आनन्द राय, लखनऊ सीबीआइ काफी हद तक वाराणसी और लखनऊ एयरपोर्ट घोटाले की जड़ तक पहंुच गई है। जांच में सामने आया कि भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के अभियंताओं और शीर्ष प्रबंधन की मिलीभगत से इतने बड़े घोटाले को अंजाम दिया गया है। इस घोटाले में सियासी रसूख वालों के भी शामिल होने के संकेत हैं। सूत्रों का कहना है कि विभागीय अभियंतापैसा कमाने के साथ ही प्राधिकरण की छवि खराब करने के लिए की जा रही एक बड़ी साजिश में भी शामिल थे। इसकी पुष्टि के लिए सीबीआइ कुछ बड़े अधिकारियों से भी पूछताछ की तैयारी कर रही है। सीबीआइ ने वाराणसी एयरपोर्ट एप्रन (जहां यात्रियों को बिठाने के लिए जहाज खड़े होते है) और रनवे निर्माण के घोटाले का मामला 6 जनवरी 2011 को दर्ज करने के बाद प्रारंभिक जांच शुरू की। कुछ आवश्यक जांच पड़ताल के बाद मंगलवार को इस संदर्भ में सीबीआइ ने वाराणसी, गया, सिक्यांग (सिक्किम), दिल्ली और लखनऊ में छापेमारी कर अहम सबूत हासिल किए। वाराणसी एयरपोर्ट एप्रन निर्माण के लिए 15 मई 2008 को 23.66 करोड़ की सुनियोजित निविदा स्वीकार की गई। उस अवधि में चार हजार रुपये प्रति मीट्रिक टन के हिसाब से सीमेंट का भाव था, लेकिन जो निविदा स्वीकार की गई उसमें 5611 रुपये प्रति मीट्रिक टन सीमेंट का भाव दर्शाया गया। प्रति टन 1611 रुपये के हिसाब से 1.93 करोड़ रुपये की हेराफेरी की गई। घोटाले की कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। सीबीआइ ने जांच में पाया कि एप्रन और रनवे विस्तार का निर्माण कार्य भी बेहद घटिया कराया गया। निर्माण में 30 हजार बोरी सीमेंट खर्च दर्शाया गया है और सीमेंट खरीद का जो बिल लगाया गया वह भी फर्जी है। घटिया निर्माण का अंदाजा सिर्फ इससे लगाया जा सकता है कि एप्रन करीब सौ स्थानों पर अंदर तक फटा है। सीबीआइ ने पाया कि वाराणसी घोटाले में तकनीकी प्रबंधक जेएल मरांडी, इन दिनों सिक्यांग में तैनात वरिष्ठ प्रबंधक भूपेन्द्र कुमार सिंह, गया में तैनात एक अधिकारी और निर्माण एजेंसी न्यू दिल्ली की ब्राइट एरिकान कंपनी के बीआर अरोरा तथा लखनऊ के ठेकेदार धीरेन्द्र सिंह की सीधी भूमिका है। पूछताछ में प्राधिकरण के अधिकारियों ने घोटाले में कुछ बड़े लोगों के शामिल होने की बात कबूल की है।

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