवाल किया इसके शून्य काल में देने का क्या महत्व है? अन्ना हजारे के समर्थन में आए महाबली खली शिमला : दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन पर बैठे अन्ना के समर्थन में द ग्रेट खली भी उतर गए हैं। उन्होंने लोगों से अपील की है कि समाज से भ्रष्टाचार मिटाने के लिए अन्ना के समर्थन में आगे आएं। व‌र्ल्ड रेसलिंग फेडरेशन (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) से जुड़े खली उर्फ दिलीप सिंह राणा ने सरकार और टीम अन्ना के बीच गतिरोध पर भी चिंता जताई। अमेरिका में रह रहे खली ने अपने प्रवक्ता के हवाले से कहा है कि वे खुद किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन अन्ना का आंदोलन देश हित में है। उन्होंने कहा कि व्यस्तता के बावजूद वे समाचार माध्यमों के जरिये घटनाक्रम पर निगाह रखे हुए हैं। हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के एक गरीब परिवार में जन्मे खली ने कहा, अपने संघर्ष के दिनों में मैं भी भ्रष्टाचार का शिकार बना। शुरुआती दिनों में अपनी आजीविका चलाने के लिए उन्हें मजदूरी तक करनी पड़ी। अक्टूबर, 2000 से वह डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रियंका की जेठानी के घर प्रदर्शन करते वकील गिरफ्तार मुरादाबाद : अन्ना समर्थकों की एक टीम शनिवार को प्रियंका गांधी की जेठानी सायरा वढेरा के आवास पर पहुंच गई। धरना प्रदर्शन की सूचना पहुंची पुलिस ने एक महिला वकील समेत सात लोगों को गिरफ्तार कर लिया। पति रिचर्ड वढेरा की मौत के बाद सायरा अपनी बच्ची के साथ अकेले ही सिविल लाइंस थाना क्षेत्र के मधुबनी कालोनी में रहती हैं। इस बीच महिला थाने के पास से अन्ना के समर्थन में वकीलों की रैली निकली उसमें से कुछ वकील थाने के भीतर पहुंचकर मीनाक्षी को साथ ले गए। पुलिस ने दबाव बनाकर फिर से हिरासत में ले लिया। बाद में निजी मुचलके पर रिहा कर दिया। बाकी छह को शांति भंग की आशंका में चालान करते हुए एसीएम टू के सामने पेश किया गया है। जहां से प्रति आरोपी 50 हजार की जमानत व इतनी ही राशि के मुचलके पर पाबंद करते हुए रिहाई के आदेश दे दिए। अन्ना टीम की बयानबाजी उचित नहीं : उमर श्रीनगर : मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला शनिवार को अन्ना हजारे को लेकर माइक्रो ब्लॉगिंग साइट थे। उन्होंने कहा कि लगता है कि दुनिया में अन्ना के सिवाय कुछ नहीं हो रहा है। इसलिए मैं अन्ना पर कुछ नहीं ट्वीट करूंगा। अन्ना की टीम को लेकर आलोचनात्मक रवैया अपनाते हुए उन्होंने कहा कि मुझे समझ में नहीं आता कि किरण बेदी और उनके साथियों ने जिस तरह की बयानबाजी शुक्रवार को रामलीला ग्राउंड में की, वह उचित नहीं थी। मुझे किरण बेदी के रवैये पर अफसोस है। क्या उन्होंने अपने भाषण से सही मायनों मे अन्ना हजारे के आंदोलन की मदद की है।


संसद की सर्वोच्चता पर कोई आंच नहीं

संसद की सर्वोच्चता पर कोई आंच नहीं आई और आम जनता की शक्ति की जीत भी हो गई। मेधा पाटकर सामाजिक कार्यकर्ता

अन्ना हजारे के आंदोलन को यह श्रेय अवश्य देना होगा कि उन्होंने हम सब को बदल दिया है। वरुण गांधी, भाजपा सांसद

जिन लोगों ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजी को नहीं देखा वे उनकी छवि अन्ना हजारे में देख सकते हैं। तरुण विजय, भाजपा सांसद

ध्यान रखना होगा कि जब यह मसौदा फिर संसद में दोबारा आए तब अन्ना को दोबारा अनशन का सहारा न लेना पड़े। तुषार गांधी, विचारक

अन्ना की सबसे बड़ी उपलब्धि लोगों को यह अहसास कराना है कि वे अपनी नियति को खुद तय कर सकते हैं। शेखर कपूर, फिल्म निर्देशक

अन्ना ने असंभव को संभव कर दिया। संसद ने जनता के एक मुद्दे पर बहस की और प्रस्ताव पारित किया। अनुपम खेर, फिल्म अभिनेता

नई पीढ़ी को नई क्रांति की जरूरत होती है। अन्ना को सलाम कि उन्होंने नई पीढ़ी को जीत दिलाई। जय हिंद मधुर भंडारकर, फिल्म निर्देशक


