नई दिल्ली अन्ना के आंदोलन ने सभी राजनीतिक दलों को उलझन में डाल दिया है। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों यह समझने में असमर्थ है कि क्या प्रतिक्रिया दिखाएं। मंगलवार को संसद में इसकी साफ झलक दिखी जब छोटी छोटी बातों में ही विपक्ष और सत्तापक्ष ने उलझकर कार्यवाही ठप करा दी। स्थिति पूरी स्पष्ट होने तक दोनों पक्षों को यह स्थिति ज्यादा रास आ रही है। मंगलवार को दोनों सदनों में कार्यवाही शुरू होते ही विपक्ष ने भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया। लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार और राज्यसभा के सभापति मो. हामिद अंसारी ने प्रश्नकाल के बाद चर्चा की इजाजत भी दे दी, लेकिन ऐन वक्त पर मुख्य विपक्ष भाजपा का रवैया बदल गया। दोपहर बाद राज्यसभा में जहां विपक्ष ने चर्चा छोड़कर प्रधानमंत्री के बयान की मांग कर दी। वहीं लोकसभा मामूली सी बात पर ही सत्तापक्ष और विपक्ष आपस में उलझ गया। बात इतनी सी थी विपक्ष सीधे चर्चा शुरू कराना चाहता था जबकि सत्ता में शामिल द्रमुक के नेता टीआर बालू पहले श्रीलंका व तमिल के मुद्दे पर कुछ कहना चाहते थे। कांग्रेस के सदस्यों ने भी इस आपसी टकराव में घी डाला। दरअसल मीरा कुमार ने भाजपा को चर्चा शुरू करने की अनुमति दे दी थी, लेकिन कांग्रेस सदस्यों ने द्रमुक का साथ दिया और दबाव बनाने की कोशिश की। लिहाजा बिना किसी कामकाज के सदन स्थगित हो गई। माना जा रहा है कि राजनीतिक दल अन्ना के आंदोलन को लेकर स्पष्ट रुख नहीं बना पा रहे हैं। लिहाजा इसी बहाने थोड़ा और समय निकालने की कोशिश हो रही है। इससे प्रश्नकाल के दौरान भी यही हुआ। मीरा कुमार ने नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज को बोलने का अवसर दिया तो खुद संसदीय कार्यमंत्री पवन बंसल ने उनके भाषण के विषय वस्तु पर सवाल उठाकर भाजपा सदस्यों को उत्तेजित कर दिया। शोर शराबे मे ही सुषमा ने सरकार को कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा कि पिछले एक साल में भ्रष्टाचार की आंधी सी आ गई है। जनता उससे रोष में है और इसका असर अन्ना के आंदोलन में दिख रहा है। जबकि सरकार इसका कोई ठोस राजनीतिक रास्ता नहीं निकाल पा रही है।

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