, नई दिल्ली रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार के खिलाफ छिड़ी जंग के बीच बुधवार को सांसदों ने भी थोड़ी ईमानदारी के साथ मान लिया कि जो व्यवस्था है उसमें भ्रष्टाचार पनपे बिना नहीं रह सकता है। विभिन्न सरकारी योजनाएं हों या खुद भ्रष्टाचार को रोकने के लिए बनाई गई संस्थाएं, वह इसे बढ़ावा ही देती हैं। लिहाजा व्यवस्था में परिवर्तन भी करना होगा और यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सरकारें भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई से न हिचके। बुधवार को संसद के दोनों सदनों में भ्रष्टाचार पर बहस हुई। राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली तो लोकसभा में डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने इसकी शुरुआत की। जेटली ने भ्रष्टाचार को उदारीकरण की देन करार देते हुए कहा कि बीस साल पहले तक जिस क्षेत्र में भ्रष्टाचार का अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता था वही अब सबसे बदनाम हो गया है। न्याय देने वाली न्यायपालिका में ऊपर से नीचे तक इसका कीड़ा लग गया है। हमने कुछ ऐसी एजेंसियां भी बना रखी हैं जो भ्रष्टाचार से निजात दिलाने की बजाय इसे बढ़ावा दे रही हैं। मसलन सीबीआइ। उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि यूपी में एक नेता के लिए सीबीआइ ने कितनी बार शपथपत्र बदला। लोकसभा में डॉ. जोशी ने भी इसी तर्ज पर भाषण की शुरुआत की, लेकिन ठीकरा संप्रग सरकार के सिर फोड़ा। वर्ष 2005 से अब तक लगभग एक दर्जन घोटालों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह सरकार अपराधियों पर कार्रवाई करने से बचती रही है। स्पेक्ट्रम मामले में खुद प्रधानमंत्री को सब कुछ पता था, लेकिन उसे भी नजरअंदाज कर दिया गया। सरकार बचाने की बात आई तो कांग्रेस पैसे लेकर घूमने लगी। उन्होंने प्रधानमंत्री को चुनौती दी कि भ्रष्टाचार मिटाना चाहते हैं तो नीयत भी बदलें वरना जनतंत्र माफ नहीं करेगा। सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव, जदयू अध्यक्ष शरद यादव, माकपा नेता सीताराम येचुरी समेत कई दूसरे नेताओं ने भी कुछ इसी तर्ज पर आगाह किया कि राज्य और केंद्र सरकार को ठोस कदम उठाने होंगे। सरकारों को संवेदनशील होना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि भ्रष्टाचारियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई हो। बसपा के सतीश चंद्र मिश्रा ने नया मोड़ देते हुए कहा कि लोकपाल ड्राफ्टिंग कमेटी के लिए पैनल बना तो उसमें पिछड़ों को जगह नहीं दी गई। लिहाजा यह ध्यान रखा जाना चाहिए आगे जब लोकपाल की नियुक्ति हो तो उसमें उन्हें स्थान मिले।

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