न्यायाधीश जैसा ही है लोकायुक्त का काम

समाजसेवी अन्ना हजारे के सहयोगी गुजरात के नवनियुक्त लोकायुक्त न्यायमूर्ति आर.ए मेहता अपनी नई जिम्मेदारी को सामान्य रूप से ले रहे हैं। उनका कहना है लोकायुक्त का काम भी कमोवेश न्यायाधीश की तरह ही है। लोकायुक्त का फैसला भी उपलब्ध कराए गए तथ्यों, दस्तावेजों और गवाहों पर ही आधारित होता है। वह कर्नाटक के लाकायुक्त को काफी प्रभावी मानते हैं। इसकी वजह प्रदत्त अधिकार हैं। वह कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त न्यायमूर्ति संतोष हेगड़े को भी योग्य एवं ईमानदार न्यायाधीश बताते है। उनका मानना है कि समय की नजाकत को भांप कर अब लोकायुक्त के अधिकारों में इजाफा अपरिहार्य हो गया है। यहां दैनिक जागरण से बातचीत में उन्होंने कहा कि गुजरात और कर्नाटक लोकायुक्त की तुलना करना फिलवक्त बेमानी होगी। इसकी वजह बताते हुए वह कहते हैं कि कर्नाटक में वर्तमान में काफी प्रभावी लोकायुक्त हैं। वहां उन्हें पर्याप्त अधिकार भी मिले हैं और पूर्व लोकायुक्त संतोष हेगड़े ने अपनी बेबाकी से उसे नई पहचान दी है। मेहता ने बताया कि राज्यपाल डॉ.कमला की ओर से उन्हें लोकायुक्त नियुक्त किया गया। इसमें कोई हर्ष और चुनौती की बात नहीं वे इसे सम और सहज भाव से लेते हैं। सरकार पर कांग्रेस की ओर से लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए राज्य सरकार की ओर से बनाए गए शाह जांच आयोग तथा लोकायुक्त के अधिकारों की समीक्षा के लिए बने मंत्री समूह पर उन्होंने कुछ भी टिप्पणी करने से इंकार कर दिया। उन्होंने साफ किया है कि न्यायमूर्ति एम.बी शाह उच्चतम न्यायालय की कालेधन पर बनी विशेष टीम के सदस्य हैं। इसलिए उन पर निष्पक्ष जांच को लेकर कोई शंका का प्रश्न ही नहीं उठता। न्यायमूर्ति मेहता कहते हैं कि वे कभी काम का दबाव या तनाव महसूस नहीं करते। अपने काम को पूरे शौक के साथ करता हूं, खाली समय में इंटरनेट पर सर्फिग करना उन्हें पसंद है। मजाक में वे कहते हैं कि तनाव वकीलों को अधिक होता है, केस कमजोर हो तो हार का डर होता है और केस मजबूत हो तो भी जीत नहीं पाने की आशंका लगी रहती है। मेहता ने बताया कि शुक्रवार को राज्यपाल का पत्र मिलने के बाद ही उन्हें लोकायुक्त नियुक्त किए जाने की सूचना मिली। न्यायमूर्ति मेहता अन्ना हजारे के पुराने साथी हैं। गुजरात दौरे के दौरान अन्ना उनके ही निजी आवास पर ठहरे थे। अनशन पर उनका साफ कहना है कि टीम अन्ना को उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। राज्यपाल की ओर से लोकायुक्त नियुक्त किए जाने के बावजूद फिलहाल उनके कार्यभार संभालना तय नहीं हो पाया है। दूसरी ओर, राज्यपाल के इस कदम ने गुजरात में राजनीतिक गर्माहट लाने के साथ राजभवन तथा सरकार के बीच दूरियां बढ़ा दी है। हालांकि,गुजरात सरकार ने इस फैसले को हाई कोर्ट में भले चुनौती दे दी है, लेकिन न्यायालय इसके संवैधानिक प्राविधानों को लेकर पसोपेश में है।कानूनविद् एवं नेता विपक्ष का मानना है कि न्यायालय राज्यपाल को सीधे नोटिस नहीं दे सकता, जबकि गुजरात हाई कोर्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष यतीन ओझा का कहना है कि महाधिवक्ता को सरकार के बचाव में अदालत में राज्यपाल के खिलाफ बोलने में कोई संवैधानिक बाधा नहीं है।


