Tuesday, August 2, 2011

अन्ना पर शुरू से ही गंभीर नहींथी सरकार

नई दिल्ली राष्ट्रीय -शासन योजना पर हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च करने वाली सरकार को एक मामूली सी वेबसाइट शुरू करने में आज भी कम से कम पांच महीने का समय लगता है। जबकि खुद इसका आदेश वित्त मंत्री ने दिया हो, सरकारी भाषा में इस काम को अर्जेट दर्ज किया गया हो और पूरा देश इसका इंतजार कर रहा हो। केंद्र सरकार ने लोकपाल के बारे में आपकी राय जानने वाली वेबसाइट नहीं बनाने के पीछे यही तर्क दिया है। केंद्र सरकार के कार्मिक विभाग (डीओपीटी) की फाइलों में यह वेबसाइट बना पाने के कारण के तौर पर दर्ज है कि इस काम को अगर युद्ध स्तर पर भी किया जाए कम से कम चार से पांच महीने लगना लाजमी है। जबकि साझा समिति का काम उससे पहले 30 जून को ही खत्म हो जाएगा। इसलिए बेहतर होगा कि यह विचार त्याग दिया जाए। फाइलों पर दर्ज यह राय डीओपीटी ने सरकारी वेबसाइट बनाने वाले संगठन नेशनल इंफोर्मेटिक्स सेंटर (एनआइसी) के साथ सलाह के बाद बनाई। लोकपाल साझा समिति के सचिवालय की जिम्मेदारी डीओपीटी के पास ही थी, इसलिए वेबसाइट बनाने का काम भी समिति ने इसे ही सौंपा था। समिति की पहली बैठक में ही अन्ना हजारे की मांग पर वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने इसका वादा किया था। मशहूर कंप्यूटर सेकयूरिटी एक्सपर्ट अंकित फादिया सरकार के इस तर्क को बेहद गलत और बेतुका बताते हैं। उनके मुताबिक इस बेहद आसान काम में किसी सरकारी महकमे को भी एक हफ्ते से ज्यादा नहीं लगने चाहिए। फादिया के मुताबिक इसके लिए कई सोफ्टवेयर पहले से उपलब्ध हैं। ऐसी वेबसाइट की सुरक्षा के लिए भी अलग से किसी उपाय की जरूरत नहीं होती। संचार क्रांति के क्षेत्र में सिरमौर माने जाने वाले देश की सरकार की ओर से एक वेबसाइट बनाने में ऐसी मजबूरी जताने को इंडिया अगेंस्ट करप्शन के कार्यकर्ता नीरज कुमार बहुत शर्मनाक बताते हैं। खास कर जब खुद केंद्र सरकार हजारों करोड़ रुपये की बेहद महत्वाकांक्षी -गवर्नेस योजना पर पिछले पांच साल से काम कर रही हो और हर साल इसमें लगभग एक हजार करोड़ रुपये अलग से खर्च किए जा रहे हों। साथ ही वे बताते हैं कि साझा समिति की बैठक में हुई चर्चा के चार दिन के अंदर ही उन्होंने लोकप बिल कंसल्टेशन डॉट ओर्ग नाम से गैर-सरकारी वेबसाइट शुरू कर दी थी। इन पर अब तक आए सभी सुझाव लोगों के पढ़ने के लिए उपलब्ध भी हैं।


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