Tuesday, August 30, 2011

संकट में सहयोगियों ने छोड़ा कांग्रेस का हाथ

नई दिल्ली संप्रग के सहयोगी दल सरकार में तो शामिल हैं, लेकिन संकट के वक्त में कोई भी उसके साथ खड़े होने के लिए तैयार नहीं है। सत्ता के फायदे में शामिल संप्रग के अपनों ने अन्ना की आंधी में फंसी कांग्रेस को उसके हाल पर छोड़ दिया। नतीजा यह है कि अन्ना के अनशन से निपटने में अब तक की असफलता का सारा ठीकरा सरकार और कांग्रेस के मत्थे ही फूट रहा है। इससे सहयोगी दलों की सेहत पर कोई असर नहीं है। सबसे पहले बात करें संप्रग की सबसे बड़े सहयोगी तृणमूल कांग्रेस की। पश्चिम बंगाल में कदम दर कदम केंद्र का साथ मांगती रही, लेकिन अन्ना का अनशन शुरू होने के बाद से उसने भी कभी खुलकर इस मामले में सरकार के रुख का समर्थन नहीं किया। अलबत्ता, प्रधानमंत्री पर आरोप लगने के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री व तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी उनके पक्ष में जरूर बोलीं, लेकिन अन्ना मामले में सारी कवायद की जिम्मेदारी उन्होंने भी सरकार पर ही छोड़ दी। इसी तरह केंद्रीय कृषि मंत्री व राकांपा प्रमुख शरद पवार ने भी अन्ना मसले पर सरकारी बैठकों में उसका साथ दिया, लेकिन बाहर खुद को इस पचड़े से अलग ही रखा। बीते दिनों प्रधानमंत्री के निवास पर सर्वदलीय बैठक में उन्होंने झूठी शिकायतों के लिए अन्ना पर मानहानि के मुकदमे के जरिए उनका कच्चा चिट्ठा खोलने की कोशिश तो की, लेकिन सार्वजनिक तौर पर चुप रहने में ही भलाई समझी। महाराष्ट्र के कांग्रेस नेता एवं केंद्रीय मंत्री विलासराव देशमुख अन्ना मामले को सुलझाने में पूरी तरह सक्रिय हैं। संप्रग की एक और अहम सहयोगी द्रमुक भी अन्ना मामले में कभी खुलकर सरकार के समर्थन में नहीं उतरी। उल्टे बीते दिनों अन्ना के जन लोकपाल बिल को लेकर हुई सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री को भी लोकपाल के दायरे में लाने की पैरवी कर दी। इतना ही नहीं, सरकार को बाहर से समर्थन दे रही सपा भी कभी सरकार के साथ नहीं खड़ी हुई। बसपा ने बीते दिनों अन्ना का समर्थन कर दिया था, लेकिन शुक्रवार को उसके विपरीत रुख का इजहार कर दिया। इन सबके बीच, राजद प्रमुख लालू यादव ने खुले तौर पर कई बार सरकार का समर्थन किया।


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