अन्ना के समर्थन में सड़कों पर उतरा जनसैलाब

जन लोकपाल विधेयक की मांग को लेकर बीते 12 दिनों से दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन पर बैठे समाजसेवी अन्ना हजारे के समर्थन में शनिवार को यूपी एवं उत्तराखंड में जनसैलाव सड़कों पर उतर आया। लखनऊ: शनिवार को भी अन्ना तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ है, अब न सहेंगे अत्याचार, खत्म करेंगे भ्रष्टाचार और जो सरकार निकम्मी है वह सरकार बदलनी है जैसे गगनभेदी नारों के बीच जोश भरते नारे लगाते हुए लोगों ने केन्द्र सरकार को आगाह किया। भदोही में अन्ना समर्थकों ने कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी का पुतला फूंका तो इलाहाबाद विवि में छात्रों ने कक्षा का बहिष्कार किया। लखनऊ में जन लोकपाल बिल के समर्थन में जीपीओ से झूलेलाल पार्क तक जुलूस भी निकाला। इलाहाबाद में विवि के छात्र-छात्राओं ने भी मोर्चा खोल दिया है। वाराणसी समेत पूर्वाचल के जिलों में शनिवार को भी प्रदर्शन का दौर जारी रहा। मऊ, जौनपुर, भदोही, चंदौली, बलिया, गोरखपुर-बस्ती,पडरौना, सिद्धार्थनगर, देवरिया, संत कबीर नगर एवं महराजगंज में भी लोगों ने जुलूस निकाल बिल पारित करने की मांग की। मेरठ, बरेली, गाजियाबाद, मथुरा, आगरा अलीगढ़ और फिरोजाबाद में बाजार पूरी तरह से बंद रहे। गाजियाबाद में में जुलूस निकालकर जनप्रतिनिधियों के पुतलों को फांसी के फंदे पर लटकाया। पीलीभीत में मेनका फैंस क्लब और सहारनपुर में उद्योग प्रतिनिधि मंडल ने शनिवार को कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी का पुतला फूंका। शाहजहांपुर में हर वर्ग के लोगों ने एक किमी लंबा जुलूस निकाला। बागपत, बदायूं, हाथरस में भी प्रदर्शन हुए। फिरोजाबाद में अनशनकारियों का स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा है। देहरादून: अन्ना हजारे के समर्थन में उत्तराखंड में अधिकांश व्यापारिक प्रतिष्ठान बंद रहे। हरिद्वार में व्यापारियों ने तीर्थयात्रियों की सुविधा को देखते हुए कारोबार बंद नहीं रखा, लेकिन रुद्राभिषेक के माध्यम से अन्ना का साथ दिया। राज्यभर में तमाम संगठनों और स्कूली छात्रों ने रैली निकाल समर्थन जताया। देहरादून में अधिवक्ताओं ने कलक्ट्रेट पर प्रदर्शन किया। कुछेक शहरों में व्यापारियों ने बैंक और सरकारी दफ्तर बंद कराए। संसद की कार्यवाही देखने के लिए भी लोग टीवी सेटों से चिपके रहे। बंद का आह्वान प्रांतीय उद्योग व्यापार प्रतिनिधिमंडल ने किया था। राजधानी में अधिकांश बाजार बंद रहे। पेट्रोल पंप दोपहर बारह बजे बंद रहे, जबकि सिनेमा हॉल में पहले शो नहीं चले। शिव सेना ने प्रदर्शन कर गधों पर भ्रष्टाचार के प्रतीकात्मक पुतले घुमाए। गढ़वाल एवं कुमाऊं के विभिन्न शहरों में व्यापारियों ने रैली निकालकर अन्ना की मांग का समर्थन किया। पीपलकोटी, चमोली, जोशीमठ, पौड़ी, टिहरी, उत्तरकाशी, चंबा, चाका, देवप्रयाग, श्रीनगर, नैनबाग, बर्नीगाड़ आदि स्थानों पर व्यापारिक प्रतिष्ठान रहे। कोटद्वार में महिलाओं ने रैली निकाली। गोपेश्वर, पांडुकेश्वर, बदरीनाथ में व्यापारियों ने केंद्र सरकार का पुतला फूंका। रुड़की में अधिकांश दुकानें सुबह से ही बंद रही। हरिद्वार में व्यापारियों ने रुद्राभिषेक किया।


अन्ना ने आइपैड पर देखी संसद की बहस

भले ही तकनीक के प्रति अन्ना हजारे का रुझान न हो, लेकिन शनिवार को लोकपाल पर संसद में हुई एतिहासिक बहस उन्होंने हाईटेक गैजेट आइपैड पर देखी। बहस देखकर 74 वर्षीय अन्ना बोले, बहुत अच्छा। जन लोकपाल विधेयक की मांग को लेकर पिछले 12 दिनों से अनशन पर बैठे अन्ना हजारे ने रामलीला मैदान के मंच के पीछे बने अस्थायी कमरे में संसदीय कार्यवाही को देखा। कमरे में टीवी मौजूद नहीं था। इसलिए संसद की कार्यवाही देखने के लिए उन्हें आइपैड दिया गया। अन्ना की सहयोगी किरण बेदी ने बताया कि संसद की कार्यवाही देखकर अन्ना मुस्कराए और बोले, बहुत अच्छा है। इसके साथ ही बेदी ने ट्वीट किया, एतिहासिक घड़ी करीब आ रही है। आप ईश्वर से प्रार्थना करते रहिए।


