Tuesday, August 30, 2011

लोकपाल पर राजनीतिक दलों की राय रही जुदा-जुदा

लोकपाल पर राजनीतिक दलों की राय रही जुदा-जुदारामगोपाल यादव (सपा) बाल हठ तो सुना था पर वृद्ध हठ नहीं। जन लोकपाल में कई चीजें अनावश्यक हैं तो कुछ जरूरी प्रावधान जोड़ने की जरूरत है। इसके दायरे में एनजीओ और निजी शिक्षण संस्थानों को लाया जाना चाहिए। दबाव में अपने अधिकार दूसरे को देना जायज नहीं हो सकता है। बहुत हड़बड़ी में सरकार को गलतियां नहीं करनी चाहिए। जन लोकपाल की सर्च कमेटी के गठन में जिन लोगों को रखने का प्रावधान है, उनमें जजों और सिविल सोसाइटी के लोगों को रखा जाना है। उन्हें बेदाग और ईमानदार कौन साबित करेगा? सांसदों को इसके दायरे में लाने का कोई औचित्य नहीं है। इसकी कमेटी में अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति व अनुसूचित जाति और पिछड़ी जाति का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। लोकायुक्तों की नियुक्ति का अधिकार राज्यों को होना चाहिए। निचली ब्यूरोक्रेसी को शामिल करना अव्यावहारिक होगा। शरद यादव (जदयू) अन्ना की तीनों शर्तो का समर्थन करता हूं, लेकिन याद भी दिलाना चाहता हूं कि संसद की शक्ति अपार है और भ्रष्टाचार के खिलाफ भी कई लड़ाइयां लड़ी हैं। आज कई मंत्री व सांसद जेल में हैं तो इसमें संसद की भूमिका रही है। पैसे लेकर सवाल पूछने वाले सदस्यों को इसी संसद में सदस्यता खत्म कर दी। लेकिन बाहर ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि यहां सभी लोग दागी हैं। यह गंभीर सवाल है। मैं अन्ना की इज्जत करता हूं, लेकिन यह भी कहना चाहता हूं कि उनके आसपास के लोगों का आचरण सही नहीं है। उन्हें हमें राजनीति सिखाने की जरूरत नहीं है। विधेयक में पिछड़े वर्ग के लोगों को शामिल किया जाना चाहिए। लालू प्रसाद (राजद) अन्ना के आंदोलन को बेवजह तवज्जो देने के लिए उन्होंने केन्द्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया और कहा आज जो स्थिति पैदा हुई उसके लिए आप ही लोग जिम्मेदार है। सिविल सोसायटी के लोग कौन हैं। इनका कब चुनाव हुआ। आज अरुणा राय आ गई कल कोई और नहीं आएगा इसकी कौन गारंटी देगा। अन्ना अच्छे आदमी हैं, लेकिन उनके मुंशी मैनेजर ठीक नहीं है। उन्हें दिग्भ्रमित करता है सब। उन्होंने प्रधानमंत्री पर भी कटाक्ष किया और कहा, आपने उन्हें सैल्यूट किया। पूरे सदन ने अनशन तोड़ने की अपील की, लेकिन क्या हुआ। दबाव में नहीं आने की सलाह देते हुए लालू ने कहा कालीदास मत बनिए। संविधान के खिलाफ जाकर आज सदन में चर्चा करा ली ठीक है। आगे ऐसी गलती मत कीजिएगा। संसद की सर्वोच्चता को एक इंच भी हिलने नहीं देंगे। सतीश चंद्र मिश्र (बसपा) जन लोकपाल पर चर्चा के बजाए सरकार अपना कोई बिल का वर्जन लाए जिसमें अनुसूचित जाति जनजाति और पिछड़े सबका स्थान हो। न्यायपालिका की जवाबदेही तो होनी चाहिए। सभी सरकारी कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाना भी व्यावहारिक नहीं है। लोकायुक्त बनाने के प्रावधान का सवाल है तो यह अधिकार राज्य सरकारों का है। सीताराम येचुरी (माकपा) पिछले 40 साल से लोकपाल पर संसद में विचार चल रहा है। नौ बार इस पर प्रस्ताव आया। पर यह कानून नहीं बन सका। इससे धीरे धीरे जनता में संदेश गया कि हम लोकपाल नहीं चाहते हैं। अन्ना जी के तीनों मुद्दों से हम सहमत हैं। न्यायपालिका की अलग प्रणाली की बात पहले ही कर दी है। लोकपाल के साथ ही राज्यों के लिए एक माडल बिल पास करके राज्यों को कहा जा सकता है कि अगर चाहे तो वे ऐसा बिल बना सकते हैं। संयुक्त सचिव स्तर से नीचे के अधिकारियों और कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाए बिना भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा पाना संभव नहीं होगा। मौजूदा सतर्कता मशीनरी को लोकपाल के दायरे में होना चाहिए। रामविलास पासवान (लोजपा) अन्ना का यह पूरा का पूरा आंदोलन अनुसूचित जाति जनजाति और पिछड़ा विरोधी आंदोलन है। सरकार इसी तरह दबाव में आकर फैसले लेती रही तो कल कोई और ताकतें भीड़ जुटाकर मांग करने लगेगी कि दलितों को आरक्षण समाप्त किया जाए। तब क्या होगा? लोकपाल की सर्च कमेटी में अनुसूचित जाति जनजाति और पिछड़े तबके को पचास प्रतिशत आरक्षण दिया जाना चाहिए। ऐसा नहीं हुआ तो वे इस बिल को पास नहीं होने देंगे। गुरुदास दासगुप्ता (भाकपा) लोग भ्रष्टाचार से परेशान होकर सड़कों पर नहीं उतरे हैं, बल्कि भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होने के कारण आंदोलित हैं। सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। बोफर्स का घोटाला64 करोड़ रुपये का था, लेकिन 2जी 30000 करोड़ रुपये का घोटाला है। लोकपाल बिल भ्रष्टाचार पर पूरी तरह से लगाम लगाने में भले ही सफल न हो, पर यह पहला कदम जरूर साबित होगा। पिछले 12 दिनों से अन्ना के अनशन को तुड़वाने में फेल रही सरकार पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि इस सरकार में सत्ता के कई केंद्र है, जो अलग-अलग भाषा बोल रहे हैं। सुदीप बंदोपाध्याय (तृणमूल) भ्रष्टाचार को रोकने के लिए लोकपाल विधेयक को स्वायत्तशासी संस्था के रूप में मान्यता होनी चाहिए। राज्यों में भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए लोकायुक्तों की नियुक्ति होनी चाहिए। जयंत चौधरी (रालोद) कई बार जो अफसरशाही है वो डॉमिनेट करती है। वे परिवर्तन नहीं चाहते। इसलिए जब भ्रष्टाचार के खिलाफ एक नया क्रांतिकारी विचार आया तो देश की जनता उसके क्रियान्वयन के लिए नैतिक दबाव बना रही है। इसकी शुरूआत में सरकार इसका विरोध कर रही थी क्योंकि उसके पीछे नौकरशाही का हाथ था।


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