केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो(सीबीआइ), नेशनल इनवेस्टिगेशन एजेंसी (एनआइए) व नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड(नेटग्रिड) को आरटीआइ के दायरे से बाहर रखने के कैबिनेट के निर्णय को सही ठहराते हुए केंद्र सरकार ने कहा है कि बड़े स्तर पर राष्ट्रीय सुरक्षा को देखते हुए इन सभी एजेंसी को आरटीआइ के दायरे से बाहर रखने का निर्णय किया गया है। यह दलील केंद्र ने इन सभी एजेंसी को आरटीआइ के दायरे से बाहर रखने के निर्णय को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में दायर दो जनहित याचिकाओं पर अपना जवाब दायर करते हुए दी है। कार्मिक मंत्रालय ने अदालत में हलफनामा दायर करते हुए कहा है कि सुरक्षा व पारदर्शिता में संतुलन बनाए रखने के लिए यह निर्णय लिया गया है। मंत्रालय ने कहा कि सूचना का अधिकार मुकम्मल अधिकार नहीं है। देश की सुरक्षा का ध्यान रखा जाना जरूरी है। पारदर्शिता कानून के तहत सूचना देकर देश की सुरक्षा से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता है। आरटीआइ एक्ट को भी सुरक्षा व पारदर्शिता में संतुलन बनाए रखने की जरूरत है। ऐसे में सीबीआइ व अन्य दो एजेंसियों को इसके दायर से बाहर रख कर इसी संतुलन को बनाए रखने की कोशिश की गई है। इस बात का ध्यान रखा गया है कि नागरिकों द्वारा सूचना मांगने के अधिकार की रक्षा के समय देश की सुरक्षा को नजरअंदाज न किया जा सके। ऐसा कुछ नहीं है कि सूचनाएं छिपाने के लिए ऐसा किया गया है। वहीं सीबीआइ की तरफ से दायर जवाब में कहा गया है कि इस तरह सूचना देने से उनकी कार्यप्रणाली प्रभावित होगी। एजेंसी पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी हत्या मामला,नेवी वार रूम लीक मामला व मुंबई ब्लास्ट जैसे देश के कई बड़े मामलों की जांच कर रही है। याचिकाकर्ता सिताब अली चौधरी व याचिकाकर्ता अजय अग्रवाल ने कैबिनेट के नौ जून के उस निर्णय को चुनौती दी है जिसमें इन तीन एजेंसियों को सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर रखा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य फैसले में जंगल की जमीन, राज्य सरकार में निहित करने वाले कुमांयू उत्तराखंड जमींदारी उन्मूलन व भूमि सुधार संशोधन कानून (कुजलर एक्ट) को संवैधानिक ठहराया है। हालांकि पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कानून को वैध ठहराने के साथ ही कहा है कि कानून के बाद सरकार में निहित जंगल की जमीन से कोई आय न होने पर भी भूस्वामी को मुआवजा दिया जाएगा। ये महत्वपूर्ण फैसला मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाडि़या की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधानपीठ ने सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने संपत्ति के अधिकार की व्याख्या करते हुए कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 300ए में एक व्यक्ति को उसकी संपत्ति से वंचित किया जा सकता है। लेकिन ऐसा सिर्फ निष्पक्ष और तार्किक कानूनी आधार पर ही हो सकता है। जनहित के नाम पर अधिग्रहीत की गयी किसी की निजी संपत्ति के मामले में यह नहीं कहा जा सकता कि कोई मुआवजा नहीं मिलेगा जैसा कि इस मामले में हुआ है। जबकि राज्य सरकार की वकील रचना श्रीवास्तव की दलील थी कि कानून में जमीन से आय न होने के मामलों में मुआवजा दिये जाने की बात नहीं कही गई है। पीठ ने कहा कि इस मामले में जो जमीन कानून के बाद राज्य सरकार में निहित हुई है उसे गैर उत्पादक नहीं माना जा सकता। निश्चित तौर पर सरकार में निहित संपत्ति उत्पादक संपत्ति है। इसलिए संपत्ति की संभावित आय का आंकलन कर मुआवजा दिया जाना चाहिए। कुजलर कानून में भी सरकार में निहित प्राइवेट जंगल का मुआवजा दिये जाने की बात कही गयी है। संविधान पीठ ने कुजलर कानून की धारा 4ए, 18(1)(सीसी) और 19 (1)(बी) को वैध ठहराते हुए असिस्टेंट कलेक्टर को याचिकाकर्ता राजीव सरीन को उचित मुआवजा अदा करने का निर्देश दिया है। पीठ ने राज्य सरकार से कहा है कि वह फैसले में दी गयी व्यवस्था के मुताबिक मुआवजे के मानक व दिशानिर्देश तय करे

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