बाबा रामदेव ने बताया लोकतंत्र की जीतहरिद्वार

: बाबा रामदेव ने अन्ना हजारे के जन लोकपाल पर संसद में चली दिन भर की कार्यवाही को लोकतंत्र की जीत बताया है। पतंजलि योगपीठ में पत्रकार वार्ता में उन्होंने दावा किया कि अन्ना हजारे के आंदोलन में पहली शहादत भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के कार्यकर्ता उड़ीसा निवासी अरुण दास ने दी। उन्होंने कहा कि दिल्ली के रामलीला मैदान में अरुण दास आठ दिन से अन्ना के समर्थन में अनशन कर रहे थे। अन्ना के जन लोकपाल पर संसद में चली बहस पर पूछे प्रश्न पर उन्होंने कहा कि जनता की ताकत ही लोकतंत्र की असली ताकत है। बाबा रामदेव ने इस मामले में कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के संसद में दिए गए वक्तव्य की सराहना की। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी का यह कहना कि लोकपाल को संवैधानिक दर्जा दिया जाए, यह सही है और वे उसका समर्थन करते हैं। उन्होंने कहा कि अभी यह लड़ाई आगे और चलनी है क्योंकि अभी सिर्फ तीन ही बातों पर सहमति बनी है। यह तो सिर्फ एक शुरुआत मात्र है, जिसके लिए मैं सभी राजनीतिक दलों, आम जनता और अन्ना को धन्यवाद देता हूं।


पूरी ताकत के साथ अन्ना के साथ खड़ी हुई भाजपा

, नई दिल्ली रामलीला मैदान से राजनीतिज्ञों की मंशा पर उठ रहे सवालों के बीच शनिवार को भाजपा ने खुद को अलग और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में आगे दिखाने की कोशिश की। संसद में चर्चा का पूरा फायदा उठाते हुए दोनों सदनों में भाजपा ने जहां भ्रष्टाचार का पूरा ठीकरा संप्रग सरकार पर फोड़ा वहीं अन्ना के लोकपाल के साथ जनमानस को अपने साथ जोड़ने का दांव भी खेल दिया। दूसरे दलों की तरह ही एक-दो दिन पहले तक अन्ना की शर्तो से थोड़ी असहमत भाजपा शनिवार को पूरी तरह अन्ना के साथ खड़ी दिखी। एक ही कानून के तहत केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति, निचले स्तर के अधिकारियों को इसके दायरे में लाने तथा सिटीजन चार्टर जैसी अन्ना की तीनों शर्तो पर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज और राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने पूरा समर्थन दिया। पहले लोकपाल और लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर हर दल में उलझन रही थी, लेकिन भाजपा के इन दोनो नेताओं ने कानूनी धाराओं का उल्लेख करते हुए अन्ना की इस मांग को धार दे दी। प्रधानमंत्री को इसके दायरे में लाने की पुरजोर मांग करते हुए दोनों नेताओं ने कहा कि आइपीसी और सीआरपीसी से जब प्रधानमंत्री को छूट नहीं है तो फिर लोकपाल से उन्हें अलग रखना अनुचित है। यह और बात है कि भाजपा कुछ अपवादों के साथ पीएम को दायरे में लाने के पक्ष में है। सही मायने में सिर्फ न्यायपालिका और संसद के अंदर सदस्यों के आचरण को लोकपाल के दायरे में लाने के मुद्दे को छोड़ दें तो भाजपा ने पूरी तरह जन लोकपाल को अपना लिया। उसमें भी चर्चा के बीच सुषमा और जेटली ने सरकार की दुविधा की ओर से भी ध्यान दिलाया। शुक्रवार से शनिवार के बीच सरकार में लगातार रहे असमंजस का हवाला देते हुए उन्होंने परोक्ष आरोप लगाया कि सरकार अंतिम दम तक इससे बचने की कोशिश में लगी रही। जबकि भाजपा ने मत विभाजन के साथ चर्चा का नोटिस देकर गंभीर पहल की थी। न्यायपालिका के लिए सुषमा और जेटली ने न्यायिक आयोग के गठन का सुझाव दिया, जिसे कुछ दूसरे दलों ने भी माना। सीबीआइ की भ्रष्टाचार निरोधक इकाई को लोकपाल में लाने के मुद्दे पर बहस छिड़ी है, लेकिन भाजपा इसे भी तर्कसंगत मानती है। इतना ही नहीं, टीम अन्ना की तरफ से लोकपाल विधेयक के लिए समय सीमा रखने का दबाव बनाने को भी उन्होंने एक सीमा तक जायज बता दिया। उन्होंने याद दिलाया कि 40 साल में आठ बार लोकपाल विधेयक संसद आकर दम तोड़ गया। सुषमा ने सीवीसी के चयन से लेकर 2जी और सीडब्ल्यूजी जैसे घोटालों का हवाला देते हुए कहा कि इस भ्रष्टाचार के चलते ही जनता का आक्रोश उभरा और वह इसके खिलाफ सख्त कानून चाहती है। सिटीजन चार्टर की बात उठी तो सुषमा और जेटली ने बिहार, मध्य प्रदेश, गुजरात जैसे राजग शासित राज्यों को श्रेय देते हुए बढ़त बनाने की कोशिश की। जेटली ने फोन टैपिंग के अधिकारों पर जरूर सवाल उठाया।


