Tuesday, August 30, 2011

सीखने होंगे इस आंदोलन के सबक

जब कोई आपको कर्तव्य याद दिलाता है तो बुरा लगता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ अहिंसावादी आंदोलन के प्रतीक पुरुष अन्ना ने यही जोखिम उठाया। सरकार को उसका काम याद दिलाया तो सत्तातंत्र और संसद को भी नागवार गुजरा। नेताओं को लोकतंत्र और संविधान याद आया। तेवर दिखाए। आंदोलन में फूट भी डालने की कोशिश हुई। मगर 74 वर्षीय गांधीवादी बुजुर्ग की इच्छाशक्ति के आगे पूरे तंत्र को घुटने टेकने पड़े। अन्ना के आंदोलन को किसी मुकदमे की तरह कानूनी दांव-पेंचों में उलझाने के सरकारी तिकड़म जन ज्वार में बह गए। घोटालों दर घोटालों से ऊब चुका देश अन्ना के साथ खड़ा हो गया। साबित हुआ कि जनता की आवाज को नियमों की तलवार से नहीं काटा जा सकता। 12 दिन भूखे रहकर अन्ना ने इतिहास बनाया। भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोकपाल को स्वीकार कर संसद ने अपनी गरिमा बढ़ाई। प्रधानमंत्री को भी मानना पड़ा कि जनता की इच्छा यानी संसद की इच्छा। अन्ना ने साफ किया कि जब तक संसद लोकपाल कानून पारित नहीं कर देती तब तक वह इस मुद्दे को छोड़ने वाले नहीं। आजादी के बाद पूरे देश में सबसे व्यापक अहिंसक आंदोलन वास्तव में जनता और नेताओं को कई सबक भी दे गया है। भ्रष्टाचार को मुद्दा मानने से इनकार करने वाले हुक्मरानों के लिए यह एक चेतावनी है। यथास्थितवादी हो चुकी जनता को भी उसकी ताकत का अहसास हुआ है। युवा इस पूरे आंदोलन में बदलाव के वाहक के रूप में उभरकर आए। अन्ना के आत्मबल और मार्गदर्शन में युवाशक्ति ने जो हौसला और संयम दिखाया उसमें सुखद संकेत छिपे हैं। सब जान गए हैं कि संकल्प पक्का है और उसके मूल में जनहित है तो लोक के आगे तंत्र झुकेगा ही। बस जरूरत है तो एक रहनुमा की, जिस पर सब भरोसा कर सकें। अन्ना का आंदोलन मूर्ति भंजक है। सत्ता तंत्र को संसद की सर्वोच्चता की आड़ में जनता से जुड़े मुद्दों की उपेक्षा करने की प्रवृत्ति छोड़नी होगी, वरना अब जनता ने हक पाने का रास्ता देख लिया है। जाग चुकी जनशक्ति अब छलावे में आने को तैयार नहीं है, वरना तो सरकार अगर कहती थी कि कानून सड़कों पर नहीं बन सकता तो उसमें कुछ भी गलत नहीं था। संसद की प्रक्रिया को सड़क पर नहीं संचालित किया जा सकता, मगर तमाम प्रतिरोध और कुछ बचकानी हरकतों के बाद सरकार को जनता के सामने हथियार डालने पड़े तो उसके पीछे नैतिकता और जन भावनाओं की अनदेखी का लंबा इतिहास है। यूपीए के पहले कार्यकाल में दागी मंत्री कैबिनेट में आए,पैसे लेकर संसद में सवाल पूछने का शर्मनाक प्रकरण आया और फिर नोट के बदले वोट कांड। यूपीए-दो में तो सारी सीमाएं ही पार हो गईं। राष्ट्रमंडल में राष्ट्रीय प्रतिष्ठा दांव पर लगी तो 2जी स्पेक्ट्रम में तरंगें तक बेच दी गई। जैसे-जैसे घोटालों की फेहरिस्त लंबी हो रही थी, वैसे ही जनाक्रोश का लावा उफन रहा था। चार माह पहले अन्ना राष्ट्रीय फलक पर पहुंचे और अपनी सरलता, सहजता और अहिंसावादी सोच से जनता का भरोसा जीत कर इस आंदोलन को एक मुकाम तक पहुंचा दिया। मुकाम अभी अधूरा है, लेकिन सत्तासीनों के लिए अब इस मसले को अनदेखा करना शायद ही संभव हो।


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