समाजसेवी अन्ना हजारे के सहयोगी गुजरात के नवनियुक्त लोकायुक्त न्यायमूर्ति आर.ए मेहता अपनी नई जिम्मेदारी को सामान्य रूप से ले रहे हैं। उनका कहना है लोकायुक्त का काम भी कमोवेश न्यायाधीश की तरह ही है। लोकायुक्त का फैसला भी उपलब्ध कराए गए तथ्यों, दस्तावेजों और गवाहों पर ही आधारित होता है। वह कर्नाटक के लाकायुक्त को काफी प्रभावी मानते हैं। इसकी वजह प्रदत्त अधिकार हैं। वह कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त न्यायमूर्ति संतोष हेगड़े को भी योग्य एवं ईमानदार न्यायाधीश बताते है। उनका मानना है कि समय की नजाकत को भांप कर अब लोकायुक्त के अधिकारों में इजाफा अपरिहार्य हो गया है। यहां दैनिक जागरण से बातचीत में उन्होंने कहा कि गुजरात और कर्नाटक लोकायुक्त की तुलना करना फिलवक्त बेमानी होगी। इसकी वजह बताते हुए वह कहते हैं कि कर्नाटक में वर्तमान में काफी प्रभावी लोकायुक्त हैं। वहां उन्हें पर्याप्त अधिकार भी मिले हैं और पूर्व लोकायुक्त संतोष हेगड़े ने अपनी बेबाकी से उसे नई पहचान दी है। मेहता ने बताया कि राज्यपाल डॉ.कमला की ओर से उन्हें लोकायुक्त नियुक्त किया गया। इसमें कोई हर्ष और चुनौती की बात नहीं वे इसे सम और सहज भाव से लेते हैं। सरकार पर कांग्रेस की ओर से लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए राज्य सरकार की ओर से बनाए गए शाह जांच आयोग तथा लोकायुक्त के अधिकारों की समीक्षा के लिए बने मंत्री समूह पर उन्होंने कुछ भी टिप्पणी करने से इंकार कर दिया। उन्होंने साफ किया है कि न्यायमूर्ति एम.बी शाह उच्चतम न्यायालय की कालेधन पर बनी विशेष टीम के सदस्य हैं। इसलिए उन पर निष्पक्ष जांच को लेकर कोई शंका का प्रश्न ही नहीं उठता। न्यायमूर्ति मेहता कहते हैं कि वे कभी काम का दबाव या तनाव महसूस नहीं करते। अपने काम को पूरे शौक के साथ करता हूं, खाली समय में इंटरनेट पर सर्फिग करना उन्हें पसंद है। मजाक में वे कहते हैं कि तनाव वकीलों को अधिक होता है, केस कमजोर हो तो हार का डर होता है और केस मजबूत हो तो भी जीत नहीं पाने की आशंका लगी रहती है। मेहता ने बताया कि शुक्रवार को राज्यपाल का पत्र मिलने के बाद ही उन्हें लोकायुक्त नियुक्त किए जाने की सूचना मिली। न्यायमूर्ति मेहता अन्ना हजारे के पुराने साथी हैं। गुजरात दौरे के दौरान अन्ना उनके ही निजी आवास पर ठहरे थे। अनशन पर उनका साफ कहना है कि टीम अन्ना को उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। राज्यपाल की ओर से लोकायुक्त नियुक्त किए जाने के बावजूद फिलहाल उनके कार्यभार संभालना तय नहीं हो पाया है। दूसरी ओर, राज्यपाल के इस कदम ने गुजरात में राजनीतिक गर्माहट लाने के साथ राजभवन तथा सरकार के बीच दूरियां बढ़ा दी है। हालांकि,गुजरात सरकार ने इस फैसले को हाई कोर्ट में भले चुनौती दे दी है, लेकिन न्यायालय इसके संवैधानिक प्राविधानों को लेकर पसोपेश में है।कानूनविद् एवं नेता विपक्ष का मानना है कि न्यायालय राज्यपाल को सीधे नोटिस नहीं दे सकता, जबकि गुजरात हाई कोर्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष यतीन ओझा का कहना है कि महाधिवक्ता को सरकार के बचाव में अदालत में राज्यपाल के खिलाफ बोलने में कोई संवैधानिक बाधा नहीं है।

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