लोकपाल पर राजनीतिक दलों की राय रही जुदा-जुदा

लोकपाल पर राजनीतिक दलों की राय रही जुदा-जुदारामगोपाल यादव (सपा) बाल हठ तो सुना था पर वृद्ध हठ नहीं। जन लोकपाल में कई चीजें अनावश्यक हैं तो कुछ जरूरी प्रावधान जोड़ने की जरूरत है। इसके दायरे में एनजीओ और निजी शिक्षण संस्थानों को लाया जाना चाहिए। दबाव में अपने अधिकार दूसरे को देना जायज नहीं हो सकता है। बहुत हड़बड़ी में सरकार को गलतियां नहीं करनी चाहिए। जन लोकपाल की सर्च कमेटी के गठन में जिन लोगों को रखने का प्रावधान है, उनमें जजों और सिविल सोसाइटी के लोगों को रखा जाना है। उन्हें बेदाग और ईमानदार कौन साबित करेगा? सांसदों को इसके दायरे में लाने का कोई औचित्य नहीं है। इसकी कमेटी में अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति व अनुसूचित जाति और पिछड़ी जाति का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। लोकायुक्तों की नियुक्ति का अधिकार राज्यों को होना चाहिए। निचली ब्यूरोक्रेसी को शामिल करना अव्यावहारिक होगा। शरद यादव (जदयू) अन्ना की तीनों शर्तो का समर्थन करता हूं, लेकिन याद भी दिलाना चाहता हूं कि संसद की शक्ति अपार है और भ्रष्टाचार के खिलाफ भी कई लड़ाइयां लड़ी हैं। आज कई मंत्री व सांसद जेल में हैं तो इसमें संसद की भूमिका रही है। पैसे लेकर सवाल पूछने वाले सदस्यों को इसी संसद में सदस्यता खत्म कर दी। लेकिन बाहर ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि यहां सभी लोग दागी हैं। यह गंभीर सवाल है। मैं अन्ना की इज्जत करता हूं, लेकिन यह भी कहना चाहता हूं कि उनके आसपास के लोगों का आचरण सही नहीं है। उन्हें हमें राजनीति सिखाने की जरूरत नहीं है। विधेयक में पिछड़े वर्ग के लोगों को शामिल किया जाना चाहिए। लालू प्रसाद (राजद) अन्ना के आंदोलन को बेवजह तवज्जो देने के लिए उन्होंने केन्द्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया और कहा आज जो स्थिति पैदा हुई उसके लिए आप ही लोग जिम्मेदार है। सिविल सोसायटी के लोग कौन हैं। इनका कब चुनाव हुआ। आज अरुणा राय आ गई कल कोई और नहीं आएगा इसकी कौन गारंटी देगा। अन्ना अच्छे आदमी हैं, लेकिन उनके मुंशी मैनेजर ठीक नहीं है। उन्हें दिग्भ्रमित करता है सब। उन्होंने प्रधानमंत्री पर भी कटाक्ष किया और कहा, आपने उन्हें सैल्यूट किया। पूरे सदन ने अनशन तोड़ने की अपील की, लेकिन क्या हुआ। दबाव में नहीं आने की सलाह देते हुए लालू ने कहा कालीदास मत बनिए। संविधान के खिलाफ जाकर आज सदन में चर्चा करा ली ठीक है। आगे ऐसी गलती मत कीजिएगा। संसद की सर्वोच्चता को एक इंच भी हिलने नहीं देंगे। सतीश चंद्र मिश्र (बसपा) जन लोकपाल पर चर्चा के बजाए सरकार अपना कोई बिल का वर्जन लाए जिसमें अनुसूचित जाति जनजाति और पिछड़े सबका स्थान हो। न्यायपालिका की जवाबदेही तो होनी चाहिए। सभी सरकारी कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाना भी व्यावहारिक नहीं है। लोकायुक्त बनाने के प्रावधान का सवाल है तो यह अधिकार राज्य सरकारों का है। सीताराम येचुरी (माकपा) पिछले 40 साल से लोकपाल पर संसद में विचार चल रहा है। नौ बार इस पर प्रस्ताव आया। पर यह कानून नहीं बन सका। इससे धीरे धीरे जनता में संदेश गया कि हम लोकपाल नहीं चाहते हैं। अन्ना जी के तीनों मुद्दों से हम सहमत हैं। न्यायपालिका की अलग प्रणाली की बात पहले ही कर दी है। लोकपाल के साथ ही राज्यों के लिए एक माडल बिल पास करके राज्यों को कहा जा सकता है कि अगर चाहे तो वे ऐसा बिल बना सकते हैं। संयुक्त सचिव स्तर से नीचे के अधिकारियों और कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाए बिना भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा पाना संभव नहीं होगा। मौजूदा सतर्कता मशीनरी को लोकपाल के दायरे में होना चाहिए। रामविलास पासवान (लोजपा) अन्ना का यह पूरा का पूरा आंदोलन अनुसूचित जाति जनजाति और पिछड़ा विरोधी आंदोलन है। सरकार इसी तरह दबाव में आकर फैसले लेती रही तो कल कोई और ताकतें भीड़ जुटाकर मांग करने लगेगी कि दलितों को आरक्षण समाप्त किया जाए। तब क्या होगा? लोकपाल की सर्च कमेटी में अनुसूचित जाति जनजाति और पिछड़े तबके को पचास प्रतिशत आरक्षण दिया जाना चाहिए। ऐसा नहीं हुआ तो वे इस बिल को पास नहीं होने देंगे। गुरुदास दासगुप्ता (भाकपा) लोग भ्रष्टाचार से परेशान होकर सड़कों पर नहीं उतरे हैं, बल्कि भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होने के कारण आंदोलित हैं। सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। बोफर्स का घोटाला64 करोड़ रुपये का था, लेकिन 2जी 30000 करोड़ रुपये का घोटाला है। लोकपाल बिल भ्रष्टाचार पर पूरी तरह से लगाम लगाने में भले ही सफल न हो, पर यह पहला कदम जरूर साबित होगा। पिछले 12 दिनों से अन्ना के अनशन को तुड़वाने में फेल रही सरकार पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि इस सरकार में सत्ता के कई केंद्र है, जो अलग-अलग भाषा बोल रहे हैं। सुदीप बंदोपाध्याय (तृणमूल) भ्रष्टाचार को रोकने के लिए लोकपाल विधेयक को स्वायत्तशासी संस्था के रूप में मान्यता होनी चाहिए। राज्यों में भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए लोकायुक्तों की नियुक्ति होनी चाहिए। जयंत चौधरी (रालोद) कई बार जो अफसरशाही है वो डॉमिनेट करती है। वे परिवर्तन नहीं चाहते। इसलिए जब भ्रष्टाचार के खिलाफ एक नया क्रांतिकारी विचार आया तो देश की जनता उसके क्रियान्वयन के लिए नैतिक दबाव बना रही है। इसकी शुरूआत में सरकार इसका विरोध कर रही थी क्योंकि उसके पीछे नौकरशाही का हाथ था।


अभद्र टिप्पणी पर भड़के सांसद

, नई दिल्ली जन लोकपाल के लिए अन्ना के अनशन को मिले व्यापक समर्थन को देख सरकार व राजनीतिक दलों ने घुटने तो जरूर टेक दिए, लेकिन सांसदों में अन्ना के कुछ समर्थकों को लेकर जबरदस्त नाराजगी है। खास तौर से उनसे, जिन्होंने सांसदों के लिए गंवार, अनपढ़ और घूंघट में रहने जैसे संबोधन के लिए अन्ना के मंच का इस्तेमाल किया। सांसदों की नजर में संसद ही सर्वोच्च है। लिहाजा अभद्र टिप्पणियों को विशेषाधिकार हनन का मामला मानते हुए वे सोमवार को इसे संसद में जोर-शोर से उठाने की तैयारी में हैं। रामलीला मैदान में अन्ना के अनशन के दौरान सांसदों व दूसरे जनप्रतिनिधियों के बारे में जो कुछ कहा गया, विभिन्न दलों के नेता उससे गुस्से में हैं। खास तौर से शुक्रवार को मंच से सांसदों को गंवार व अनपढ़ कहे जाने को काफी गंभीरता से लिया गया है। सूत्रों के मुताबिक सपा, राजद समेत कई दूसरे दल ऐसी टिप्पणियों को विशेषाधिकार का मामला मानते हुए इसे शनिवार को ही संसद के दोनों सदनों में उठाना चाहते थे, लेकिन लोकपाल के मसले पर जरूरी चर्चा व अन्ना के अनशन को खत्म कराने को ज्यादा जरूरी मानते हुए उन्होंने इसे तूल नहीं दिया। हालांकि, राज्यसभा में राजद के राजनीति प्रसाद ने इसे उठाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन सभापति की अनुमति न मिलने के कारण मामला जहां का तहां रह गया। गौरतलब है कि फिल्म कलाकार ओमपुरी ने शुक्रवार को अन्ना के मंच से सांसदों पर तल्ख टिप्पणी की थी। ज्यादातर सांसदों को अनपढ़ व गंवार जैसे शब्दों से नवाजा गया था। जबकि सांसदों के मुंह छिपाने के लिए घूंघट में रहने की बात किरण बेदी की ओर से कही गयी थी। सूत्रों के मुताबिक सोमवार को संसद के दोनों सदनों में यह मुद्दा जोर-शोर से उठेगा। सपा और राजद ही नहीं, बल्कि दूसरे दल भी इसमें शामिल होंगे।


तीन मेट्रो स्टेशन तीन घंटे के लिए कराए बंद

: शनिवार की शाम इंडिया गेट व इसके आसपास के इलाके में मेट्रो से जाने वालों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। विभिन्न लाइनों पर स्थित मेट्रो स्टेशनों पर जब लोग इंडिया गेट जाने के लिए केंद्रीय सचिवालय, पटेल चौक मेट्रो स्टेशन का टोकन लेने पहुंचे तो उन्हें बताया गया इन सभी स्टेशनों को आवाजाही के लिए बंद कर दिए गए हैं। शनिवार दोपहर दिल्ली पुलिस ने डीएमआरसी को इंडिया गेट व आसपास के इलाके में स्थित मेट्रो स्टेशनों केंद्रीय सचिवालय, पटेल चौक तथा उद्योग भवन आवाजाही के लिए बंद करने का निर्देश दिया। निर्देश में पहले शाम चार बजे से अनिश्चितकाल का जिक्र था, मगर बाद में इसे संशोधन करते हुए शाम सात बजे तक के लिए कर दिया गया। इससे वे लोग जो शनिवार की शाम मेट्रो से इस इलाके में आना चाहते थे, उन्हें काफी परेशानी हुई। रामलीला मैदान में अन्ना के आंदोलन तथा गत कुछ दिनों से जिस तरह अन्ना व उनके सहयोगी सांसदों के घर धरना देने की अपील कर रहे हैं, उससे सैकड़ों समर्थक बिना एक पल गंवाए वहां पहुंच रहे हैं। रामलीला मैदान के बाद आंदोलन के लिए समर्थक बड़ी संख्या में इंडिया गेट ही पहुंच रहे हैं। शनिवार और रविवार को वहां गत सप्ताहांत की तरह समर्थक एकत्रित न हों इसलिए दिल्ली पुलिस ने एहतियातन यह निर्देश जारी किया था। मेट्रो स्टेशन बंद होने से लोगों को परेशानी उठानी पड़ी।


अन्ना के मंच से बहती रही सुरों की बयार

अन्ना के मंच से शनिवार को लगातार सुर लहरी बिखेरती रही जिसमें समर्थक ही नहीं अन्ना भी झूमते नजर आये। सुबह से ही बड़े गायकों के साथ-साथ कवि और प्रशंसकों के गायन का दौर चलता रहा। लोकप्रिय गायक सोनू निगम ही नहीं, भोजपुरी गायक गजाधर ठाकुर ने भी सुरों की फुहार से उमस भरी गर्मी में खड़े तमाम अन्ना समर्थकों को ठंडक दी। अन्ना के अनशन में देशभक्ति गीतों को गाकर और सुनकर समर्थकों में लगातार ऊर्जा को संचार होता रहा। उमस भरी इस गर्मी में मंच से आने वाली सुरों की फुहार ने असल में लोगों को काफी राहत के साथ-साथ ऊर्जा से भर दिया। झांसी से आये वीर रस के कवि मदन मिथरे ने अपनी कविताओं से लोगों में ऊर्जा का संचार किया। भोजपुरी गायक गजाधर ठाकुर के गाने दुनिया में पावन देसवा हमार.. में जब किरण बेदी ने तिरंगा लहराते हुए उनका साथ दिया तो लोगों के चेहरे की खुशी देखते बन रही थी। इसी तरह पंजाब से आये बलवीर सिंह ने जब अन्ना साई-अन्ना साई के बोल को सुरों में बांधा तो लोगों ने उनका भरपूर साथ दिया।


खुशी, सुकून और छलकते आंसू

नई दिल्ली चेहरे पर खुशी, दिल में सुकून, कइयों की आंखों से छलकते आंसू, एक-दूसरे को बधाई देते लोग और बहुत कुछ.. यह देखने को मिल रहा था रामलीला मैदान में। सड़कों पर चल रहे, बसों-मेट्रो से सफर कर रहे लोगों के चेहरों से। भ्रष्टाचार के खिलाफ आधी जीत जो हुई है। दोनों सदनों (राज्य सभा व लोकसभा) ने जन लोकपाल बिल के उस प्रस्ताव को पास कर दिया है जिसके लिए अन्ना हजारे पिछले 12 दिनों से रामलीला मैदान में अनशन पर हैं। जिनके समर्थन में लाखों-करोड़ों लोग अब तक सड़क पर निकल चुके हैं। असली जश्न मनाने की बात तो अन्ना हजारे ने आज (रविवार) को कही है लेकिन शुरुआत तो हो चुकी है। याहू.. यह जनता का नारा है, अब तो तंत्र हमारा है, भारत माता की जय बोल, तब दिल के दरवाजे खोल। जैसे नारों से पूरा रामलीला मैदान गूंज रहा था। रात करीब सवा नौ बजे केंद्रीय मंत्री विलास राव देशमुख प्रधानमंत्री का पत्र रामलीला मैदान के मंच पर से पढ़ रहे थे तो उपस्थित लोग ध्यान से सुन रहे थे। जब उन्होंने कहा कि दोनों सदनों ने प्रस्ताव पास किया तो खुशी की ध्वनि मैदान में गूंजी ..अन्ना हजारे की जय, इंकलाब जिंदाबाद, वंदे-मारतम जैसे शब्द सुनने को मिले। जो लोगों के बदन में एक अजीब तरह की सिहरन पैदा कर रहे थे। कुछ देर के लिए देशमुख को शांत रहना पड़ा। लोगों का अनुशासन तो देखिए जब राष्ट्रगान जन गण मन शुरू हुआ तो वहां उपस्थित लोग सावधान की मुद्रा में खड़े हो गए। अलग-अलग जगहों से सूचना मिलती रही कि लोग टीवी देखने के दौरान राष्ट्रीय गीत पर खड़े होकर एक तरह से राष्ट्र को सलामी दे रहे थे। मंच से टीम अन्ना के सदस्य ने लोगों से निवेदन किया था कि यदि आप टीवी देख रहे हैं तो भी खड़े हो जाएं राष्ट्रगान के दौरान। ..और मंच से जब अन्ना हजारे ने लोगों को संबोधित करना शुरू किया तो एकटक लोग उन्हें देख रहे थे। उनके चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रहे थे। उनके चेहरे की चमक यह बता रही थी कि इस दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं। जरूरत है आत्मबल की। हां, उन्होंने अपने उपवास करने के तरीकों के बारे में जरूर बताया और मंच से ही लालू प्रसाद यादव के उस सवाल का जवाब भी दिया जिसमें उन्होंने 12 दिनों तक उपवास करने का तरीका जानना चाहा था। हालांकि अन्ना ने नाम तो किसी का नहीं लिया लेकिन उन्होंने यह जरूर कहा कि 10-12 बच्चे पैदा करने के बाद 10-12 दिन का उपवास तो नहीं किया जा सकता। इसके लिए ब्रह्मचर्य की जरूरत होती है। बातें तो उन्होंने बहुत कही जिन्हें लोगों ने ध्यानपूर्वक सुना और शायद अपनी दिनचर्या में भी उतारेंगे क्योंकि अन्ना का 12 दिन का साथ जो उन्हें मिला है। पुलिस भी थी नतमस्तक : अन्ना आंदोलन में समर्थकों की गांधीगीरी का तोड़ पुलिस के पास सिवाय संयम और गांधीगीरी के कुछ नहीं था। 16 अगस्त को अन्ना की गिरफ्तारी के बाद सड़कों पर उतरे जन-आक्रोश और अन्ना द्वारा समर्थकों से यह अपील कि अंहिसापूर्वक आंदोलन जारी रखना है, सरकार और पुलिस चाहे कितना भी जुल्म करे सबकुछ सहना है। यही अपील दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के दिल को भी छू गई और उन्हें समर्थकों के विरोध की काट मिल गई। तीन दिन तिहाड़ में रहने के दौरान अन्ना की अपील का समर्थकों पर जादू सा असर देख, पुलिस ने भी यह निर्णय लिया कि उन्हें भी गांधीगीरी करनी है। पुलिस कर्मियों को यह निर्देश जारी किए गए कि आपको डंडा नहीं उठाना, केवल गांधीगीरी और संयम से काम लेना है। इसका असर यह हुआ कि राजधानी ही नहीं देशभर में दिल्ली पुलिस के संयम और व्यवहार को सराहा जा रहा है। दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता राजन भगत बताते हैं कि देश की जन भावना जब सड़कों पर उतरी तो उसे देश ही नहीं पूरा विश्व देख रहा था। अन्ना के समर्थक न तो सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे थे और न ही यातायात जाम कर रहे थे। वह सड़क के एक ओर चलते हुए अपना विरोध दर्शा रहे थे। हम भी यह समझ चुके थे कि सड़कों पर उतरी भीड़ को डंडे से नहीं गांधीगीरी से ही नियंत्रित किया जा सकता था। इसलिए निर्देश जारी किए गए कि कहीं कोई लाठीचार्ज नहीं होगा। कुछ हुडदंगियों ने पुलिस के संयम को कसौटी पर भी आजमाया। लेकिन पुलिस कर्मियों ने उनके प्रति नरमी बरती और कानून का उल्लंघन करने पर कानूनी कार्रवाई भी की।


कोई घूस मांगे तो पहना दो अन्ना टोपी

नई दिल्ली इतिहास के पन्ने पर अन्ना का नाम स्वर्ण अक्षरों से अंकित हो गया और देश में अन्नागिरी का ऐसा चलन चला कि समर्थक उनके दीवाने हो गए हैं। तभी तो शनिवार को पूर्व आइपीएस अधिकारी व सिविल सोसायटी के सदस्य किरण बेदी ने कहा कि भ्रष्टाचार का प्रतीक बन गई है अन्ना की यह टोपी। आपके लिए यह भ्रष्टाचार से लड़ने का हथियार बन चुका है। जहां अन्ना गांधी के पदचिह्नों पर चलते हुए इस मुकाम तक पहुंचे हैं वहीं हम और आप अन्ना के दिखाए रास्ते पर चलने की कसम खाएं और व्यवस्था परिवर्तन की दिशा में हो रहे इस आंदोलन को जिंदा रखने के लिए अहिंसा को अपनाएं। किरण बेदी ने कहा कि अपनी जेब में मैं अन्ना हूं वाली टोपी रखो। आप जब भी किसी कार्यालय में जाओ और आपके लंबित काम के लिए घूस मांगे तो अन्ना की टोपी निकाल कर पहन लो, ताकि सामने वाले को पता चल जाए कि आप अन्नागीरी पर चलने वाले लोग हो जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले हैं। तब सामने वाला भी समझ जाएगा कि यहां भ्रष्टाचार का खेल नहीं चलेगा। इसके साथ ही उन्होंने ऐसे लोगों को भी हिदायत दी कि जो अन्नागीरी का गलत फायदा उठा रहे हैं, उनकी टोपी व टी शर्ट पहन कर नियमों की अवहेलना में लगे हुए हैं। ऐसे लोग किसी मुजरिम से कम नहीं हंै। इसलिए पुलिस इनके साथ भी वही व्यवहार करे जो आम कानून तोड़ने वालों के साथ करती है।